Dailyhunt Logo
  • Light mode
    Follow system
    Dark mode
    • Play Story
    • App Story
संयुक्त परिवार - 21 श्रेष्ठ नारीमन की कहानियां हरियाणा

संयुक्त परिवार - 21 श्रेष्ठ नारीमन की कहानियां हरियाणा

भारत कथा माला

न अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

"शैलेश आज तुम फैसला कर लो मैं इस चकचक में अब और नहीं रह सकती।" कोमल ने अपने पति को लगभग चीखते हुए कहा। "कम्मो, धीरे बोल कोई सुन लेगा।"

"सुनने दो। मैं इतनी भीड़ में कभी नहीं रही। चपाती बनाने लगो तो 2 घण्टे चपातिया बनाते जाओ, कपड़े धो तो दोपहर हो जाए कपड़े धोने में। मेरे मायके में तो छोटा सा चार लोगों का परिवार था सब काम झटपट हो जाता था। मैंने तो सपना भी यही देखा था। मेरे परिवार में मैं मेरा पति और हमारे बच्चे हों और कोई नहीं।" कोमल ने गुस्से से कहा। "कमो, मैं तो यही रहूंगा। तुम जहां मर्जी हो रहो।"

"नहीं बेटा, जहां बहू रहना चाहे वही तुम रहो।" शैलेश की माँ ने अंदर आते हुए शैलेश की बात काटते हुए कहा। दो दिन में ही सास ने सारा सामान बांध दिया। सभी घर में पूरी तरह शांत थे। बड़ी दोनों बहुएं भी जो जो सामान सास ने कहा तैयार करती गई। कोमल को लग रहा था सब नाटक कर रहे हैं। यह दोनों बहुएं भी अंदर से तो खुश होंगी। कि चलो आज यह अलग हो रही है कल हम भी अलग हो जाएंगे। कोई कुछ भी सोचे मुझे क्या मेरा सपना तो पूरा हो रहा है। कोमल बहुत खुश थी।


Trending हिंदी कहानियाँ:

सास आकर नए घर में सब सामान लगवा गई। कोमल के पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। यहां सब कुछ उसका था। कोई रोकने-टोकने वाला नहीं। जब दिल करे खाना बनाओ, कोई समय की पाबंदी नहीं जितनी देर चाहो पति के पास बैठो, बच्चे से खेलों जब चाहो सो जाओ, जब चाहो उठो। सब अपनी मर्जी से करो। दस बारह दिन तो इस खुशी में निकल गए कि यह मेरा घर है। फिर कोमल को छोटी-छोटी दिक्कतें महसूस होने लगी पर वो सोचती नई-नई गृहस्थी है धीरे-धीरे वो सब सँभाल लेगी। अब एक महीना होते-होते मुश्किलें बढ़ने लगीं, कभी चीनी खत्म तो कभी दाल-चावल, कभी सब्जी लानी है तो कभी मुन्ने के डायपर और आज चाय बनाते एहसास हुआ कि किचन के डिब्बे और अखबार बहुत गंदे हो गए हैं। पति को दफ्तर भेजने के बाद सब साफ करने लगी तो कब बारह बज गए पता ही नहीं चला। इतनी थक गई थी कि अपने लिए चाय बनाने की भी हिम्मत नहीं थी। न ही इतना समय था। खाना भी बनाना था। शैलेश ने डेढ़ बजे लंच के लिए आना जो था। यह सोच कर सब्जी की टोकरी देखी तो तीन आलू थे, प्याज एक भी नहीं।

