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कल्लेन पोक्कुडन: मैंग्रोव के जंगलों को जीवन देने वाले 'मैंग्रोव मैन' की कहानी

कल्लेन पोक्कुडन: मैंग्रोव के जंगलों को जीवन देने वाले 'मैंग्रोव मैन' की कहानी

भारत के पश्चिमी राज्य, केरल के उत्तरी तट में जहां समुद्र रोज़ तटीय सीमाएं बनाता और मिटाता रहता है। वहीं मैंग्रोव के जंगल तटों के असली रक्षक और पहरेदार की तरह खड़े रहते हैं। टिंडिस ट्रैवल में छपे एक लेख के मुताबिक, केरल में मैंग्रोव वन राज्य के पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

वहां के मैंग्रोव वनों में, कन्नूर सबसे लंबा मैंग्रोव वन क्षेत्र है, जो लगभग 7.55 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। ये वन हर साल आने वाली बाढ़ और कटाव से तटों की रक्षा करते हैं और गांवों को बचाते हैं। लेकिन हमेशा से इन पेड़ों को इतनी अहमियत नहीं दी गई। मैंग्रोव वन कई दुर्लभ और पानी में रहने वाले जीवों के लिए सुरक्षित घर और प्रजनन की जगह होते हैं। ये वन चारा और औषधियों का भी महत्वपूर्ण स्रोत हैं। साथ ही, स्थानीय लोग इनकी सूखी टहनियों का इस्तेमाल जलाने की लकड़ी के रूप में करते हैं।

हालांकि मालाबार के तटीय क्षेत्रों में हुए बुनियादी ढांचे के विकास के कारण केरल में मैंग्रोव वनों का घनत्व तेजी से घट रहा था। उत्तरी केरल ही एकमात्र ऐसा क्षेत्र नहीं था जहां मैंग्रोव वनों का विनाश हो रहा था। वैश्विक सर्वेक्षणों के मुताबिक ,आज मैंग्रोव वनों का कुल क्षेत्रफल आधे से भी कम रह गया है। लेकिन ऐसे वक्त में कल्लेन पोक्कूडन जिन्हें कंडल पोक्कुडन के नाम से भी जाना जाता है, उन्होंने इन जंगलों या वनों को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।वह एक भारतीय पर्यावरण कार्यकर्ता और लेखक थे। वह ना तो किसी बड़े पद पर थे और न ही किसी संस्थान से जुड़े हुए थे , फिर भी इन्होंने मैंग्रोव की अहमियत समझी और इसके संरक्षण के लिए काम किया। उन्होंने अपने जीवन के बीस से तीस साल उन्हीं छोड़े हुए और काटे गए जंगलों में फिर से हरियाली लौटाने में लगा दिए। नदियों और समुद्र के किनारे एक-एक पौधे अपने हाथों से लगाए। यही नहीं अपने जीवन काल में उन्होंने कुल मिलाकर एक लाख से भी ज़्यादा पौधे लगाए।

वैश्विक सर्वेक्षणों के मुताबिक ,आज मैंग्रोव वनों का कुल क्षेत्रफल आधे से भी कम रह गया है। लेकिन ऐसे वक्त में कल्लेन पोक्कूडन जिन्हें कंडल पोक्कुडन के नाम से भी जाना जाता है, उन्होंने इन जंगलों या वनों को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।वह एक भारतीय पर्यावरण कार्यकर्ता और लेखक थे।

प्रारंभिक जीवन और मैंग्रोव वनों को बचाने की शुरुआत

कल्लेन पोक्कुडन का जन्म केरल राज्य के एक छोटे से गांव इद्दुकिल थारा में साल 1937 में एक आदिवासी परिवार में हुआ था। उनके माता का नाम कल्लेन वेल्लाची और पिता का नाम अरिंगेलयन गोविंदन परोट्टी था। उनका बचपन बहुत कठिनाई और गरीबी में गुजरा। आर्थिक स्थिति सही ना होने के कारण उन्होंने केवल दूसरी कक्षा तक पढ़ाई की , फिर उनको खेतों में काम करना पड़ा। उनके पास कोई बड़ी डिग्री नहीं थी, लेकिन अपने आस-पास की मिट्टी, पानी और पेड़-पौधों को वो ध्यान से देखते और समझते थे। किताबों से पढ़ाई छूट गई, मगर असली दुनिया से और अपने तरीके से उन्होंने इकोलॉजी और पर्यावरण की समझ हासिल की। कल्लेन उस समय मैंग्रोव संरक्षण में शामिल हुए जब कन्नूर में मैंग्रोव वन बड़े पैमाने पर विनाश के कगार पर थे।

