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काश मैं भी अपने पापा की परी होती-गृहलक्ष्मी की कविता

काश मैं भी अपने पापा की परी होती-गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Poem: 'काश की मैं संप्रति के जेनजी युग में जन्म ली होती,काश मेरे जन्म पर भी मुझे ईश्वर का अमूल्य वरदान माना जाता,
काश मेरे जन्म पर भी गुलाबी बलून और फूलों से मेरा स्वागत होता,

काश घर घर का कोना कोना मेरे स्वागत में पलकें बिछाता,
काश पूरा परिवार मुझ पर जान छिड़कता,
मेरी मां मुझसे आह्लादित होती …,
मैं ही उनका अनुपम स्वप्न होती,
पापा को मेरे होने पर गर्व होता,
सबकी परवाह किए बिना की मैं लड़की हूं वह मुझे अपने गोद में उठाते ….. सीने से लगाते …
काश मैं भी अपने "पापा की परी होती।"
पर मैं उस स्याह युग में जन्मी हूं …
जब बेटियां 'परी 'नहीं 'पीड़ा' का सूचक हुआ करतीं थीं,
उनके होने से आह निकलती थी,
हां मैं मिलेनियर हूँ, हां हमारे समय हम पापा की परी नहीं हुआ करतीं थीं।

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Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Grehlakshmi