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'एक्टर नहीं होता तो अंडरवर्ल्ड में होता', स्टार जिसका नवाजुद्दीन से भी टफ रहा स्ट्रगल

'एक्टर नहीं होता तो अंडरवर्ल्ड में होता', स्टार जिसका नवाजुद्दीन से भी टफ रहा स्ट्रगल

Girls Globe 1 week ago

भारतीय सिनेमा और बॉलीवुड की चकाचौंध भरी दुनिया में अपनी अमिट पहचान बनाना और सफलता के शिखर पर पहुंचना कोई मामूली बात नहीं है। जब भी संघर्ष और जमीनी स्तर से उठकर स्टार बनने वाले कलाकारों की बात होती है, तो अक्सर नवाजुद्दीन सिद्दीकी, पंकज त्रिपाठी और मनोज बाजपेयी जैसे मंझे हुए अभिनेताओं के नाम हमारे जेहन में आते हैं।

इन सितारों ने कई मंचों पर अपनी तंगहाली और शुरुआती दिनों के मुश्किल दौर की दास्तां बयां की है। लेकिन हिंदी सिनेमा में एक ऐसा भी लीजेंडरी सुपरस्टार है, जिसकी रोंगटे खड़े कर देने वाली जीवन यात्रा और बचपन का कड़ा संघर्ष इन सभी समकालीन अभिनेताओं से कहीं ज्यादा दर्दनाक और कठिन रहा है। इस बेबाक स्टार ने एक इंटरव्यू में कैमरे के सामने सरेआम यह चौंकाने वाला बयान दिया था कि “यदि मैं आज एक एक्टर नहीं होता, तो निश्चित रूप से अंडरवर्ल्ड का हिस्सा होता।” हम बात कर रहे हैं अपनी कड़क आवाज और लाजवाब अभिनय से दर्शकों के दिलों पर राज करने वाले महान अभिनेता नाना पाटेकर की।

महज 13 साल की उम्र में नौकरी और ₹35 की तनख्वाह: नाना पाटेकर के बचपन की वो कड़वी हकीकत

नाना पाटेकर की स्क्रीन पर दिखने वाली आक्रामकता और उनके बात करने के अनूठे देसी लहजे पर भले ही फिल्म इंडस्ट्री के कुछ आलोचकों ने समय-समय पर सवाल उठाए हों, लेकिन उनकी अभिनय क्षमता का लोहा पूरी दुनिया मानती है। नाना पाटेकर के अभिनय की दुनिया में स्थापित होने से पहले का जीवन इतना त्रासद और चुनौतीपूर्ण था कि उसकी कल्पना करना भी आज के दौर में मुश्किल है।

नाना पाटेकर ने अपने जीवन के काले दिनों को याद करते हुए एक बार बताया था कि घरेलू तंगहाली के कारण उन्हें महज 13 साल की छोटी सी उम्र में काम की तलाश में निकलना पड़ा और वे नौकरी करने लगे। नाना के शब्दों में, “आर्थिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बोझ ने हमारी उम्र को बहुत जल्दी 13 से सीधे 30 वर्ष जैसा गंभीर बना दिया। उस दौर में हमें दिन भर में सिर्फ एक वक्त का खाना नसीब होता था और पूरे महीने की कड़ी मजदूरी के बदले सिर्फ 35 रुपये की तनख्वाह मिलती थी। इसके बाद हमें स्कूल भी जाना होता था। जब हम नौवीं कक्षा में पढ़ रहे थे, तब भी हम पढ़ाई के साथ-साथ कठिन नौकरी कर रहे थे।” नाना पाटेकर का मानना है कि जीवन में आपके हालात और आपकी मजबूरियां ही आपकी मानसिक उम्र को तय करती हैं।