अभी बिना प्याज के ही टमाटर डालकर छोकने लगी तो मुन्ना उठकर रोने लगा। भागकर उसको उठाया पर वह चुप ही नहीं हो रहा था। उसे उठाए-उठाए ही उसकी बोतल तैयार की, बैठकर पिलाने लगी तो उसे याद आया कल शैलेश को दफ्तर के काम से बाहर जाना है, उसके कपड़े तैयार करने हैं। उसे कब धोकर प्रेस करूंगी और मोहल्ले वाली शाम को चार बजे किट्टी भी है जो उसने बड़े चाव से शुरू की थी जिसकी इजाजत उसके ससुराल में तो थी ही नहीं। उसे याद आया उसकी मम्मी कितनी बन ठन कर किट्टी में जाया करती थी। वह अपने विचारों में खोई थी कि फोन की घंटी बजी शैलेश बोल रहे थे कि चपरासी को भेज रहा हूं खाना पकड़ा देना। कल की प्रेजेंटेशन की तैयारी करनी है शाम को भी लेट आऊंगा। समय देखा तो एक बज गया था। फटाफट एक तरफ सब्जी चढ़ाई दूसरी तरफ चपाती सेंकने लगी। जैसे-तैसे टिफिन पैक किया बिना सलाद, दही और चटनी के। भूख से उसके पेट में भी चूहे दौड़ रहे थे। अपना खाना लेकर बैठी थी कि मुन्ना ने पॉटी कर दी और सारा उसमें लथपथ हो गया, छोड़कर उसको उठाया। किसी तरह उसे साफ किया। थक कर चूर हो चुकी थी। मुन्ना को गोदी में लिए-लिए रोटी का कौर तोड़ा जो ठंडी हो कर थोड़ी अकड़ भी गई थी और सब्जी लगाकर मुंह में डाला तो यह क्या, सब्जी में नमक ही नहीं। शायद काम की हबड़-दबड़ में वह डालना ही भूल गई। ओहो शैलेश कैसे खाएंगे। टिफिन में न अचार न चटनी न दही। अब तो कोमल का सब्र का बांध टूट गया। उसके आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।

कोमल ने अपनी मम्मी को फोन मिलाया, "मम्मी, मैं तो बच्ची थी मुझे तो समझ नहीं थी कम से कम आप तो मेरी हां में हां न मिलाती। मैंने जो भी कहा कि ससुराल में मुझे इतने कपड़े प्रेस करने पड़ते हैं, इतना खाना बनाना पड़ता है आप हमेशा यह कहती रही, हां भी यह तो गलत है, तूने कभी इतना काम नहीं किया। हमने तो नौकरी वाला ढूंढ़ा था, सोचा था अलग रहेगा पर आपने और मैंने मम्मी यह नहीं देखा कि संयुक्त परिवार का एक दूसरा रूप भी होता है। मेरी सास और जेठानियों ने एक महीने का राशन पानी तो बांध कर दिया था। धीरे-धीरे वह खत्म होने लगा तो रोज ही बाजार का काम जो ससुराल में कभी देखा ही नहीं था। सिर्फ बनाना होता था। खत्म क्या हो रहा है सासू मां देखती थी। ससुर महीने भर का लाकर रख देते। सब्जी और फल ससुर सुबह-सुबह मंडी जाकर छांट कर लेकर आते। अब तो शैलेश कई बार दो-दो दिन सब्जी और फल ला ही नहीं पाते। बर्तनों वाली बाई से कई बार मंगवाती हूं वह दुगनी महंगी लाती है वह भी सड़ी गली। ससुराल में ससुर सब्जी लाकर रखते, सासू मां जो बनानी होती सब काट कर रख देती बाकी फ्रिज में संभाल देती। फिर थोड़ा आराम करती और कभी हमसे लेकर बैठी-बैठी किचन के सब डिब्बे साफ कर देती तो कभी उघड़े कपड़ों पर तुरपाई कर देती। सारे कपड़े सूखने के बाद हम सासू मां के पलंग पर रख देते। सबके कपड़े तह लगा कर अलग-अलग ढेरियां लगा देती थी।

प्रेस वाले अलग कर देती। मुन्ना रोता तो कभी सास पुचकारती कभी ससुर गुब्बारा दिलवा लाते तो कभी जेठानियों के बच्चे उसे पालना झूलाने लगते। कभी कपड़े ज्यादा होते तो जेठानी बीच में ही चाय बना लाती, कहती चल पहले चाय पीते हैं तीनों, फिर काम करेंगे। कभी कोई चीज अचानक खत्म हो जाती तो ससुर तभी जाकर से ले आते। पता भी नहीं चलता चीज खत्म हुई थी। शैलेश जब दफ्तर में खाना मंगवाते तो सासु मां इतने सलीके से पैक कर के भेजती। दो सब्जियां जो ससुराल में हमेशा बनती थी एक रसे वाली और एक सूखी, रायता, सलाद, चटनी जो रोज ताजी बनती थी।

