Hindi Kahani : 'छोटी माँ' - हाँ,यही एक शब्द है जिसे सुनते ही मुझे अपना बचपन याद आ जाता है। मेरी छोटी माँ यानि मेरी नानी के बिना मेरे बचपन का जैसे कोई अस्तित्व ही नहीं है।मेरे बचपन के हर रंग में,उसके हर पोरों में जैसे मेरी छोटी माँ बसी हुई है ,जिनकी याद दिल को तकलीफ देती है,वहीँ दूसरी तरफ मेरी यादों में बसा उनकी स्नेहमयी मूर्ति ज़िन्दगी में नयी ऊर्जा भर देती है।
ब्राह्मण घर की विधवा होने के नाते सफ़ेद धोती में लिपटी सीधी-सादी मेरी नानी ऐसी स्नेहमयी माँ थी जो अपने-पराये,हर किसी को प्यार देना, उनपर स्नेह और ममता लुटाना जानती थी। सिर्फ 25 साल में विधवा होने के बाद वो इस कठिन जीवन के ना जाने कितने अनगिनत तूफानों के थपेड़े को सह चुकी थी ,फिर भी उनके होंठों पर एक प्यारी सी मुस्कान सदैव रहती थी।
छोटी माँ को याद करने का अर्थ था हमारे लिए दुर्गा-पूजा को याद करना,जो बंगालियों का सबसे प्रमुख और खुशियों का त्यौहार होता है। पर हमारे लिए दुर्गा -पूजा दुगुनी ख़ुशी लाती थी क्योंकि उन दिनों हम ननिहाल जा सकते थे। अपने घर में अकेले रहनेवाली मेरी नानी भी बेसब्री से हमारा इंतज़ार करती थी और बहुत पहले से ही हमारे स्वागत की तैयारियाँ करती थी। कई दिनों की मेहनत से बनी उनके हाथ के तिल के लड्डू,नारियल के लड्डू,खजूर के लड्डू आदि देखकर हम वहां पहुँचते ही उसपर टूट पड़ते थे और हमे इतने चाह से खाते देखकर उनके होंठों पर एक गहरी मुस्कान फ़ैल जाती थी और आँखें खुशी से चमकने लगती थी। मेरी माँ जब हमें इसके लिए डांटती थी तो छोटी माँ स्नेह भरे स्वर में उन्हें कहती थी- ‘सुमी,इन्हें डांटा मत कर। ये आते हैं तो मेरी सुखी ज़िन्दगी हरी-भरी बन जाती है। तुझे पता नहीं मैं कितनी बेसब्री से अपने बच्चों का इंतज़ार करती हूँ”।
दुर्गा-पूजा के वो पांच दिन छोटी माँ के हाथ के बनाये स्वादिष्ट खाना खाने,उनका आँचल पकड़कर देवी माँ के दर्शन करने जाने और फिर मौका मिलते ही उनके साथ कई प्रकार के खेल खेलने में जैसे पल भर में बीत जाता था और हमारे वापस लौटने का वक़्त आ जाता था। जब हम सब नानी से बिछड़ने के गम से रोते थे तो वो हमें अपने गले लगाकर कहती थी- ‘रो मत बच्चे, बस एक साल की बात है,यूँ यूँ निकल जायेगा और हम फिर खूब मस्ती करेंगे और अगली बार सुमी थोड़े और दिन की छुट्टी लेकर आना,मन नहीं भरा बच्चों का”।
कई साल हो गए मेरी छोटी माँ को गए हुए और उनके जाने के साथ ही हमारा बचपन भी ना जाने कहाँ खो गया! आज जब भी उनके बारे में सोचती हूँ तो लगता है जैसे सिर्फ हम उनके साथ अपने बचपन को नहीं जीती थी,वो भी अपने उस बचपन को हमारे साथ जीती थी जिसे उन्हें सिर्फ दस साल की उम्र में विवाह के बंधन में बंधकर छोड़ना पड़ा था। आज भी लगता है अपने ननिहाल में कदम रखते ही वह दौड़ी हुई आएगी और हमें गले लगा लेगी।
डॉ. पूर्णिमा बनर्जी
कोलकाता

