Parivar ki Kahani: शिल्पा जब ब्याह कर ससुराल आई तो एक दिन सोहन ने उससे कहा, 'शिल्पा मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूं या यूं समझ लो कि कुछ मांगना चाहता हूं।
'हां बोलो ना, क्या बात है सोहन?
‘सोहन तुम कहना क्या चाहते हो? मुझे खुल कर बताओ?
‘शिल्पा यदि हो सके तो तुम नौकरी मत करना। मां का पूरा जीवन ही बीत गया सब के लिए करते हुए। मैं चाहता हूं कि उन्हें भी अपनी बहू के आने के बाद थोड़ा आराम मिले। मैंने देखा है शिल्पा पहले हमारा संयुक्त परिवार था चाचा-चाची, ताऊ-ताई और सब के बच्चे साथ ही रहते थे। जब तक वे साथ रहते थे तब तक ताई और चाची हमेशा काम से जी चुराती थीं और पूरा काम मां के ऊपर ही आ जाता था।
‘काम वाली क्यों नहीं लगाई सोहन?
‘काम वाली तो सिर्फ बर्तन और पोंछा करने के लिए ही थी ना शिल्पा, लेकिन घर में कितने काम होते हैं तुम तो जानती ही होगी। परिवार यदि संयुक्त है तब तो पूछो ही मत। मां को हमेशा सबने बहुत ही हल्के में ले लिया था। सब उनसे अपना काम निकलवा लेते थे। मां बेचारी कभी भी किसी को मना नहीं कर पाई।
‘शिल्पा काम वाली तो हम और काम के लिए भी रख ही सकते हैं। लेकिन दिन भर यदि मां को तुम्हारा साथ भी मिल जाएगा तो उन्हें भी अच्छा लगेगा। शिल्पा यह कोई जबरदस्ती नहीं है यह केवल मेरे मन की बात है जो मैं चाहता हूं मगर यदि तुम ऐसा नहीं करना चाहती तो कोई बात नहीं। मां तो जब तक उनके हाथ-पांव चलेंगे, सब संभालती ही रहेंगी।
शिल्पा ने कहा, ‘यदि ऐसी बात है तो मैं नौकरी के बारे में कभी सोचूंगी भी नहीं। मैं उनका पूरा ख्याल रखूंगी।
सोहन ने खुश होते हुए कहा, ‘थैंक यू शिल्पा लेकिन तुम घर से जो चाहो कर सकती हो जिसमें तुम्हें रुचि हो।
शिल्पा ने इसके बाद नौकरी के विषय में कभी सोचा ही नहीं। वह 11वीं तथा 12वीं के बच्चों की ट्यूशन लेने लगी। घर के कामकाज के बाद वह बच्चों को पढ़ाती थी और इसके अच्छे खासे पैसे भी मिल जाते थे। शिल्पा घर का ख्याल भी रख रही थी और कमा भी रही थी। वंदना और शिल्पा बड़े प्यार से मिलजुल कर काम करते थे।
इसी बीच वंदना के छोटे बेटे मोहन का विवाह तय हो गया। मोहन को काफी समय से अलका नाम की लड़की पसंद थी और दोनों शादी करना चाहते थे।
जब वंदना को पता चला तो उन्होंने अजीत से कहा, अजीत को लव मैरिज से कोई आपत्ति नहीं हुई। अजीत ने कहा, ‘बस लड़की ऐसी हो जो हमारे परिवार में निभ जाये। तुम्हारी तरह शिल्पा का हाल ना हो बस।
‘ठीक है चलो फिर करो तैयारियां।
अलका और मोहन का विवाह हो गया।
वंदना केवल इतना चाहती थी कि जैसे शिल्पा परिवार में घुल गई है वैसे ही अलका भी घुल जाए। लेकिन वैसा नहीं हुआ। छोटी बहू अलका शिल्पा से एकदम अलग थी। अलका ने पहले दिन से ही अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया। वह बहुत कामचोर थी, रोज आराम से सो कर उठती। अपने कमरे से बाहर आती और डाइनिंग टेबल पर बैठ जाती। ऑफिस के लिए सोहन और मोहन के साथ अब अलका का भी टिफिन तैयार होने लगा।
रात के भोजन के समय भी अलका मदद करने नहीं आती थी। अपने कमरे में जाकर आराम करने लगती। सभी यही सोचते कि अभी नई है, सब सीख जाएगी। यह सब देख वंदना के अंदर ज्वाला जल रही थी। वह महसूस कर रही थी कि शिल्पा अकेली ही पिसती जा रही है।
वंदना घर की शांति भंग नहीं करना चाहती थी लेकिन वह इस शांति के चक्कर में शिल्पा के साथ भेदभाव नहीं होने दे सकती थी।
वंदना ने सोचा वह खुद अलका से बात करेगी। शिल्पा की तरफ जब भी वंदना देखती तो उसे उसके रूप में वह स्वयं ही दिखाई देती। कोल्हू के बैल की तरह जुती हुई।
एक दिन वंदना ने अलका को आवाज लगाते हुए कहा, ‘अलका बेटा, जरा मेरे कमरे में आओ।
अलका पहुंची और बोली, ‘हां मां बोलो ना, ऐसी क्या बात है?