पापड़ और साथ में कुछ मीठा। मुन्ना की दूध की बोतल तो मैंने कभी बनाई ही नहीं थी जैसे ही रोता जेठानी कहती तू उसको ले ले मैं लाती हूं। मम्मी ससुराल की एक बात जो मुझे और खलती थी वह थी मेरे सास-ससुर और तीनों बेटे और बच्चे पहले खाना खाते और हम तीनों बहुएं बाद में, मैं बहुत कुढ़ती थी कि मैं आपकी तरह अपने पति के साथ खाना नहीं खा सकती, पर मां मैं सच बताऊं जब से मैं अलग हुई हूं हमने कभी पूरा खाना इकट्ठे नहीं खाया। खाना डालते ही कभी मुन्ना रोने लगा, कभी उसने पॉटी कर दी जो ससुराल में तब सासु देखती थी मुझे तो पता भी नहीं चलता था कि मुन्ना ने पॉटी कर दी और नहीं तो कभी फोन बजा तो कभी दरवाजे की घंटी जो वहां ससुर इतनी आराम से संभाल लेते थे कि कभी लगा ही नहीं था कि यह भी कोई काम है। शैलेश दफ्तर के काम से अक्सर बाहर जाते हैं। अब महीने से टाल रहे हैं क्योंकि मैं अकेली कैसे रहूं। इस महीने माहवारी के समय तबीयत ज्यादा खराब हो गई। शैलेश कहने लगे मां के यहां से खाना ले आता हूं। मैंने अपनी अकड़ में नहीं लाने दिया। यह बाजार से ले आए।

उससे मेरी और मुन्ना की तबीयत खराब हो गई। तीन दिन तक कभी ब्रेड तो कभी खिचड़ी जो शैलेश वहां कभी नहीं खाते थे। वहां कोई बीमार होता तो काम करना तो दूर की बात मम्मी, क्या बताऊं उसकी पलंग पर इतनी खातिर होती थी कि लगता था हम कुछ खास है। कभी सासू कोई काढ़ा बना कर लाती तो कभी जेठानी गर्म पानी की बोतल। तभी इतने में बच्चे आकर कहते चाची आप बोर हो रही हैं तो चलो गेम खेलते हैं। तब मुझे लगता था कि अगर मेरा घर हो तो यह भीड़ की बजाए मेरा पति मेरे सिरहाने हो। पर माँ अब तीन दिन की बीमारी में ही शैलेश की काम कर कर के नानी याद आ गई थी। सिरहाने बैठकर मेरा सिर सहलाने की तो फुर्सत ही कहां थी। काम के बोझ से चिड़चिड़े और हो गए थे। एक और जो मम्मी मुझे बुरा लगता था कि किसी बहू ने कोई किट्टी नहीं ज्वाइन की इसलिए मैं भी नहीं कर सकती पर माँ शाम को जब तीनो भाई काम से लौटते और आंगन में मां और अपने बाबू जी के पास आकर बैठते, सब बच्चे भी चाचा-ताऊ जी कर के चिपटते, पर सब पहले मुन्ना से बात करते। फिर शरबत नाश्ते के दौर के साथ जो कहकहे गूंजते वो निश्छल हंसी किसी किट्टी में तो हो ही नहीं सकती। छुट्टी के दिन कभी-कभी सारा परिवार अपने गांव के खेत में जाता जो शहरों के पार्कों की पिकनिक से हजार गुना अच्छी होती थी, जहां सब कुछ अपना होता था, जहां कुछ तोड़ने पर जुर्माना नहीं लगता था। जैसे एक बार बचपन में पब्लिक पार्क में मेरे फूल तोड़ने पर आपको देना पड़ा था। मां मेरी आंखों से पर्दा हट चुका है मैं अपने घर वापस जा रही हूं।"

शैलेश दफ्तर से आए तो कोमल सारा सामान बांधे बैठी थी। "शैलेश अपने घर चलो, अब भैया और मां बाबूजी के साथ ही चाय नाश्ता लेंगे।" शैलेश की आंखों में खुशी के आंसू थे तो मुन्ना के होठों पर मुस्कान। शायद दादी-दादा की गोद का सुख वह अबोध बच्चा भी समझता था।

गृहलक्ष्मी

गृहलक्ष्मी

7.5k followers56k Stories

Dailyhunt
Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Grehlakshmi