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Kerala Mysterious Temple : खून से नहलाया जाता है मंदिर, दी जाती हैं गालियां केरल के इस रहस्यमयी धाम की परंपरा जान कांप जाएगी रूह

Kerala Mysterious Temple : खून से नहलाया जाता है मंदिर, दी जाती हैं गालियां केरल के इस रहस्यमयी धाम की परंपरा जान कांप जाएगी रूह

Girls Globe 6 days ago

News India Live, Digital Desk: भारत अपनी विविध संस्कृतियों और रहस्यों के लिए दुनिया भर में मशहूर है। देवभूमि कहे जाने वाले केरल में एक ऐसा मंदिर है, जिसके बारे में सुनकर आधुनिक समाज के लोग दांतों तले उंगली दबा लेते हैं।

हम बात कर रहे हैं केरल के त्रिशूर जिले में स्थित ‘कोडुंगल्लूर भगवती मंदिर’ की। यहाँ साल में एक बार होने वाले ‘मीनम भरणी’ उत्सव के दौरान जो कुछ भी होता है, वह न केवल हैरान करने वाला है बल्कि रोंगटे खड़े कर देने वाला भी है। इस उत्सव में भक्त देवी को प्रसन्न करने के लिए उन्हें अपशब्द कहते हैं और खुद को लहूलुहान कर लेते हैं।

माँ भद्रकाली का प्रचंड स्वरूप और सदियों पुराना इतिहास

कोडुंगल्लूर मंदिर को देवी भद्रकाली के सबसे शक्तिशाली शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यहाँ देवी का स्वरूप अत्यंत रौद्र है। मंदिर का इतिहास 2000 साल से भी पुराना बताया जाता है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण चेरा राजाओं द्वारा कराया गया था। यहाँ देवी की मूर्ति लकड़ी से बनी है और उनके आठ हाथ हैं, जिनमें विभिन्न अस्त्र-शस्त्र सुशोभित हैं। मंदिर की वास्तुकला केरल की पारंपरिक शैली का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

‘मीनम भरणी’ उत्सव: गालियों और रक्त से जुड़ा रहस्य

इस मंदिर की सबसे विचित्र और विवादास्पद परंपरा ‘मीनम भरणी’ उत्सव के दौरान देखने को मिलती है। सात दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में हजारों भक्त लाल वस्त्र पहनकर हाथों में तलवारें लेकर मंदिर पहुँचते हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि भक्त मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही देवी को भद्दी-भद्दी गालियां देना शुरू कर देते हैं। लोक मान्यताओं के अनुसार, ऐसा करने से देवी का क्रोध शांत होता है। इतना ही नहीं, भक्त अपनी ही तलवारों से अपने सिर पर प्रहार करते हैं, जिससे निकला खून मंदिर की दीवारों और विग्रह पर चढ़ाया जाता है।

क्यों दी जाती हैं देवी को गालियां?

इस अजीबोगरीब परंपरा के पीछे कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार, देवी काली ने जब राक्षस दारुका का वध किया था, तो उनके क्रोध को शांत करने के लिए भगवान शिव ने अपने गणों को देवी को रिझाने और शांत करने का आदेश दिया था। गालियां और शोर-शराबा उसी प्राचीन अनुष्ठान का हिस्सा माना जाता है। हालांकि, आधुनिक युग में कई लोग इसे केवल एक प्रतीकात्मक प्रथा मानते हैं, लेकिन भक्तों की आस्था आज भी उतनी ही अडिग है।

चंदन के लेप से शांत किया जाता है देवी का क्रोध

उत्सव के समापन के बाद, मंदिर को साफ किया जाता है और देवी की मूर्ति पर भारी मात्रा में चंदन का लेप लगाया जाता है। माना जाता है कि चंदन की शीतलता देवी के उस रौद्र रूप को शांत करती है जो उत्सव के दौरान जागृत हुआ था। इस दौरान मंदिर के कपाट कुछ दिनों के लिए बंद कर दिए जाते हैं और केवल पुजारी ही भीतर प्रवेश कर सकते हैं। केरल के इस मंदिर में होने वाला यह आयोजन न केवल धार्मिक है, बल्कि समाजशास्त्रियों के लिए शोध का विषय भी बना रहता है।

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