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ऑफिस वाली औरत-गृहलक्ष्मी की कहानियां

ऑफिस वाली औरत-गृहलक्ष्मी की कहानियां

सुबह के ठीक पौने आठ बजे थे। मयूर विहार फेज़-1 मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियों पर कदम रखते ही ऐसा लगता था जैसे इंसान किसी विशाल, बेजान मशीन का हिस्सा बन गया हो। चारों तरफ जूतों की खटखट, बैग्स की सरसराहट और टोकन वेंडिंग मशीन की बीप-बीप की आवाजें थीं।

दिल्ली की इस रफ्तार में कोई किसी को नहीं देख रहा था, सब बस भाग रहे थे।

उसी भीड़ में शामिल थी ३० वर्षीय अंजलि। एक हाथ में लेडीज पर्स, दूसरे हाथ में मेट्रो कार्ड और कानों में टंगे वायरलेस इयरफ़ोन। अंजलि नोएडा की एक नामी आईटी फर्म में सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर थी। दिल्ली जैसे शहर में इस पद तक पहुँचने के लिए उसने अपनी रातों की नींद और न जाने कितने संडे कुर्बान किए थे।

मेट्रो ट्रेन जैसे ही प्लेटफॉर्म पर आकर रुकी, इंसानों का एक रेला अंजलि को अपने साथ धकेलते हुए कोच के अंदर ले गया। अंजलि ने कांच की खिड़की के पास जगह बनाई और बाहर की तरफ देखने लगी। खिड़की के धुंधले कांच में उसे अपना ही चेहरा दिखाई दिया—आँखों के नीचे डार्क सर्कल्स, चेहरे पर एक पराया सा सन्नाटा और होंठों पर गायब हो चुकी मुस्कान।

तभी उसके फोन की स्क्रीन चमकी। उसके पति मानव का मैसेज था: "अंजलि, फ्रिज में दूध खत्म है। आते वक्त ले आना। और हाँ, आज मेरा क्लाइंट डिनर है, तो मुझे रात को देर हो जाएगी। तुम अपना खाना देख लेना।"

अंजलि ने मैसेज पढ़ा, एक ठंडी सांस ली और बस एक सूखा सा रिप्लाई टाइप कर दिया: "ओके।"

यह अंजलि और मानव की आज की तारीख की पूरी बातचीत थी। वही मानव, जिससे सात साल पहले जब अंजलि की शादी हुई थी, तो दोनों ने कसम खाई थी कि वे दिल्ली की इस भागदौड़ में कभी अपने प्यार को कम नहीं होने देंगे। पर आज? आज वे एक ही छत के नीचे रहने वाले दो ऐसे अजनबी बन चुके थे जिनके बीच संवाद की जगह केवल 'रिमाइंडर नोट्स' और 'मैनेज्ड मैसेजेस' ने ले ली थी।

अंजलि और मानव की लव मैरिज हुई थी। कॉलेज के दिनों में मानव अंजलि के लिए गिटार बजाकर गाने गाता था, और अंजलि उसकी हर छोटी बात पर खिलखिला उठती थी। जब दोनों की दिल्ली में नौकरियां लगीं, तो उन्हें लगा कि उन्होंने दुनिया जीत ली है। शुरुआत के दो साल बहुत खूबसूरत थे। वीकेंड्स पर कनॉट प्लेस घूमना, रात को ऑटो की सवारी करना और मजनू का टीला में बैठकर घंटो बातें करना उनकी आदत थी।

लेकिन धीरे-धीरे कॉर्पोरेट की सीढ़ियां चढ़ने की भूख ने उनके जीवन का स्क्रीनप्ले बदल दिया।

मानव एक एडवरटाइजिंग एजेंसी में क्रिएटिव डायरेक्टर बन गया, जहाँ 'डेडलाइन्स' भगवान थीं। अंजलि पर अमेरिकी क्लाइंट्स को संभालने का दबाव था, जिसका मतलब था—नाइट्स शिफ्ट्स और अंतहीन ज़ूम कॉल्स।

