Hindi Kahani : गर्मियों की छुट्टियां हमारे जीवन के वो पल होते है जिसका हम सब पूरा साल इंतजार करते है। इधर परीक्षा खतम हुई नहीं, उधर हम नानी के घर दौड़ लगाते है, मानो यहां हमें किसीने सजा के तौर पर बाँध के रखा हो।
वैसे तो परीक्षा की सूची तैयार होती है उससे पहले हमारा सामान तैयार हो जाता है।
वो भी क्या दिन थे जब हम भी नानी के घर जाने के लिए उतावले होते थे। मौसी और मामा के बच्चों के साथ मिलकर बहुत मस्ती करते थे। नानी के पडोसवाले घरों में भी कुछ ऐसा ही माहौल बना रहता था। हर साल वे सभी अपनी अपनी नानी के घर आते थे तो वहां भी हमारी मित्र मंडली हल्ला गुल्ला कर के पूरे मोहल्ले को जीवंत बना देती थी। पूरा दिन और सारी रातें खेलने में इतने डूब जाते थे कि समय का कुछ पता ही नहीं चलता था। क्रिकेट, शतरंज, लुकाछिपी, कबड्डी, खो खो और बैडमिंटन के तो सारे नियम कंठस्थ हो गए थे। देर शाम तक खेलते रहते थे। थकान क्या होती है ये भी पता नहीं रहता था। सूरज तो कब का ढल चूकता था। हमारी मम्मी हमें ढूंढ़ने नीकलती थी।
उस वक्त हमारे साथ एक छोटा बच्चा खेलने आया करता था। उसका नाम तो पता नहीं था पर उसकी नानी उसे मुन्ना कहके पुकारा करती थी तो हम सब भी उसे मुन्ना ही कहते थे। रोज जब शाम ढलने लगती और अंधेरा छाने लगता तो उसकी नानी उसे, " ऐ... मुन्ना " कहके घर लौटने को बुलाती। नानी का वो लहजा हमें इतना अच्छा लगता था कि जब तक वो दो तीन बार ना बुलाती, हम मुन्ने को जाने ही नहीं देते और जब वो जाता तो हम पीछे से "ऐ... मुन्ना"की आवाज़ लगाते थे। शुरू शुरू में तो उसे कुछ पता न चलता लेकिन जब उसे पता चला कि हम उसकी मजाक कर रहे हैं तो वो जोर जोर से चिल्लाने लगता था," मैं कल से आप लोगों के साथ खेलने नहीं आउंगा।" लेकिन अगले दिन वो सब से पहले हम सब को बुलाने आ जाता था।
वाकई, हम उसको बहुत ज्यादा परेशान किया करते थे। उसे रोता हुआ देखकर हम ओर ज्यादा ठिठोली किया करते थे। आज वो सब याद आता है तो सचमुच अपने आप में शर्मिंदगी महसूस होती है लेकिन फिर भी एक बात तो है कि जब भी बचपन के वो दिन, वो नानी का घर, वो हमारी शरारती हरकतें याद आती हैं तो "ऐ... मुन्ना " याद आए बिना नहीं रहता।
श्रीमती जुली राजेश खारोड

