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नानी हमारी ढाल बनती थी-गृहलक्ष्मी की लघु कहानी

नानी हमारी ढाल बनती थी-गृहलक्ष्मी की लघु कहानी

र्मियों की छुट्टियां आते ही दिल में एक अजीब सी हलचल और खुशी दौड़ जाती थी। परीक्षा खत्म होने का उतना उत्साह नहीं होता था, जितना उत्साह इस बात का होता था कि अब 'नानी के घर' जाने का समय आ गया है।

मेरे लिए नानी का घर सिर्फ एक मकान नहीं, बल्कि खुशियों का वो खजाना था जहाँ पाबंदियों का कोई नामोनिशान नहीं होता था।
जैसे ही ट्रेन नानी के शहर पहुंचती, मन नाच उठता। घर के दरवाजे पर पहुंचते ही नानी अपनी ममता भरी मुस्कान के साथ मिलतीं। गले लगाते ही, मानो सफर की सारी थकान एक पल में मिटा देती थी।
नानी के घर के दिन किसी उत्सव से कम नहीं होते थे। वहाँ न तो सुबह जल्दी उठने की डांट होती थी और न ही होमवर्क का कोई तनाव। सुबह की शुरुआत नानी के हाथ के बने गरमा-गरम पराठों और घर के निकले सफेद मक्खन से होती थी। नानी हमेशा कहती थीं, "शहर में कहाँ ऐसा शुद्ध खाना मिलता है, यहाँ पेट भरकर खाओ।" मौसी का दुलार मिलकर छुट्टियों को और भी खूबसूरत बना देते थे।
दोपहर के समय, जब बाहर तेज धूप और लू चलती थी, तब घर का सबसे बड़ा कमरा हमारा खेल का मैदान बन जाता था। ममेरे भाई-बहनों के साथ मिलकर लूडो, कैरम और छुपन-छुपाई खेलना रोज का नियम था। उस समय नानी हमारी ढाल बनती थीं। अगर कभी कोई बर्तन टूट जाता या हम थोड़ा ऊधम मचाते, तो मम्मी के गुस्से से पहले नानी की आवाज आ जाता था, "बच्चे हैं, छुट्टियों में नहीं खेलेंगे तो कब खेलेंगे!" यह सुनते ही हमारी जान में जान आ जाती।
शाम होते ही पूरा आंगन गुलजार हो जाता। शाम को सैर करने के लिए खेत में जाना या लगे थे आम के पेड़ या जामुन का मज़ा बहुत पसंद था. और छट ठंडा पा नी का छिड़काव होता और चारपाइयां बिछाई जातीं। नानी रसोई से आम का पना, पुदीने की चटनी और ताजे कटे हुए तरबूज लेकर आती थीं। उस ठंडी हवा में, खुले आसमान के नीचे सब मिलकर बैठते और ठहाके लगाते।
रात का समय सबसे जादुई होता था। छत पर तारों की छांव में हम सब नानी को घेरकर लेट जाते थे। फिर शुरू होता था नानी की कहानियों का दौर। राजा-रानी, परियों और जादुई दुनिया की वे कहानियां नानी इतने जीवंत तरीके से सुनाती थीं कि हम सब उसी दुनिया में खो जाते। कहानी सुनते-सुनते कब आंख लग जाती, पता ही नहीं चलता। हमारी छुटिया कब खत्म हो गई है, पता नहीं चला।
जब छुट्टियां खत्म होने को आतीं, तो मन भारी होने लगता था। वापस लौटने वाले दिन नानी की आंखें नम हो जाती थीं। जाते समय हमारे हाथों में शगुन के पैसे और रास्ते के लिए ढेरों पकवान थमाते हुए नानी का वह चेहरा आज भी भावुक कर देता है।
आज भागदौड़ भरी जिंदगी और मोबाइल-इंटरनेट के दौर में वो सादगी और वो सुकून कहीं खो गया है। लेकिन नानी के घर बिताए वे दिन मेरे जीवन की सबसे अनमोल पूंजी हैं। वो घर, वो आंगन और नानी का वो निश्छल प्यार हमेशा मेरे दिल के सबसे खूबसूरत कोने में सुरक्षित रहेगा।

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Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Grehlakshmi