अब उनका हफ्ता कुछ ऐसा दिखता था: सोमवार से शुक्रवार—दोनों अलग-अलग समय पर उठते। अंजलि जब ऑफिस के लिए निकलती, मानव सो रहा होता। मानव जब रात को २ बजे घर लौटता, अंजलि थककर गहरी नींद में होती। शनिवार को दोनों इतने थके होते कि घर की साफ-सफाई और ग्रोसरी शॉपिंग में ही पूरा दिन निकल जाता। और रविवार? रविवार आने वाले सोमवार के तनाव में घुटते हुए बीत जाता।

प्यार, जो कभी उनकी ताकत था, अब क्रेडिट कार्ड के बिलों, होम लोन की ईएमआई और काम के ईमेल्स के नीचे दबकर दम तोड़ रहा था। उनके बीच आखिरी बार एक मुकम्मल, बिना किसी एजेंडे वाली बातचीत कब हुई थी? अंजलि को याद भी नहीं था।

एक शाम, ऑफिस में एक बड़े प्रोजेक्ट की कशमकश के बाद अंजलि रात के नौ बजे ऑफिस से निकली। बाहर हल्की बूंदाबांदी हो रही थी और दिल्ली की सड़कों पर गाड़ियों की हेडलाइट्स पानी से भीगी सड़क पर तैर रही थीं। अंजलि जब राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर ब्लू लाइन से येलो लाइन की तरफ चेंज करने के लिए बढ़ रही थी, तो भीड़ में अचानक उसका पैर फिसल गया।

उसका सैंडल टूट गया और हाथ से फोन छूटकर दूर जा गिरा।

वह भीड़ इतनी बेरहम थी कि लोग उसके फोन को कुचलते हुए आगे बढ़ रहे थे। कोई नहीं रुका यह पूछने के लिए कि 'मैडम, आप ठीक तो हैं?' अंजलि दीवार का सहारा लेकर खड़ी हुई। उसने अपना फोन उठाया—स्क्रीन पूरी तरह टूट चुकी थी और फोन बंद हो गया था।

उसी पल, दिल्ली के उस सबसे व्यस्त मेट्रो स्टेशन के बीचों-बीच, हजारों लोगों की मौजूदगी में, अंजलि को एक भयानक अकेलेपन ने घेर लिया। उसे लगा कि अगर आज वह यहाँ मर भी जाए, तो ड़ को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। उसने रोना चाहा, लेकिन कॉर्पोरेट की ट्रेनिंग ने उसे सिखाया था कि 'पब्लिक प्लेस में रोना कमजोरी की निशानी है।' उसने अपने आंसू पी लिए और जैसे-तैसे टूटी सैंडल के साथ घर पहुँची।

घर का दरवाजा खोला, तो चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था। घड़ी में रात के ग्यारह बज रहे थे। मानव हमेशा की तरह गायब था। अंजलि ने किचन में जाकर देखा, सिंक में सुबह के जूठे बर्तन पड़े थे। उसने फ्रिज खोला, वहां सिर्फ ठंडी हवा और कुछ खाली बोतलें थीं।

उसने बेडरूम के आईने के सामने खड़े होकर खुद को देखा। उसने खुद से पूछा, "अंजलि, तुम यह सब किसके लिए कर रही हो? इस आलीशान फ्लैट के लिए? इस छह फिगर की सैलरी के लिए? या इस खोखली जिंदगी के लिए?"

उस रात वह बिना खाना खाए, बेडरूम के कोने में सिमटकर सो गई। उसे उम्मीद थी कि जब मानव आएगा, तो कम से कम उसका उतरा हुआ चेहरा देखकर पूछेगा कि क्या हुआ। लेकिन जब मानव रात को पौने तीन बजे आया, तो उसने बस इतना कहा, "यार अंजलि, आज बहुत हैक्टिक डे था।" और वह दूसरी तरफ करवट लेकर सो गया। अंजलि की टूटी सैंडल और उसका टूटा हुआ फोन कोने में चुपचाप रोते रहे।

