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Chaitra Shukla Ekadashi 2026 : कामदा एकादशी पर बरसेगी श्रीहरि की असीम कृपा जानें कब है व्रत, शुभ मुहूर्त और कथा

Chaitra Shukla Ekadashi 2026 : कामदा एकादशी पर बरसेगी श्रीहरि की असीम कृपा जानें कब है व्रत, शुभ मुहूर्त और कथा

Girls Globe 1 month ago

News India Live, Digital Desk: सनातन धर्म में एकादशी व्रत का महत्व सर्वोपरि माना गया है, और जब बात चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की 'कामदा एकादशी' (Kamada Ekadashi) की हो, तो इसका फल अनंत गुना बढ़ जाता है।

साल 2026 में यह एकादशी भक्तों के लिए विशेष फलदायी संयोग लेकर आ रही है। शास्त्रों के अनुसार, कामदा एकादशी का व्रत करने से साधक की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और अनजाने में हुए घोर पापों का भी नाश हो जाता है। भगवान विष्णु के ‘श्रीधर’ स्वरूप की पूजा के लिए समर्पित यह दिन मोक्ष का द्वार खोलने वाला माना गया है।

कामदा एकादशी 2026: तिथि और पारण का शुभ मुहूर्त

ज्योतिष गणना के अनुसार, चैत्र शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का प्रारंभ और समापन इस प्रकार होगा:

एकादशी तिथि प्रारंभ: 28 मार्च 2026, शाम 07:14 बजे से।

एकादशी तिथि समाप्त: 29 मार्च 2026, रात 08:32 बजे तक।

व्रत की तिथि (उदयातिथि): 29 मार्च 2026, रविवार।

पारण का समय: 30 मार्च 2026, सुबह 06:14 से 08:42 के बीच।

रविवार का दिन होने के कारण इस एकादशी पर ‘रवि योग’ का भी निर्माण हो रहा है, जो सूर्य के समान तेज और आरोग्य प्रदान करने वाला है।

कामदा एकादशी की व्रत कथा: गंधर्व पुण्डरीक और अप्सरा ललिता का उद्धार

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में भोगीपुर नगर के राजा पुण्डरीक के दरबार में ‘ललित’ नाम का गंधर्व और उसकी पत्नी ‘ललिता’ नाम की अप्सरा रहते थे। एक बार गायन के समय ललित का मन अपनी पत्नी की यादों में भटक गया, जिससे ताल बिगड़ गई। क्रोधित होकर राजा ने ललित को ‘राक्षस’ होने का श्राप दे दिया। पति के कष्ट से दुखी ललिता ने श्रृंगी ऋषि की शरण ली। ऋषि के परामर्श पर ललिता ने चैत्र शुक्ल एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया और उसका पुण्य अपने पति को अर्पित कर दिया। इस व्रत के प्रभाव से ललित राक्षस योनि से मुक्त होकर पुनः दिव्य स्वरूप प्राप्त कर सका। तभी से इस एकादशी को ‘कामदा’ (कामना पूर्ण करने वाली) कहा जाने लगा।

पूजा विधि: ऐसे करें श्रीहरि को प्रसन्न

कामदा एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान के बाद पीले वस्त्र धारण करें। भगवान विष्णु की मूर्ति को गंगाजल से स्नान कराकर पीले फूल, ऋतु फल, अक्षत और तुलसी दल अर्पित करें। याद रखें, तुलसी के बिना विष्णु जी की पूजा अधूरी मानी जाती है। व्रत के दौरान ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का निरंतर जाप करें और रात्रि में जागरण कर भजन-कीर्तन करें। अगले दिन ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देने के बाद ही व्रत का पारण करें।

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