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रूस-चीन की बढ़ती नजदीकी और पेट्रो-डॉलर पर खतरा, भारत के लिए नई आर्थिक और कूटनीतिक चुनौती

रूस-चीन की बढ़ती नजदीकी और पेट्रो-डॉलर पर खतरा, भारत के लिए नई आर्थिक और कूटनीतिक चुनौती

Girls Globe 2 months ago

News India Live, Digital Desk: अमेरिका-ईरान युद्ध की आग के बीच वैश्विक राजनीति में एक ऐसा गठबंधन मजबूत हो रहा है, जो आने वाले समय में भारत की अर्थव्यवस्था और 'पेट्रो-डॉलर' (Petro-Dollar) के वर्चस्व के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।

रूस और चीन के बीच बढ़ती रणनीतिक नजदीकी और ईरान के साथ उनका ‘त्रिकोणीय नेक्सस’ (Nexus) भारत के लिए दोहरी मुसीबत लेकर आया है। एक तरफ जहां ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) दांव पर है, वहीं दूसरी तरफ वैश्विक व्यापार में डॉलर की घटती अहमियत भारत की मुद्रा ‘रुपये’ पर दबाव बढ़ा रही है।

पेट्रो-डॉलर संकट: क्या खत्म होगा डॉलर का राज?

दशकों से दुनिया भर में तेल का व्यापार अमेरिकी डॉलर में होता रहा है, जिसे ‘पेट्रो-डॉलर’ कहा जाता है। रूस और चीन अब इस सिस्टम को चुनौती दे रहे हैं:

पेट्रो-युआन की एंट्री: चीन और रूस अब अपने तेल सौदों के लिए चीनी मुद्रा ‘युआन’ का उपयोग कर रहे हैं। ईरान भी इस वैकल्पिक भुगतान प्रणाली (CIPS) में शामिल हो रहा है।

भारत पर असर: यदि तेल व्यापार डॉलर से हटकर युआन या रूबल में शिफ्ट होता है, तो वैश्विक बाजारों में डॉलर कमजोर होगा। भारत जैसे देश, जो अपना विदेशी मुद्रा भंडार डॉलर में रखते हैं, उन्हें अपनी करेंसी ‘रुपये’ को स्थिर रखने में भारी कठिनाई होगी। इसके अलावा, चीनी युआन का मजबूत होना एशिया में चीन के आर्थिक दबदबे को और बढ़ा देगा।

रूस-चीन-ईरान नेक्सस: भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ को चुनौती

अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमलों के बाद रूस और चीन ने खुलकर ईरान का साथ दिया है। रूस जहां ईरान को रक्षा तकनीक और ड्रोन्स की सप्लाई कर रहा है, वहीं चीन ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है।

ऊर्जा की राजनीति: होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बंद होने से भारत की तेल आपूर्ति बाधित हुई है। इस संकट के समय रूस ने भारत को रियायती दरों पर तेल देने का प्रस्ताव तो दिया है, लेकिन चीन के साथ रूस की गहरी दोस्ती भारत के लिए चिंता का विषय है। भारत को डर है कि रूस अपनी विदेश नीति में चीन के हितों को प्राथमिकता दे सकता है।

सप्लाई चेन पर कब्जा: चीन और रूस मिलकर एक ऐसी वैकल्पिक सप्लाई चेन बना रहे हैं जो पश्चिमी प्रतिबंधों (Sanctions) से मुक्त है। भारत के लिए इस ‘नॉन-वेस्टर्न’ ब्लॉक और अमेरिका के बीच संतुलन बनाना मुश्किल होता जा रहा है।

भारत के लिए 3 बड़े खतरे: महंगाई, व्यापार और मुद्रा

ईंधन की मार: रूस-चीन की नजदीकी के कारण वैश्विक तेल बाजार में गुटबाजी बढ़ रही है। यदि भारत को डॉलर के बजाय अन्य मुद्राओं में व्यापार करने के लिए मजबूर किया जाता है, तो लेनदेन की लागत बढ़ जाएगी, जिससे देश में पेट्रोल-डीजल और गैस की कीमतें 150 रुपये के पार पहुंच सकती हैं।

व्यापार घाटा: रूस अब भारत के बजाय चीन को तेल की सप्लाई में प्राथमिकता दे रहा है। इसके साथ ही, चीन अपने ‘युआन’ को व्यापारिक मुद्रा बनाने के लिए भारत पर दबाव डाल सकता है, जिससे भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा और अधिक बढ़ जाएगा।

डॉलर का अवमूल्यन: वैश्विक स्तर पर डॉलर की मांग घटने से भारतीय रुपया दुनिया की अन्य प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले और अधिक गिर सकता है, जिससे आयात (Import) महंगा हो जाएगा और देश में महंगाई (Inflation) बेकाबू हो सकती है।

विकल्प क्या है? ‘रुपी-पेमेंट’ और ब्रिक्स (BRICS) की भूमिका

इस संकट से निपटने के लिए भारत अब रूस और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देशों के साथ ‘रुपये’ में व्यापार करने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, रूस के पास पहले से ही काफी भारतीय रुपया जमा है, जिसे वह खपा नहीं पा रहा है। ऐसे में भारत अब ब्रिक्स (BRICS) देशों के भीतर एक साझा मुद्रा (Common Currency) बनाने की चर्चा को तेज कर रहा है, ताकि वह चीन के ‘युआन’ और अमेरिका के ‘डॉलर’ के बीच अपनी एक स्वतंत्र राह बना सके।

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