Hindi short stories :"नानी का घर" सुनते ही आज भी मेरे चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। यह सिर्फ एक घर नहीं था, बल्कि मेरे बचपन की सबसे खूबसूरत दुनिया था।
मेरे लिए नानी का घर इसलिए भी खास था क्योंकि वह हमारे घर के बिल्कुल पास था।
मम्मी-पापा दोनों नौकरी करते थे, इसलिए स्कूल से छुट्टी होते ही मैं सीधे नानी के घर पहुँच जाता था। कई बार तो ऐसा लगता था कि मेरा आधा बचपन अपने घर से ज़्यादा वहीं बीता है।
नानी का घर पुरानी हवेली जैसा था। बड़ा-सा आँगन, ऊँची छतें और हर कोने में अपनापन। वहाँ आधुनिक सुविधाएँ भले कम थीं, लेकिन दिलों में जगह बहुत थी। घर में कदम रखते ही एक अलग-सी शांति और अपनापन महसूस होता था।
आँगन में एक बड़ा-सा शहतूत का पेड़ था, जो हमारे बचपन का साथी था। गर्मियों में उसकी डालियाँ शहतूतों से भर जातीं और हम बच्चे उन्हें तोड़ने और बटोरने में लग जाते। हाथ रंग जाते, कपड़े खराब हो जाते, लेकिन उस खुशी के आगे यह सब मायने नहीं रखता था।
गर्मियों की छुट्टियाँ तो जैसे नानी के घर का सबसे बड़ा उत्सव होती थीं। मामा, मौसी और उनके बच्चे आते और घर हँसी से भर जाता। हम सब भाई-बहन दिनभर खेलते, दौड़ते और शरारतें करते रहते। कभी लुका-छिपी, कभी पकड़म-पकड़ाई और कभी बिना किसी वजह के ही ठहाके लगाते रहते। उन दिनों न किसी को मोबाइल की जरूरत थी और न किसी मनोरंजन के साधन की।
बारिश का मौसम आते ही हमारी मस्ती और बढ़ जाती। जैसे ही तेज़ बारिश होती, हम आँगन की नाली को बंद कर देते। धीरे-धीरे पानी भर जाता और वही हमारा स्विमिंग पूल बन जाता। फिर घंटों पानी में खेलना, छींटे उड़ाना और कागज़ की नावें चलाना हमारी सबसे बड़ी खुशी होती थी। आज सोचता हूँ तो लगता है कि छोटी-सी उस शरारत में कितनी बड़ी खुशी छिपी थी।
नानी के हाथ का बना खाना आज भी याद आता है। रसोई से आती खुशबू पूरे घर में फैल जाती थी। नानी को हर बच्चे की पसंद पता होती थी। वह सिर्फ खाना नहीं बनाती थीं, उसमें अपना स्नेह भी परोस देती थीं। शायद इसी वजह से उनके हाथ का साधारण भोजन भी किसी दावत से कम नहीं लगता था।
शाम होते ही आँगन में रौनक और बढ़ जाती। बड़े लोग बातें करते और हम बच्चे अपने खेलों में लगे रहते। हर दिन में अपनापन था, हर पल में सुकून था। वहाँ कोई दिखावा नहीं था, बस रिश्तों की सच्ची गर्माहट थी।
आज समय बदल गया है। हम सब बड़े हो गए हैं और जीवन अपनी-अपनी दिशाओं में आगे बढ़ गया है। लेकिन जब भी बचपन की सबसे प्यारी यादों की बात होती है, सबसे पहले नानी का घर ही याद आता है।
क्योंकि वहाँ सिर्फ एक मकान नहीं था, वहाँ हमारा बचपन बसता था। शहतूत का पेड़, बारिश वाला स्विमिंग पूल, भाई-बहनों की शरारतें, नानी के हाथ का खाना और वह हवेली जैसा घर-सब आज भी यादों में वैसे ही सुरक्षित हैं।
शायद कुछ जगहें समय के साथ पुरानी नहीं होतीं, वे हमारी स्मृतियों में हमेशा जीवित रहती हैं। मेरे लिए "नानी का घर" ऐसी ही एक जगह है, जहाँ आज भी मेरा बचपन मुस्कुराता हुआ मेरा इंतज़ार करता है।