यहां तक कि प्रमुख पर्यावरणविद् और जिम्मेदार अधिकारी कन्नूर के तटीय क्षेत्रों में मैंग्रोव वनों के तेजी से विनाश के कारण उत्पन्न होने वाले दुष्परिणामों से अनभिज्ञ थे।अपने शुरुआती दिनों में कल्लेन पोक्कूडन को अक्सर 'प्रांथन पोक्कुदन' कहा जाता था, क्योंकि वे कन्नूर में मैंग्रोव की घनी झाड़ीनुमा प्रजाति लगाते थे, जिसे स्थानीय रूप से 'प्रांथन कंडल' या क्रेज़ी मैंग्रोव के नाम से जाना जाता है। उनकी पहचान कभी किसी संस्थागत ढांचे में फिट नहीं हुई। वो न तो वैज्ञानिक थे, न किसी संस्था के सदस्य। उनका पेशा क्या था, असल में कुछ तय ही नहीं था। उन्होंने मज़दूरी की, छोटे-मोटे काम किए, और गुज़ारा चलता रहा। लेकिन, साथ-साथ अपने दम पर मैंग्रोव बचाने की मुहिम रोज़ चलाते रहे। वक्त के साथ लोग उन्हें मैंग्रोव के सच्चे रखवाले के नाम से जानने लगे।

उनका बचपन बहुत कठिनाई और गरीबी में गुजरा। आर्थिक स्थिति सही ना होने के कारण उन्होंने केवल दूसरी कक्षा तक पढ़ाई की , फिर उनको खेतों में काम करना पड़ा। उनके पास कोई बड़ी डिग्री नहीं थी, लेकिन अपने आस-पास की मिट्टी, पानी और पेड़-पौधों को वो ध्यान से देखते और समझते थे।

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पोक्कुडन का मैंग्रोव संघर्ष और चुनौतियां

अगर मैंग्रोव वन संरक्षण की बात की जाए, तो पोक्कुडन ने अकेले जो काम किया, वो आसान नहीं था। एझोम की नदियों के किनारे पले-बढ़े पोक्कुडन पर्यावरण के प्रति उचित और अनुचित व्यवहार से पूरी तरह से परिचित थे। अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर उन्होंने मैंग्रोव वनों में छिपे समृद्ध खजानों का विश्लेषण किया। वह मैंग्रोव को पेंडोरा का जीवित बक्सा कहते थे और वे अपनी आंखों के सामने इन खजानों को खत्म होते हुए चुपचाप नहीं देख सकते थे। दृढ़ संकल्प और उत्साह के साथ, उन्होंने एक ऐतिहासिक प्रयास शुरू किया, जिसके तहत वे हर रोज़ अपनी नाव में सवार होकर दलदली इलाकों में मैंग्रोव के पौधे लगाते थे, दिन-रात उसी में लगे रहते थे। टिंडिस ट्रैवल में छपे लेख के मुताबिक, शुरुआत में उनके लिए यह काम बहुत मुश्किल था।

दलदली इलाकों में समय बिताने और ऐसे काम करने पर, जिससे कमाई नहीं होती थी, लोगों ने उनकी आलोचना की। उन्हें कई बार स्थानीय रियल एस्टेट के लोगों से धमकियां भी मिलीं, जो मैंग्रोव जमीन पर कब्जा करना चाहते थे।उनके लगाए हुए पौधे कई बार उखाड़कर नदी में फेंक दिए जाते थे। फिर भी वे हार नहीं माने। उनके मजबूत इरादों ने उन्हें आगे बढ़ने की ताकत दी और उनका काम एक बड़ा अभियान बन गया। वे लोगों को समझाते थे कि ये पेड़ बेकार नहीं हैं। तटीय इलाकों को और गांवों को अगर बचाए रहना है, तो इनकी ज़रूरत सबसे ज़्यादा है। उनकी मेहनत ने आसपास के पर्यावरण को मजबूत कर दिखाया बिना किसी बड़ी सरकारी मदद या फंडिंग के।

दलदली इलाकों में समय बिताने और ऐसे काम करने पर, जिससे कमाई नहीं होती थी, लोगों ने उनकी आलोचना की। उन्हें कई बार स्थानीय रियल एस्टेट के लोगों से धमकियां भी मिलीं, जो मैंग्रोव जमीन पर कब्जा करना चाहते थे।उनके लगाए हुए पौधे कई बार उखाड़कर नदी में फेंक दिए जाते थे। फिर भी वे हार नहीं माने। उनके मजबूत इरादों ने उन्हें आगे बढ़ने की ताकत दी और उनका काम एक बड़ा अभियान बन गया।

मैंग्रोव का पारिस्थितिक महत्व, प्रकृति, संरक्षण और पहचान

मैंग्रोव वन धरती के सबसे जरूरी पारिस्थितिक तंत्रों में आते हैं। साल 2004 की सुनामी में भी जहां मैंग्रोव थे, वहां बर्बादी कम हुई थी। ये पेड़ तटीय इलाकों की मिट्टी को बहने से रोकते हैं। यह जैव विविधता को बनाए रखते हैं। इसमें तरह-तरह की मछलियां, पक्षी और कई जीव रहते हैं।ये पेड़ कार्बन सोख लेते हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन की रफ्तार कम होती है। पोक्कुडन ने इन सब बातों को समझा और लोगों को इसकी अहमियत बताई।धीरे-धीरे समय के साथ चीज़ें बदलीं और उनके कामों की सराहना की जाने लगी। वो पूरे केरल और अन्य राज्यों में भी चर्चित होने लगे।इसके साथ ही मैंग्रोव मैन ऑफ केरल के नाम से उन्हें जाना गया। पर्यावरण संरक्षक होने के साथ ही वो मोटिवेशनल स्पीकर भी रहे।

