तृषा हमेशा से पढ़ाई में अव्वल थी। उसकी इच्छा थी वह डॉक्टर बने सभी के दुख - तकलीफों कष्टों का निवारण करे। बचपन में जब वह अपनी दादी के पास गांव गई थी तो उसने वहां देखा था कि लोग कैसे परेशान रहते हैं छोटे-मोटे रोगों का निवारण नहीं कर पाने से।
क्योंकि इलाज में खर्चा बहुत आता है। अतः तृषा ने तय कर रखा था कि वह बड़ी होकर डॉक्टर बनेगी और ऐसे ही गांवों में जाकर लोगों का इलाज करेगी। जहां तक हो सके कम से कम खर्चे में उन्हें पूरा इलाज मिले यही कोशिश रहेगी उसकी।
वह बहुत मेहनत - लगन से पढ़ाई कर रही थी सारा दिन बस पढ़ाई ही करती रहती। कुछ देर के लिए सोई या खाना - पीना खाया और बस फिर पढ़ने बैठ जाती है दिन में 18 घंटे तो पढ़ाई करती है। पूरी तैयारी करने के बाद उसने सोचा कि इस बार तो वह नीट एग्जाम क्लियर कर ही लगी और बस फिर उसका मेडिकल में दाखिला हो जाएगा और वह लोगों की सेवा करने के लिए तैयार होगी अगले कुछ ही वर्षों में।
वह सुबह उठी जल्दी-जल्दी तैयार हुई और अभी घर से निकली ही थी परीक्षा केंद्र जाने के लिए की रास्ते में ही उसे कुछ हलचल सी दिखाई दी और सुनाई दिया कि नीट की परीक्षा रद्द हो गई है। क्योंकि नीट का पेपर लीक हो गया है। तृषा को बहुत बुरा लगा सुनकर जैसे उसका सिर ही घूम गया । उसे समझ में ही ना आए कि अब वह क्या करे? यह बिल्कुल ऐसा ही था कि जैसे भूखे के मुंह में जाता निवाला छीन लिया जाए ऐन वक्त पर , जब वह उसे खाने को तत्पर हो।
तृषा बहुत दुखी - परेशान हुई एकदम चुप सी हो गई और घर लौट आई। वह गुमसुम ही थी। तभी उसकी दादी जो अभी ही गांव से आई हुई थी उन्होंने उसे देखा तो पूछा कि– ‘वह इतनी परेशान क्यों है, गुमसुम क्यों है? तृषा ने बताया कि –उसकी सारी तैयारी पर पानी फिर गया है। उसकी सारी मेहनत बेकार हो गई है। क्योंकि परीक्षा रद्द हो गई है। क्या फायदा ऐसे जीने से।
दादी बोली – तो उससे क्या हुआ बेटा। तुम अगली बार परीक्षा दे लेना। न चाहो तो न देना। और भी बहुत कुछ है जीवन में करने के लिए। और परिस्थिति चाहे जैसी भी क्यों न हो जीवन बड़ी चीज है हमेशा। यह भी तो एक परीक्षा है तुम्हारे मनोबल की और ऐसी परीक्षाएं अभी और भी देना है यह तो शुरुआत है तुम्हारे जीवन की। कहते हुए उन्होंने अपनी बाहों मे भर लिया तृषा को और सिर पर हाथ फेरने लगीं। तृषा को बिल्कुल ऐसा लगा जैसे गर्मी की भरी दोपहर में अचानक से एक शीतल हवा का झोंका उसके सिर को सहला गया हो और वह तुरंत ही शांतचित्त हो गई।