यह सिलसिला हफ़्तों चलता रहा। अंजलि अंदर से पूरी तरह खाली हो चुकी थी। एक शनिवार, जब मानव किसी ऑफिस ट्रिप के लिए मुंबई गया हुआ था, अंजलि ने घर की गहरी सफाई करने का फैसला किया। वह बेडरूम की अलमारी के सबसे ऊपरी हिस्से को साफ कर रही थी, तभी उसके हाथ से एक पुराना बॉक्स नीचे गिर गया।

बॉक्स का ढक्कन खुला और अंदर से कुछ पुरानी तस्वीरें, सूखे हुए गुलाब के फूल और एक छोटी सी पॉकेट डायरी बाहर आ गिरी।

अंजलि ने कांपते हाथों से वह डायरी उठाई। यह शादी के पहले साल की डायरी थी, जिसमें मानव उसके लिए छोटी-छोटी कविताएं और नोट्स लिखता था। उसने एक पन्ना खोला, जहाँ मानव की लिखावट में लिखा था:

"अंजलि, इस दिल्ली की आबादी करोड़ों में होगी, लेकिन मेरे लिए इस शहर का मतलब सिर्फ तुम हो। अगर कभी मैं इस शहर की चकाचौंध में भटक जाऊं, तो मुझे कसकर डांट देना, लेकिन अपनी इस जादू जैसी मुस्कान को मुझसे दूर मत करना..."

उस पन्ने को पढ़ते ही अंजलि के सब्र का बांध टूट गया। वह फर्श पर बैठकर दोनों हाथों में डायरी छुपाकर फूट-फूट कर रोने लगी। पच्चीस सालों का सन्नाटा जैसे उसकी आँखों से बह निकला। वह रो रही थी उस मानव के लिए जो अब बदल चुका था, वह रो रही थी खुद के लिए जो एक रोबोट बन चुकी थी।

उसी वक्त उसने एक फैसला किया। यह जिंदगी ऐसे नहीं चल सकती थी। प्यार को ढूंढने के लिए किसी को तो रुकना ही था।

अगले ही दिन, जब मानव मुंबई से लौटा, अंजलि ने उसे कोई मैसेज नहीं किया। उसने सीधे उसके केबिन के नंबर पर फोन किया—जो उसने पिछले तीन सालों में कभी नहीं किया था।

"मानव, आज शाम को ठीक सात बजे तुम्हें कनॉट प्लेस के उस पुराने 'पार्क स्ट्रीट कैफे' में आना है। कोई बहाना नहीं चलेगा।" अंजलि की आवाज में एक अजीब सा ठहराव और जिद थी।

मानव हैरान था, "लेकिन अंजलि, आज शाम को मेरी एक..." "मानव, प्लीज। सिर्फ एक घंटा।" अंजलि ने फोन काट दिया।

शाम को सात बजे, अंजलि उस कैफे के कोने वाली टेबल पर बैठी थी। यह वही कैफे था जहाँ वे शादी से पहले हर शनिवार मिलते थे। कैफे की मद्धिम पीली रोशनी और बैकग्राउंड में बज रहा धीमा संगीत पुराना था, लेकिन वहां बैठे लोग नए थे।

सवा सात बजे मानव भागता हुआ अंदर आया। उसके हाथ में अभी भी उसका ऑफिशियल लैपटॉप बैग था और वह बार-बार अपनी घड़ी देख रहा था।

"हाँ अंजलि, बताओ क्या बात है? सब ठीक तो है न? तुमने अचानक यहाँ क्यों बुलाया? तुम्हें पता है न दिल्ली का ट्रैफिक कैसा है..." मानव हांफते हुए बोल रहा था।

अंजलि ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने चुपचाप चाय के दो कप ऑर्डर किए। जब चाय आ गई, तो उसने अपनी अलमारी से मिली वह पुरानी डायरी मानव के सामने टेबल पर रख दी।

मानव ने डायरी को देखा, फिर अंजलि को। उसने जैसे ही वह पन्ना खोला जहाँ उसकी खुद की लिखी लाइनें थीं, उसके चेहरे के भाव बदल गए। उसकी तेज चलती सांसें धीरे-धीरे थम गईं।

