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'अमिया' बचपन की खट्टी-मीठी यादें - गृहलक्ष्मी की कहानियां

'अमिया' बचपन की खट्टी-मीठी यादें - गृहलक्ष्मी की कहानियां

Hindi Kahani : मेरे लिए वह शब्द है—'अमिया'। यह एक शब्द नहीं, मेरे बचपन की पूरी एलबम है।
जैसे ही कोई कहता है—'अमिया', मुझे तुरंत अपनी नानी का घर याद आ जाता है। गाँव का वह बड़ा-सा आँगन, बीच में लगा हुआ आम का पेड़ और उस पेड़ के नीचे डाली गई खाट।

गर्मियों की छुट्टियाँ मतलब नानी का घर। मम्मी-पापा हम चारों भाई-बहनों को ट्रेन में बैठाकर नानी के घर छोड़ आते थे और पूरे दो महीने हम वहीं के राजा होते थे। सुबह पाँच बजे नानी की आवाज आती—“उठो, देखो कैसे तोते आम खा रहे हैं।” हम सब दौड़कर आँगन में पहुँच जाते।
नानी के घर में फ्रिज नहीं था, लेकिन मिट्टी की बड़ी-बड़ी बरनियाँ थीं। एक बरनी सिर्फ अमिया के नाम की थी। नानी रोज सुबह पेड़ से गिरी हुई कच्ची अमियाँ चुनकर लातीं। हम बच्चे उनके पीछे-पीछे टोकरी लेकर चलते।

फिर क्या होता था? नानी आँगन में चटाई बिछातीं, अमिया काटतीं और उसमें नमक, मिर्च और थोड़ा-सा सरसों का तेल मिलातीं। हम सब भाई-बहन गोल-गोल बैठकर उसी समय हाथ से खाने लगते। जीभ पर वह खट्टा-तीखा स्वाद आज भी याद आते ही मुँह में पानी आ जाता है।
मुझे याद है, एक बार मैंने और मेरी कजिन ने बिना पूछे सारी अमियाँ तोड़ लीं और छत पर ले जाकर “अचार-अचार” खेला। नानी ने देखा तो डाँटा नहीं, बल्कि हँसकर बोलीं—“अरे, तुम लोग तो मेरा सारा व्यापार ही खत्म कर दोगे।”

शाम को उन्होंने उन्हीं टूटी हुई अमियों से हम सबके लिए “अमिया की लौंजी” बनाई। गुड़ वाली मीठी-खट्टी लौंजी। हम छत पर बैठकर, तारों के नीचे, स्टील की प्लेट में रोटी के साथ वह लौंजी खा रहे थे। वह स्वाद आज तक किसी पाँच सितारा होटल में नहीं मिला।
अमिया सिर्फ एक फल नहीं था, वह हमारी करेंसी थी। मोहल्ले के बच्चों के साथ खेलते समय अगर किसी के पास खट्टी-मीठी अमिया है, तो वह सबसे अमीर था। हम अमिया के टुकड़ों के बदले कंचे, टॉफी और रंग-बिरंगे इरेज़र खरीदा करते थे।
आज जब मैं चेन्नई में अपनी छोटी-सी रसोई में खड़ी होती हूँ और बाजार से महँगी से महँगी कैरी लाती हूँ,तो

अचार बनाने की कोशिश भी करती हूँ, लेकिन वह बात नहीं आती। क्योंकि उसमें नानी के हाथों की खुशबू नहीं है, उस आँगन की धूप नहीं है और वह बेफिक्री नहीं है, जब स्कूल की घंटी, होमवर्क—सब कुछ दो महीने के लिए बंद हो जाता था।
जब मेरी बेटी अमायरा कहती है—“मम्मा, खट्टा दो”, तो मैं समझ जाती हूँ कि शायद कुछ शब्द कभी पुराने नहीं होते। वे माँ से बेटी तक वैसे ही चले आते हैं, जैसे नानी की बरनी से अमिया की खटास।मेरे लिए “अमिया” सिर्फ एक शब्द नहीं, मेरे बचपन का स्थायी पता है।

ज्योति कुमारी

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Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Grehlakshmi