दौलत के नाम पर घर में थे सिर्फ मां-बाप: पैसों को लेकर नाना के विचार

अपने इसी भावुक साक्षात्कार में नाना पाटेकर ने पारिवारिक पृष्ठभूमि का जिक्र करते हुए कहा था कि जब उन्होंने होश संभाला, तो उनके पास माता-पिता का प्यार और आशीर्वाद तो पूरा था, लेकिन उनके पास भौतिक सुख-सुविधाओं के नाम पर कुछ भी नहीं था। पैसों की किल्लत से जूझने के बावजूद क्या नाना पाटेकर यह मानते हैं कि जीवन में बिना पैसों के सब कुछ व्यर्थ है? इसका जवाब नाना बिल्कुल अलग और दार्शनिक अंदाज में देते हैं।

नाना पाटेकर के मुताबिक, जीवन की वास्तविक और सच्ची खुशी कभी भी पैसों की तिजोरियों से नहीं आती। उन्होंने पैसों की अहमियत पर तंज कसते हुए कहा था, “आप जरूरत से ज्यादा पैसों का आख़िर करोगे भी क्या? इंसानी आंखों के कोई दांत तो होते नहीं हैं जो वह नोटों और पैसों को चबाकर खा सकें। जीवन के उस मोड़ पर जब पैसा आपकी बुनियादी तकलीफों और किसी भूखे की भूख को शांत करने के काम न आए, तो वह सिर्फ कागज के बेजान टुकड़े के समान है। पैसा केवल तभी सार्थक है जब वह किसी लाचार और जरूरतमंद के काम आ सके।”

‘ताजी रोटी खानी है तो पैसे भी ताजे कमाओ यार’: बासी पैसे बटोरने के खिलाफ हैं नाना

फिल्म इंडस्ट्री में मिलने वाले अंधाधुंध पैसे और आलीशान लाइफस्टाइल पर बेबाकी से बात करते हुए नाना पाटेकर ने कहा कि आज सिनेमा जगत में कलाकारों को जितनी मोटी रकम और शोहरत मिलती है, वास्तव में एक आम इंसान को सम्मान से जीने के लिए उतनी अधिक जरूरत होती ही नहीं है। नाना पाटेकर ने एक बेहद खूबसूरत संदेश देते हुए कहा, “जब आपको रोज खाने के लिए एकदम ताजी रोटी और हरी सब्जी चाहिए, तो फिर पैसे भी रोज मेहनत करके ताजे कमाओ यार। उसे बैंकों में बासा करके और जरूरत से ज्यादा ब्लॉक करके क्यों जमा रखे हुए हो?”

उन्होंने एक बेहद मार्मिक संस्मरण साझा करते हुए बताया कि एक बार जब उनसे किसी शो में पूछा गया था कि दुनिया की तमाम महंगी परफ्यूम और इत्र में से आपको सबसे बेहतरीन खुशबू किस चीज की लगती है? तो नाना ने बिना एक पल गंवाए जवाब दिया था- “तवे पर सिकती हुई ताजी रोटी की खुशबू।” ऐसा इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने जीवन में एक ऐसा भयावह दौर भी देखा है जब उनके पास खाने के लिए दो वक्त की सूखी रोटी तक मयस्सर नहीं होती थी।

शहरी जीवन की कृत्रिमता और बहुमंजिला इमारतों के बंद कमरों पर कटाक्ष करते हुए नाना पाटेकर ने कहा कि आज के आधुनिक महानगरों में रहने वाले इंसानों का विशाल आसमान अब उनके घरों की छोटी सी खिड़की जितना सीमित होकर रह गया है। हमने खुद को चार दीवारों के भीतर कैद करके अपनी खुशियों, अपने रिश्तों और अपने पूरे वजूद को बेहद छोटा और संकीर्ण बना लिया है। नाना की यह कहानी हमें सिखाती है कि इंसान का हौसला अगर मजबूत हो, तो वह अंडरवर्ल्ड के अंधेरे रास्तों को छोड़कर कला के जरिए पूरी दुनिया को अपना मुरीद बना सकता है।

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