"मानव..." अंजलि की आवाज भर्रा गई, उसकी आँखों में आंसू तैर आए। "हम कहाँ खो गए? हम किस चीज के पीछे भाग रहे हैं? हमारे पास आज दिल्ली के सबसे पॉश इलाके में घर है, हमारी गाड़ियों में पेट्रोल की कमी नहीं है, लेकिन उस घर में हमारे लिए कोई वक्त नहीं है। हम दोनों एक ही बिस्तर पर सोते हैं, लेकिन हमारे बीच मीलों की दूरी है।"

मानव चुप रहा। उसने अपनी नजरें झुका लीं।

अंजलि ने उसका हाथ थाम लिया—उसका हाथ बहुत ठंडा था। "मानव, मुझे तुम्हारी कामयाबी से प्यार है, लेकिन मुझे उस मानव की कमी खलती है जो मेरी एक उदास मुस्कान देखकर समझ जाता था कि मैं परेशान हूँ। आज मैं इस शहर की भीड़ में खुद को खोया हुआ महसूस करती हूँ। अगर यही सक्सेस है, तो मुझे ऐसी सक्सेस नहीं चाहिए। मुझे मेरा वो पति वापस चाहिए जो चाय की टपरी पर मेरे साथ बैठकर हँस सकता था।"

कैफे के उस कोने में, दिल्ली के शोर से दूर, मानव ने पहली बार अंजलि के चेहरे को ध्यान से देखा। उसने देखा कि उसकी आँखों के नीचे की उदासी कितनी गहरी हो चुकी थी। उसे याद आया कि कैसे उसने अंजलि के पिछले तीन हफ़्तों के हर दर्द को 'ऑफिस का स्ट्रेस' कहकर टाल दिया था।

मानव की आँखों से भी एक आंसू टपककर उस डायरी के पन्ने पर गिर गया। उसने अंजलि का हाथ कसकर पकड़ लिया। "आई एम सॉरी अंजलि... आई एम सो सॉरी। मैं इस कॉर्पोरेट की चूहा दौड़ में इतना अंधा हो गया था कि मुझे यह भी नहीं दिखा कि मेरी सबसे बड़ी दौलत मेरे सामने ही घुट रही थी।"

उस शाम के बाद, दोनों ने अपनी जिंदगी का गियर बदलने का फैसला किया। बदलाव रातों-रात नहीं आया, लेकिन उन्होंने कोशिशें शुरू कर दीं।

मानव ने वीकेंड्स पर ऑफिस के मेल्स का जवाब देना बंद कर दिया। अंजलि ने शाम को सात बजे के बाद लैपटॉप बंद करने का नियम बना लिया। अब वे रोज़ सुबह कम से कम पंद्रह मिनट बिना फोन के, बालकनी में बैठकर एक साथ चाय पीते हैं। वे अब भी दिल्ली मेट्रो में सफर करते हैं, वे अब भी उसी भीड़ का हिस्सा हैं, लेकिन अब अंजलि उस भीड़ में अकेली नहीं होती।

अब जब मयूर विहार स्टेशन पर मेट्रो के धक्के अंजलि को लगते हैं, तो मानव का मजबूत हाथ उसे संभाल लेता है।

दिल्ली आज भी वैसी ही है—तेज, बेकाबू और मतलबी। लेकिन उस फ्लैट की दीवारों के भीतर अब एक नया सवेरा हो चुका है। अंजलि ने अपनी खोई हुई मुस्कान वापस पा ली है। उसने दुनिया को दिखा दिया है कि एक ऑफिस वाली औरत भले ही दिनभर फाइलों और क्लाइंट्स से लड़ती हो, लेकिन शाम को उसे भी किसी ऐसे अपने की जरूरत होती है, जो उसका हाथ थामकर कह सके— "थक गई होगी न? चलो, आज चाय मैं बनाता हूँ।"

क्योंकि इस दुनिया की सबसे बड़ी कामयाबी किसी ऊंचे पद को पाना नहीं, बल्कि उस भागदौड़ के बीच अपने 'खास इंसान' के दिल में अपनी जगह को बचाए रखना है।

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