Dailyhunt Logo
  • Light mode
    Follow system
    Dark mode
    • Play Story
    • App Story
बचपन की वो मजेदार शैतानियां  - गृहलक्ष्मी की कहानियां

बचपन की वो मजेदार शैतानियां - गृहलक्ष्मी की कहानियां

Hindi Kahani : आज फिर से गृहलक्ष्मी मैगज़ीन प्रतियोगिता ने हमारे बचपन की उन बहुत सारी धुंधली सी खटी मिठी यादों को तरोताजा कर दिया है। जब बात आती है हमारे बचपन की उन बहुत सारी खटी मिठी यादों की, तो वो सारी यादें हमारे मन को अंदर ही अंदर से गुदगुदाती हैं और हम सब फिर से उन्हीं प्यारी-प्यारी यादों में खो जाते हैं और हम सब का हमेशा के लिए उन प्यारी-प्यारी यादों में खोए रहने को मन करता है अपनी इस व्यस्त जिंदगी में।

बात उस वक्त की है जब हम चारों भाई बहन बहुत छोटे थे। हम चारों भाई बहन बहुत समझदार भी थे और थोड़े से नटखट और शैतान भी। हम हर रोज़ घर के सभी कामों में अपनी मां का हाथ बटाते थे। मां ने कपड़े धोने तो हम सभी एक एक कर नलका गेढ़ कर पानी भरते थे और सभी अपनी अपनी बारी के अनुसार कपड़ों को उपर छत पर सूखाने जाते थे । किसी एक ने झाड़ू लगानी तो किसी एक ने पौछा,किसी एक ने बर्तन इकट्ठे करने, तो किसी एक ने मां के साथ बर्तन धुलवाने, किसी एक ने सैल्फ पर लिजा कर बर्तन टिकाने।
जब बर्तनों को सैल्फ पर टिकाने की बारी आती थी तो मां इतना समझातीं थी कि ध्यान से लगाना सैल्फ पर कांच के बर्तनों को एक एक करके आराम से टिकाना कही टूट ना जाए। अगर टूट गए तो पापा बोलेंगे। मां बोलती रहती थी हम आराम आराम से कांच के बर्तनों को जैसे तैसे लगा ही देते आड़े टेढ़े मेढे। मां शाबाशी देती और हम खुशी से और काम कर देते थे।
एक दिन हमारी मां पापा घर से बाहर कहीं काम गए थे। गर्मियों की छुट्टियों के हसीं दिन थे। हम चारों भाई बहनों ने उस दिन खूब मस्ती की हम अकेले थे उस दिन घर में। हमने घर के बाथरूम में नलका गेढ़ पानी भर स्वीमिंगपूल बना उस में नहाए। बारिश आने पर पूरी गली और घरों की छतों पर नहाए और खूब शौर मचाया और बहुत शैतानियां की उस दिन ।
नहाने के बाद जब हम सभी भाई बहन थक कर बैठ गए। तो पता नहीं बैठे बैठे मेरे मन को क्या सूझा । मैंने सैल्फ से सारे कांच के नए कप उतार कर परात में भरकर जोर जोर से शोर मचाने लगी ।
कांच के बर्तन ले लो
कांच के बर्तन ले लो
मुझे ऐसे करते देख मेरे सारे भाई बहन भी जोर जोर से शोर मचाने लगे। ऐसा करते करते सभी भाई बहन कहने लगे अब मैं बेचूंगी कांच के बर्तन,अब मेरी बारी अब मेरी बारी,तो फिर क्या था ऐसे खिंचा तानी में कांच के बर्तनों से भरी परात हाथों से छूट गई। हाथों से छूटते ही परात के सारे कांच के कपों की ढंढियां टूट गई। हम सभी भाई बहन उस वक्त खामोश हो गए। सभी को मां पापा के गुस्से का डर सताने लगा । सभी भाई बहन मुझे बोलने लगे तुम्हारी वजह से ऐसा हुआ ।
तभी मन में एक और शैतानी ने घर कर लिया। कि हम कांच के कपों को सही तरीके से ढंढिया पीछे कर सैल्फ पर टिका देंगे। मां को भी पता नहीं चलेगा। घर में जब कोई मेहमान आएगा तभी इन नए कपों का इस्तेमाल होगा ना। मेहमानों का क्या पता कब आते हैं। हम सभी ने कपों को सफाई से टिका दिया सैल्फ पर और हम सभी मां के सामने उन कांच के कपों वाली सैल्फ के पास भी नहीं जाते थे ताकि मां को पता ना चल जाए।
पर इन्सान जैसे सोचता है वैसे तो कभी भी होता नहीं । हमारे घर उन्हीं दो चार दिनों में मेहमान आ गए । मां ने चाय बनाई और चाय डालने के लिए नए कपों को सैल्फ से उतार कर लाने के लिए कहा। तो हम सभी भाई बहनों ने अपनी मां की बात को अनसुनी सी कर घर के बाहर खेलने के लिए चले गए। मां ने जब टूटे हुए कपों को देखा तो मेहमानों के सामने कुछ भी नहीं बोली। मेहमानों के जाते ही मां ने हम सभी भाई बहनों की कान खिंचाई की और पूछा कैसे टूटे एक साथ सारे कप। हमने बोला हम कप बेचने वाले बने थे मां। मां हमारी ये बात सुनते ही जोर जोर से हंसने लगी और बोली मेरे नटखट और शैतान बच्चे।

सीमा कल्याण

Dailyhunt
Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Grehlakshmi