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भगवान शिव क्यों पहनते हैं बाघ की खाल? जानिए बाघाम्बर धारण करने के पीछे की रहस्यमयी पौराणिक कथा

भगवान शिव क्यों पहनते हैं बाघ की खाल? जानिए बाघाम्बर धारण करने के पीछे की रहस्यमयी पौराणिक कथा

Girls Globe 1 week ago

नातन परंपरा में भगवान शिव को 'भोलेनाथ', 'महाकाल' और 'रुद्र' जैसे कई नामों से पूजा जाता है। जहां अन्य देवी-देवता भव्य वस्त्रों और आभूषणों से सुशोभित होते हैं, वहीं भगवान शिव का स्वरूप पूरी तरह वैराग्य, त्याग और संन्यास का प्रतीक है।

उनके मस्तक पर चंद्रमा, जटाओं में गंगा, गले में सर्प, शरीर पर भस्म और कमर में बाघ की खाल (मृगचर्म/व्याघ्रचर्म) शोभायमान होती है। शिवजी को ‘बाघाम्बर’ भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है बाघ की खाल को वस्त्र के रूप में धारण करने वाला। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर महादेव ने बाघ की खाल को ही अपना वस्त्र और आसन क्यों बनाया? इसके पीछे शिव पुराण और अन्य धर्मग्रंथों में एक बेहद रोचक और शिक्षाप्रद पौराणिक कथा का वर्णन मिलता है।

शिव पुराण की कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव सृष्टि के कल्याण और संन्यास के गूढ़ सत्य को समझाने के लिए नग्न अवधूत (दिगंबर) रूप धारण करके दारुक वन (एक घने जंगल) में पहुंचे। उस वन में कई तपस्वी ऋषि अपनी पत्नियों और शिष्यों के साथ आश्रम बनाकर रहते थे। उन ऋषियों को अपनी कठिन तपस्या, यज्ञ और कर्मकांडों पर बहुत ज्यादा अहंकार हो गया था। वे खुद को ही सृष्टि का सबसे बड़ा ज्ञानी और श्रेष्ठ मानने लगे थे। महादेव उनके इसी अहंकार को नष्ट करना चाहते थे।

जब भगवान शिव उस वन से गुजरे, तो उनके अत्यंत दिव्य, तेजस्वी और अलौकिक रूप को देखकर वन के जीव-जंतु और ऋषियों की पत्नियां मंत्रमुग्ध हो गईं। जब ऋषियों ने यह दृश्य देखा, तो वे अज्ञानतावश महादेव को पहचान नहीं पाए और अत्यधिक क्रोधित व ईर्ष्यालु हो उठे। अपने तपोबल और अहंकार के वशीभूत होकर ऋषियों ने शिवजी को नष्ट करने के लिए एक विशाल और विनाशकारी तांत्रिक यज्ञ का आयोजन किया। उस यज्ञ की अग्नि से उन्होंने एक अत्यंत विशाल, भयानक और आदमखोर बाघ उत्पन्न किया और उसे शिवजी को मार डालने के लिए उनके पीछे छोड़ दिया।

जैसे ही वह विकराल बाघ दहाड़ता हुआ भगवान शिव पर झपटा, महादेव ने केवल अपनी एक उंगली के स्पर्श से उस मायावी और हिंसक बाघ की शक्ति को निष्प्रभावी कर दिया। उन्होंने बिना किसी शस्त्र के उस हिंसक पशु का वध कर दिया और उसकी खाल (चर्म) को अपने हाथों से उतार लिया। इसके बाद भगवान शिव ने उसी बाघ की खाल को अपने शरीर पर वस्त्र की तरह लपेट लिया और उसी पर ध्यान की मुद्रा में बैठ गए। यह देखकर ऋषियों का सारा घमंड चूर-चूर हो गया। उन्हें तुरंत आभास हो गया कि यह कोई साधारण साधु नहीं, बल्कि साक्षात जगत्पिता देवाधिदेव महादेव हैं। सभी ऋषि उनके चरणों में गिर पड़े और क्षमा याचना करने लगे।

भगवान शिव द्वारा बाघाम्बर धारण करने के पीछे केवल कथा ही नहीं, बल्कि गूढ़ आध्यात्मिक संदेश भी छिपा हुआ है:

  • क्रोध, वासना और अहंकार पर विजय: बाघ को प्रकृति में शक्ति, आक्रामकता, अनियंत्रित क्रोध और अदम्य वासना का प्रतीक माना जाता है। भगवान शिव द्वारा बाघ का वध कर उसकी खाल को आसन और वस्त्र बनाना यह दर्शाता है कि सच्चा योगी वह है जिसने अपनी इंद्रियों, क्रोध, घमंड और हिंसक प्रवृत्तियों को पूरी तरह अपने वश में कर लिया हो।

  • भय और मृत्यु से मुक्ति: बाघ वन का सबसे खूंखार और जानलेवा शिकारी है, जिससे हर कोई डरता है। महादेव ने उसे अपने पैरों के नीचे आसन बनाकर यह सिद्ध किया कि जो शिव की शरण में है, उसे संसार के किसी भय या काल (मृत्यु) का डर नहीं सता सकता।

  • प्रकृति और वैराग्य का संतुलन: यह स्वरूप यह भी सिखाता है कि शिव सांसारिक दिखावे और भौतिक सुख-सुविधाओं से परे हैं। वे केवल सत्य, ध्यान और आत्मज्ञान में स्थित रहते हैं।

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