Hindi short stories :कंक्रीट के बने घर और ज़िम्मेदारियों के बोझ तले जब भी मेरी रूह थक जाती है, तो वह सुकून की तलाश में तुरंत उड़कर बचपन के उस सुनहरे पन्ने पर जा बैठती है, जिसे 'नानी का घर' कहते हैं।
नानी का घर मेरे लिए सिर्फ ईंट-पत्थरों की इमारत नहीं था, बल्कि वो लाड़-प्यार, बेपरवाही और अच्छे संस्कारों की एक ऐसी मखमली छाँव थी, जहाँ दुनिया की कोई पाबंदी हमें छू भी नहीं पाती थी। आज भी उन गलियों को याद करूँ, तो पलकें भीग जाती हैं और होठों पर एक बेबस कर देने वाली मीठी मुस्कान तैर जाती है।
छुट्टियाँ शुरू होते ही हम सब भाई-बहन, मौसी और मामा के बच्चे नानी के घर इकट्ठा हो जाते थे और पूरा घर एक चहचहाते हुए मेले में बदल जाता था। वहाँ कदम रखते ही हमारी पूरी दिनचर्या ही बदल जाती थी। सुबह-सुबह हमारी आँखें नानी के कमरे से आती अगरबत्ती की खुशबू से खुलती थीं। सुबह-सुबह उठकर नानी के पास बैठना और उनके साथ थोड़ा रामायण का पाठ करना हमारी सुबह को एक असीम शांति से भर देता था। इसके बाद हम सब मिलकर नानी और मामी के साथ घर के छोटे-मोटे कामों में हाथ बंटाते थे। खेलकूद के बाकी कार्यक्रमों में लगने से पहले हमें वहाँ अनजाने में ही अच्छे संस्कारों की एक बेहतरीन पाठशाला मिल जाती थी।
दोपहर के वक्त नानी ज़मीन पर एक बड़ी सी चटाई बिछा देती थीं। हम सब एक कतार में बैठ जाते और एक-दूसरे की थाली से खाना छीनकर खाते थे। मेरी नानी के हाथों में तो जैसे कोई जादू था। वे जब चूल्हे पर उड़द की दाल की गर्मा-गर्म भरवां पूड़ियाँ और साथ में तरह-तरह के चटपटे, खुशबूदार अचार परोसती थीं, तो उंगलियाँ चाटते-चाटते भी पेट नहीं भरता था। उस भरे-पूरे स्वाद और अपनेपन की मिठास आज कहीं और कहाँ!
कड़क धूप में जब बड़े सो जाते, तब हमारी असली महफ़िल जमती थी। आंगन में 'गिट्टे' और 'स्टापू' खेलना हमारा रोज़ का नियम था। लेकिन शाम होते ही हम सब भाई-बहनों की टोली लोकल बाज़ार की तरफ दौड़ती थी। अपनी छोटी सी जेब में पड़े कुछ सिक्कों से वह खट्टी-मीठी 'लाल इमली' खरीदना, च्युइंग गम चबाना, रंग-बिरंगी टॉफियाँ लेना और बर्फ की ठंडी-ठंडी 'चुस्की' खाना हमारे लिए दुनिया का सबसे बड़ा सुख था।रंगीन जीभ दिखाकर एक-दूसरे को चिढ़ाना और खिलखिलाना ही हमारी कायनात थी।
हम सब बच्चे मां के साथ तो कभी नानी के साथ बाज़ार से अपने लिए फैशन के कपड़े चुनती, सुंदर हेयर एक्सेसरीज़ (क्लिप और रबर बैंड) लेती थीं और चमकती हुई आर्टिफिशियल ज्वेलरी खरीदती थीं। अपनी पसंद के झुमके या कंगन खरीदकर जब हम लौटती थीं, तो शीशे के सामने सजकर खुद को किसी राजकुमारी से कम नहीं समझती थीं।
रात होते ही सब आंगन में बिस्तरों पर इकट्ठा हो जाते और कैरम बोर्ड व लूडो की बाज़ी सजती थी। गोटियों को मारने की वो होड़, लूडो में एक-दूसरे की गोटी काटना और पकड़े जाने पर ज़ोर-ज़ोर से हँसना—इन खेलों में कब रात के बारह बज जाते, पता ही नहीं चलता था। खेल खत्म होने के बाद जब सोने का वक्त आता, तो असली महाभारत शुरू होती थी। हम सब भाई-बहनों के बीच इस बात को लेकर रोज़ घमासान झगड़ा होता था कि 'नानी की खाट के ठीक बगल में कौन सोएगा'। बचपन की वो सबसे अमीर लड़ाई थी, जहाँ जीत का मतलब सिर्फ नानी की खाट के पास वाली ज़मीन और उनका आंचल पाना था।
आज हम सब बड़े होकर अपनी-अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हो गए हैं। पर नानी के आंचल की वो छाँव, जो मम्मी के गुस्से से हमेशा हमें बचा लेती थी और वो रामायण के पाठ से मिले संस्कार, आज भी मेरे दिल के सबसे महफूज़ कोने में ज़िंदा हैं। सच कहूँ तो, आज हाथ में पैसे और ऐशो-आराम सब कुछ है, पर वो बेपरवाह बचपन और नानी के घर जैसा सुकूँन पूरी कायनात में कहीं नहीं है।

