Dailyhunt Logo
  • Light mode
    Follow system
    Dark mode
    • Play Story
    • App Story
रंगीन पतंगें और बचपन की यादें  - गृहलक्ष्मी की कहानियां

रंगीन पतंगें और बचपन की यादें - गृहलक्ष्मी की कहानियां

Hindi Kahani : बचपन में मैं 'पतंग' शब्द बहुत सुना करती थी। उस दौर में मामाजी से बात करने का सबसे प्यारा जरिया चिट्ठियाँ थीं। मैं अक्सर उन्हें चिट्ठी लिखकर पूछा करती थी—'मामाजी, पतंग कैसे उड़ाते हैं?

और ऐसा क्यों है कि मकर संक्रांति के दिन ही सब लोग मिलकर पतंग उड़ाते हैं?”

एक दिन मेरी इस जिज्ञासा का जवाब मामाजी ने अपनी चिट्ठी में बड़े प्यार से दिया। उन्होंने लिखा था कि मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण होते हैं, यानी सूर्य की गति उत्तर दिशा की ओर मानी जाती है। इस दिन पतंग को आसमान की ऊँचाइयों तक उड़ाकर लोग सूर्य देव के प्रति सम्मान और आभार प्रकट करते हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि इस दिन धूप में रहने से शरीर को सूर्य की रोशनी से विटामिन डी मिलता है। इसके अलावा, इस त्योहार का एक सबसे सुंदर कारण यह भी है कि लोग छतों पर इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से पतंग उड़ाते हैं। इससे आपसी प्रेम, मेल-जोल और भाईचारा बढ़ता है। उन्होंने लिखा था कि उस दिन आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है और देखने में बहुत सुंदर लगता है।

मामाजी ने चिट्ठी के अंत में लिखा था—“अगले साल माँ के साथ तुम भी आना और मेरे साथ यह उत्सव देखना।” उनकी यह बात मेरे दिल में कहीं गहराई तक उतर गई।

लेकिन मामाजी की चिट्ठी ने मेरे मन में पतंगों को लेकर एक अलग ही उत्सुकता पैदा कर दी। मैंने माँ से जिद की कि मुझे ननिहाल, गया जाना है। आखिरकार हम 12 तारीख को गया पहुँच गए।

14 जनवरी की सुबह मैं छत पर खड़ी थी। वहाँ का नजारा देखकर मेरी आँखें चमक उठीं। सुबह करीब पाँच बजे से ही लोग अपनी-अपनी छतों पर पतंग उड़ाने में जुट गए थे। देखते ही देखते पूरा आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर गया। ऐसा लग रहा था जैसे आसमान ने खुद रंगों की चादर ओढ़ ली हो। कहीं लाल, कहीं पीली, कहीं नीली तो कहीं हरी पतंगें हवा में लहरा रही थीं। सच में, वह दृश्य इतना सुंदर था कि मन करता था बस उसे देखती रहूँ।

मामाजी ने दूर से एक पतंग उड़ाई और फिर उसकी डोर मेरे हाथ में थमा दी। मुझे पतंग उड़ाना आता नहीं था। मैं घबरा गई और डोर संभाल नहीं पाई। कुछ ही देर में मेरी पतंग कट गई। मुझे बहुत दुख हुआ। लेकिन मामाजी ने मुस्कुराकर फिर से पतंग उड़ाई। इस बार उन्होंने लटाई मेरे हाथ में दी। मैं धीरे-धीरे डोर संभालने लगी और उस पल मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था।

आज भी जब मकर संक्रांति आती है और कहीं “पतंग” शब्द सुनाई देता है, तो मेरा मन उसी बचपन की छत पर लौट जाता है। आँखों के सामने रंग-बिरंगा आसमान, हाथों में डोर और पास खड़े मामाजी दिखाई देने लगते हैं।

बस फर्क इतना है कि आज न मामाजी हैं, न माँ। लेकिन उनकी दी हुई वह याद आज भी मेरे साथ है। कुछ त्योहार सिर्फ त्योहार नहीं होते; वे हमारे अपनों की यादों को सँभालकर रखने का एक खूबसूरत बहाना होते हैं। यह याद मेरे लिए अनमोल है।

Kriti gupta

ranchi jharkhand

Dailyhunt
Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Grehlakshmi