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बुढ़ापा रोकने और हमेशा सत्ता में रहने के लिए पुतिन का गुप्त मिशन; अमरता की खोज में पानी की तरह बहाए ₹2 लाख करोड़

बुढ़ापा रोकने और हमेशा सत्ता में रहने के लिए पुतिन का गुप्त मिशन; अमरता की खोज में पानी की तरह बहाए ₹2 लाख करोड़

Girls Globe 1 week ago

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की छवि हमेशा से दुनिया के सामने एक बेहद ताकतवर, ऊर्जावान और फिट नेता की रही है। कभी वे शिकार करते नजर आते हैं, कभी घुड़सवारी करते तो कभी कड़ाके की ठंड में बर्फीले पानी में तैरते और आइस हॉकी खेलते दिखते हैं।

लेकिन इस भारी-भरकम और फौलादी इमेज के पीछे एक ऐसी सच्चाई छिपी है, जिसने पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों और खुफिया एजेंसियों को हैरान कर दिया है।

एक बेहद सनसनीखेज अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट से पता चला है कि लगभग 80 साल की उम्र के करीब पहुंच रहे पुतिन अब बुढ़ापे को मात देने और हमेशा के लिए सत्ता पर काबिज रहने का एक गुप्त रास्ता तलाश रहे हैं। इसके लिए रूस में एक विशाल और बेहद सीक्रेट एंटी-एजिंग प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है, जिसमें पुतिन ने करीब 26 अरब डॉलर (यानी भारतीय रुपयों में 2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा) का भारी-भरकम निवेश किया है। इस प्रोजेक्ट को आधिकारिक फाइलों में ‘न्यू हेल्थ प्रिजर्वेशन टेक्नोलॉजीज’ नाम दिया गया है।

हॉट-माइक पर लीक हुई शी जिनपिंग के साथ सीक्रेट बातचीत

इस रहस्यमयी प्रोजेक्ट की चर्चा तब और तेज हो गई जब बीजिंग में आयोजित एक सैन्य परेड के दौरान पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई एक बेहद निजी बातचीत का हिस्सा ‘हॉट-माइक’ (गलती से चालू रह गए माइक) पर रिकॉर्ड हो गया।

लीक हुई बातचीत का अंश:

‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पुतिन को शी जिनपिंग से बेहद धीमी आवाज में यह कहते सुना गया था कि विज्ञान इतनी तेजी से तरक्की कर रहा है कि इंसान बहुत जल्द अपने खराब और बूढ़े हो चुके अंगों को नए अंगों से बदलकर अमरता हासिल कर सकता है।

शुरुआत में दुनिया ने इसे दो बुजुर्ग नेताओं के बीच की एक सामान्य और काल्पनिक बातचीत मानकर छोड़ दिया था। लेकिन अब रूस के आधिकारिक बजट दस्तावेजों और सरकारी फाइलों से जो आंकड़े बाहर आए हैं, वे साबित करते हैं कि पुतिन इस ख्वाब को सच करने के लिए अरबों डॉलर पानी की तरह बहा रहे हैं। वैसे, पुतिन अकेले ऐसे इंसान नहीं हैं; सिलिकॉन वैली के अमेरिकी अरबपति जेफ बेजोस और सैम ऑल्टमैन भी इसी तरह की ‘उम्र को रोकने’ वाली रिसर्च पर भारी निवेश कर रहे हैं।

कैसे काम करती है पुतिन की ‘एंटी-एजिंग’ तकनीक?

रूसी वैज्ञानिकों को जो टास्क दिया गया है, उसके तहत इंसानी उम्र को खींचकर 120 साल तक ले जाना है। इसके लिए जिन तकनीकों पर काम हो रहा है, वे किसी हॉलीवुड की साइंस-फिक्शन फिल्म जैसी लगती हैं:

तकनीक का नामयह कैसे काम करती है?इसका मुख्य उद्देश्य क्या है?
जेनोट्रांसप्लांटेशन (Xenotransplantation)लैब में जेनेटिकली मॉडिफाइड ‘मिनी-पिग्स’ (छोटे सूअरों) के अंदर इंसानी अंगों को विकसित करना।दिल, किडनी या लीवर खराब होने पर सूअरों के शरीर से निकालकर इंसानी शरीर में फिट करना।
3D बायोप्रिंटिंग (3D Bioprinting)असली इंसानी टिश्यूज (ऊतकों) और जीवित कोशिकाओं को मशीनों के जरिए प्रिंट करना।खराब अंगों की जगह तुरंत नए और लैब में बने अंगों को तैयार करना।
क्रायोथेरेपी (Cryotherapy)इंसान के शरीर को कुछ समय के लिए जानलेवा माइनस डिग्री तापमान के संपर्क में रखना।बूढ़े हो चुके सेल्स और टिश्यूज को अचानक रीसेट कर बुढ़ापे की रफ्तार को थामना।
जीन और पेप्टाइड थेरेपीसीधे डीएनए के अंदर जाकर कोशिकाओं के बूढ़े होने के जैविक चक्र को धीमा करना।रूस के टॉप गेरेंटोलॉजिस्ट के अनुसार, इंसान को आसानी से 120 साल की उम्र तक जिंदा रखना।

रूसी सरकार का दावा है कि इस अत्याधुनिक रिसर्च और मेडिकल क्रांति के जरिए वे इस दशक के अंत तक करीब 1.75 लाख रूसी नागरिकों की जान बचा सकेंगे। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि यह संख्या ठीक उतनी ही है, जितने रूसी सैनिक यूक्रेन युद्ध में मारे जा चुके हैं।

पुतिन की बेटी संभाल रही हैं इस सीक्रेट मिशन की कमान

इस प्रोजेक्ट को इतना गुप्त और संवेदनशील रखा गया है कि पुतिन ने इसके लिए किसी भी बाहरी अधिकारी या वैज्ञानिक पर भरोसा नहीं किया। इस पूरे मिशन की कमान सीधे पुतिन की अपनी बेटी मारिया वोरोनत्सोवा के हाथों में है। मारिया खुद रूस की एक जानी-मानी एंडोक्रिनोलॉजिस्ट और जेनेटिक्स (आनुवंशिकी) एक्सपर्ट हैं।

मारिया के साथ इस मिशन में रूस के सबसे प्रतिष्ठित कुर्कातोव इंस्टीट्यूट के प्रमुख और मशहूर भौतिक विज्ञानी मिखाइल कोवलचुक भी शामिल हैं। हालांकि, रूस के ही कुछ अंदरूनी वैज्ञानिकों का दबी जुबान में यह भी कहना है कि सरकारी फंड हासिल करने और पुतिन को खुश रखने के लिए बड़े अधिकारी इस प्रोजेक्ट के नतीजों को कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं। इसके अलावा, यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए कड़े प्रतिबंधों के कारण रूसी वैज्ञानिक पूरी दुनिया से अलग-थलग होकर यह रिसर्च कर रहे हैं, जिससे उन्हें आधुनिक उपकरणों को हासिल करने में भी काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

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