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गर्मी की छुट्टियाँ - गृहलक्ष्मी की कहानियां

गर्मी की छुट्टियाँ - गृहलक्ष्मी की कहानियां

Hindi Kahani : अक्सर गर्मी की छुट्टियाँ पड़ते ही बचपन याद आ जाता है…
वो नानी का घर, वो छुट्टियों की बेफिक्र सुबहें और शामें, और वो ढेर सारी शरारतें।

जब हम नानी के घर जाया करते थे, तो लगता था जैसे खुशियाँ भी हमारे साथ वहाँ पहुँच गई हों।

सारे भाई-बहन इकट्ठा होते और फिर शुरू होती थी हमारी धमा-चौकड़ी। न कोई चिंता, न कोई फिक्र… बस हँसी, खेल और मस्ती।

बिजली चली जाए तो छत पर जाकर खाट पर लेट जाना, ठंडी हवा के झोंकों के बीच अंताक्षरी खेलना…
और कभी-कभी यूँ ही आसमान को निहारते हुए रात-रात भर तारों को गिनते रहना।

कभी हमारी बुआ अपने साथ हमारे भाई-बहनों को लेकर हमारे घर आ जातीं और ऐसा लगता जैसे घर में खुशियों का मेला लग गया हो। फिर घंटों तक चुहल, हँसी-मज़ाक और शरारतों का सिलसिला चलता रहता।

कभी सब साथ बैठकर झूले झूलते, तो कभी अपनी-अपनी साइकिल लेकर घंटों रेस लगाते। हार-जीत से ज्यादा मायने रखती थी वो बेफिक्र हँसी, जो आज भी याद आती है तो चेहरे पर मुस्कान आ जाती है।

और फिर बारिश
बारिश की पहली फुहार, मिट्टी से आती वो भीनी-भीनी खुशबू और गरमा-गरम पकौड़ों का स्वाद…
सच में, वो पल मन को भीतर तक भिगो जाते थे।

वो बचपन की खट्टी-मीठी यादें आज भी दिल के किसी कोने में वैसे ही संजोकर रखी हैं।
समय बीत गया, लोग अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गए, बचपन कहीं पीछे छूट गया… मगर उन दिनों की यादें आज भी उतनी ही ताज़ा हैं।

कभी-कभी मन करता है कि फिर से बच्चा बन जाएँ…
न कोई जिम्मेदारी हो, न किसी बात की चिंता…
बस नानी का घर हो, सारे भाई-बहन हों, छत पर बिछी खाट हो, आसमान में चमकते तारे हों और हमारी वो खिलखिलाती हुई हँसी…

काश! बचपन की वो गर्मी की छुट्टियाँ फिर लौट आएँ,
और हम एक बार फिर उन्हीं हसीन लम्हों में खो जाएँ…।

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Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Grehlakshmi