Dailyhunt Logo
  • Light mode
    Follow system
    Dark mode
    • Play Story
    • App Story
स्कूल का मिट्टी वाला टीला - गृहलक्ष्मी की कहानियां

स्कूल का मिट्टी वाला टीला - गृहलक्ष्मी की कहानियां

Hindi Kahani : हमारे स्कूल में एक बहुत बड़ा मैदान था। मैदान दो भागों में बँटा हुआ था, बीच से एक रास्ता जाता था जहाँ से सब आते-जाते थे। स्कूल की बस, स्कूल के बच्चे, सब वहीं से आते-जाते थे।

मैदान के एक तरफ खेलने वाला मैदान था, जहाँ सारे बच्चे खेलते थे। वहाँ कबड्डी, खो-खो और छुपन-छुपाई रोज होते थे और छुट्टी के समय खूब शोर मचता था और दूसरी तरफ वाले मैदान में कुछ काम चल रहा था, इसलिए वहाँ मिट्टी के बड़े-बड़े टीले बने हुए थे।

वो टीले हमारे लिए किसी सिंहासन से कम नहीं थे। हम सभी सहेलियों को लंच टाइम का बेसब्री से इंतजार रहता था। जैसे ही लंच की घंटी बजती, हम सब दौड़कर उस टीले पर जाकर बैठ जाते। वहीं अपना टिफिन खोलते, खाना खाते और ढेर सारी बातें करते। वहाँ बैठकर समय का पता ही नहीं चलता था और हँसी रुकने का नाम नहीं लेती थी, सच में वो पल सबसे प्यारे लगते थे और आज भी बहुत याद आते हैं।

किसी के टिफिन में अचार-पराठा होता, किसी में रोटी-अचार, और मेरे टिफिन में हमेशा पराठा और उबले हुए आलू होते। मेरी माँ उसमें नमक-मसाले मिलाकर देती थीं। मेरे वो मसालेदार आलू सबको बेहद पसंद आते थे। सब अपना खाना मिल-बाँटकर खाते। यही हमारी असली अमीरी थी।

खाना खत्म होते ही हमारी असली महफिल शुरू हो जाती — बातों की महफिल। कभी हम अपने टीचरों की नकल उतारते। मैं सख्त वाले सर बनकर कहती, "खड़े हो जाओ!" और सब हँस पड़ते। कभी हम अपने दुख-सुख की बातें करते। किसको घर पर डाँट पड़ी, किसका नया सूट सिला है, बड़ी होकर कौन क्या बनेगा — बातें खत्म ही नहीं होती थीं। कभी हम आने वाले त्योहारों के बारे में भी खूब चर्चा करते थे।

सर्दियों के समय तो उस टीले पर धूप सेंकने का अलग ही मजा था। पीठ पर गर्म धूप, मुँह पर ठंडी हवा। हम एक-दूसरे की चोटी बनाते, पहेलियाँ बुझाते। वो टीला ही हमारी आजादी था। टीले पर बैठे-बैठे हमारे कपड़े भी गंदे हो जाते, सूट में मिट्टी लग जाती, पर हमें इससे क्या फर्क पड़ता था। घर जाकर माँ से डाँट भी पड़ती, पर अगले दिन फिर वही टीला हमें अपनी ओर खींच लाता था।

जब लंच टाइम खत्म होता, तब हमें मजबूरन वहाँ से क्लास की तरफ जाना पड़ता। लेकिन मन बिल्कुल नहीं होता था वहाँ से उठने का। बस लगता था, यहीं बैठे रहें और ढेर सारी बातें करते रहें। घंटी बजते ही हम अनमने मन से उठते थे।

आज भी जब वहाँ से गुजरती हूँ तो आँखें भर आती हैं और दिल उस पुरानी मिट्टी की खुशबू को खोजने लगता है। वो मिट्टी का टीला सिर्फ टीला नहीं था। वो हमारी पंचायत थी, हमारे सपनों का मंच था, हमारी हँसी का ठिकाना था। वहाँ बैठकर की गई बातों में न कोई छल था, न दिखावा। बस सच्ची दोस्ती थी, जो आज भी दिल में बसी हुई है।

काश, एक बार फिर उस टीले पर बैठकर अपनी सहेलियों से कह सकूँ — याद है, हमने यहाँ क्या-क्या बातें की थीं?

रोशनी अग्रवाल

Dailyhunt
Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Grehlakshmi