स्कूलों, कॉलेजों, और गाँवों में वे बच्चों और लोगों को लगातार समझाते और प्रेरित करते कि तटीय इलाकों और पर्यावरण की सेहत के लिए मैंग्रोव कितने ज़रूरी हैं। उन्होंने कभी औपचारिक और स्कूली शिक्षा नहीं ली, फिर भी उन्होंने कई किताबें लिखी। उनकी सबसे चर्चित रचनाओं में, एंटे जीवथम और कंडलक्काडुकल्ककिडायिल एन्टे जीविथम आदि शामिल हैं। इन किताबों में उन्होंने अपने जीवन के अनुभव और पर्यावरण के बारे में गहराई से लिखा है। इन किताबों के माध्यम से हमें उनके संघर्षों और प्रकृति के लिए उनके प्रेम का पता चलता है। उनके जीवन पर आधारित साल 2011 में स्थलमनामक एक मलयालम फिल्म बनाई गई थी। इसे कवियूर शिवप्रसाद ने लिखा और निर्देशित किया था । इस वजह से उनके काम को लोगों ने जाना, और उनकी कहानी ज्यादा लोगों तक पहुंची।

पर्यावरण संरक्षक होने के साथ ही वो मोटिवेशनल स्पीकर भी रहे। स्कूलों, कॉलेजों, और गाँवों में वे बच्चों और लोगों को लगातार समझाते और प्रेरित करते कि तटीय इलाकों और पर्यावरण की सेहत के लिए मैंग्रोव कितने ज़रूरी हैं।

सम्मान और विरासत

पोक्कुडन को उनके योगदान के लिए उन्हें कई पुरस्कारों से नवाज़ा गया। उन्हें साल 2001 में पी.वी. थम्पी मेमोरियल एंडॉमेंट अवार्ड मिला। इसके दो साल बाद, उन्हें भूमि मित्र पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जिसके बाद साल 2006 में केरल वन एवं वन्यजीव विभाग का वन मित्र (वनों का मित्र) पुरस्कार मिला, जिससे वे इस सम्मान के पहले प्राप्तकर्ता बने। इसके बाद केरल सरकार ने उन्हें साल 2010 में हरित व्यक्ति (हरित व्यक्तित्व) पुरस्कार से सम्मानित किया। इसके साथ ही उन्हें ए.वी. अब्दुल रहमान हाजी पुरस्कार, कन्नूर विश्वविद्यालय का आचार्य पुरस्कार और बाला साहित्य संस्थान पुरस्कार भी मिले थे। इसके बाद उन्होंने साल 2014 में पी.एस. गोपीनाथन नायर पर्यावरण पुरस्कार जीता। इस तरह से उनके काम के बहुत सराहा गया। वह अपने जीवन में प्रकृति से जुड़े कामों में व्यस्त रहे, 27 सितंबर 2015 में 78 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई। लेकिन आज भी उनके लगाए हुए मैंग्रोव के जंगल, तटों पर हरे भरे खड़े हैं और आज भी वो तटों की रक्षा कर रहे हैं।

उनके जाने के बाद भी उनका काम नहीं रुका। उनका काम आज भी एक मिसाल बना हुआ है। उन्होंने पूरे समाज को दिखा दिया कि बग़ैर नाम, कथित ऊंची जाति और पैसे या किसी बड़े संगठन के सहयोग के बिना भी कोई बड़ा काम किया जा सकता है और अपना असर छोड़ा जा सकता है।उनका परिवार और उनके साथ काम करने वाले लोग आज भी उनके मिशन को ज़िंदा रखे हुए हैं। मैंग्रोव के संरक्षण के लिए ट्रस्ट बन गए हैं, नर्सरी चल रही है और नई पीढ़ी को सिखाया जाता है कि इस काम को कैसे आगे बढ़ाया जाए। उन्होंने न स्कूल-कॉलेज का सहारा लिया, न किसी बड़े संगठन की छाया ली। बस अपनी जिद, हौसले और अनुभव से उन्होंने केरल के तटीय इलाकों में एक नई जान फूंक दी। उनका सफर ये बताता है कि पर्यावरण की रक्षा किसी सरकार या संस्था की जिम्मेदारी भर नहीं, ये हम सबका काम है। जब लोग उन्हें मैंग्रोव मैन कहते हैं, तो वो महज एक नाम नहीं, बल्कि उसमें उनकी मेहनत, संघर्ष और दूसरों के लिए मिसाल छुपी होती है।

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