‘देखो अलका हमारे घर में हम सब एक संयुक्त परिवार में रहते हैं और यहां पर सभी का कर्तव्य है कि सब मिलकर काम करें। किसी एक पर काम का बोझ डाल देना सही नहीं है। तुम्हें भी हाथ बटाना चाहिए।
‘मां हाथ तो बटा रही हूं। मैं ऑफिस जाकर बाहर का काम संभाल लेती हूं और शिल्पा जीजी घर का।
‘नहीं बेटा तुम नौकरी अपनी खुशी के लिए कर रही हो। शिल्पा भी तुम्हारे जितनी पढ़ी-लिखी है पर घर की जवाबदारियों के कारण उसने नौकरी नहीं की।
‘तो मां एक काम वाली और रख लेते हैं ना, पैसे मैं दे दूंगी।
‘बात पैसे की नहीं है। सब ने शुरू से घर का अपने हाथों से बना हुआ स्वादिष्ट भोजन ही खाया है। ठीक है मां मैं आपकी बातों का ध्यान रखूंगी, गुस्से में तिलमिलाती अलका अपने कमरे में चली गई।
मोहन ने उससे कहा, ‘क्या हुआ अलका बड़े गुस्से में लग रही हो?
‘अब तुम्हारे घर में मुझे ताने मिलने लगे हैं। मैं काम नहीं करती हूं।
‘अरे तो काम वाली रख लो ना?
‘हां, मैंने भी कहा था मां ने इंकार कर दिया।
‘मैं बात करूंगा मां से, तुम मूड ठीक करो।
हफ्ता यूं ही गुजर गया। अलका ने वंदना की बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया।
मोहन ने वंदना से कहा, ‘मां अलका कह रही थी कि मां काम की वजह से उससे नाराज हैं।
‘मोहन मैं नाराज नहीं थी, प्यार से समझा रही थी कि एक के कंधों पर पूरा काम नहीं होना चाहिए।
‘मां तो एक नहीं दो काम वाली रख लो।
‘मोहन तुम चिंता मत करो मैं सब संभाल लूंगी।
तब तुरंत ही शिल्पा उसके पास आई और कहा, ‘अरे छोड़ो ना मां अलका अभी छोटी है।
‘बेटा यही गलती तो मैंने भी की थी। इसलिए सभी ने मेरा फायदा उठाया, मैं हमेशा पिसती ही रही। वे सब अपने परिवार के साथ घूमने जाते रहे। सब कहते वंदना बहुत अच्छी है, घरेलू है।
‘बेटा मैं नहीं चाहती कि ये सब तुम्हारे साथ भी हो।
‘पर मां इस तरह घर में कलह होगी और परिवार टूट जाएगा।
‘लेकिन आज कोई है हमारे साथ शिल्पा? सब चले ही गए ना छोड़कर, मेरी अच्छाइयों को ताक में रखकर।
‘नहीं मां हमें थोड़ा और इंतजार करना चाहिए।
लेकिन वंदना ने शिल्पा के लिए अपनी चुप्पी तोड़ दी।
अब वह अलका को खुद ही काम करने के लिए कहने लगी।
रात को वंदना ने अलका को आवाज दी, ‘अलका शिल्पा को रोटी बनाने में मदद कर दो और सब्जी जरा काट दो।
अलका नाक मुंह चढ़ा कर ही सही कुछ दिन काम करती रही फिर एक दिन चिढ़कर बोली, ‘मां मुझसे नहीं होगा। आपको कहा था ना मां, काम वाली रख लो।
अब रोज की कलह शुरू हो गई। मोहन हमेशा अलका की ही तरफदारी करता।
एक दिन तो अलका ने अपना गुस्सा शिल्पा के ऊपर ही उतार दिया और कहा, ‘जीजी मैं सब समझती हूं, आप ही मां को भड़काती हो।
शिल्पा की आंखों से आंसू बह रहे थे। वंदना का तो दिमाग खराब हो गया। उन्होंने कहा, ‘अलका तुम गलत सोच रही हो। शिल्पा ने मुझे कभी कुछ नहीं कहा लेकिन मैं जिस चक्की में जीवन भर पिसती आई हूं उसी चक्की में शिल्पा को नहीं पिसने दे सकती। तुम्हें यदि ऐसा लगता है कि बिना किसी को मदद किए तुम सही कर रही हो तो तुम मोहन को लेकर अलग रहने जा सकती हो।
अलका ने तुरंत ही मोहन को आवाज लगाई, ‘मोहन देखो हमें तो घर से निकाला जा रहा है।
मोहन ने वंदना से कहा, ‘मां, मैं अलका का अपमान हरगिज सहन नहीं करूंगा।
अगले चार-पांच दिनों में मोहन ने रहने के लिए मकान ढूंढ लिया। अलका और मोहन को जाते समय शिल्पा ने उन्हें रोकने की कोशिश की। उसने कहा, ‘अलका प्लीज मत जाओ, हम मिलकर रहेंगे ना।
‘नहीं जीजी, जहां शांति नहीं, वहां रहने से क्या फायदा, इतना कहकर वह मोहन के साथ चली गई।
वंदना टूटते परिवार को देखती रही। अजीत शांत थे कि ये महिलाओं का आपसी मामला है।
अलका अलग तो चली गई लेकिन अब अकेले ही घर की सारी जिम्मेदारी उस पर आ गईं। दूध, सब्जी-भाजी, अनाज सब उसे ही ध्यान रखना पड़ता। वहां तो यह सब शिल्पा देख लेती थी। अलका ने कुछ दिन शौक-शौक में यह कर लिया लेकिन अब उसको परेशानी होने लगी।
काम वाली बाई ढंग से काम नहीं करती, उस पर भी नजर रखनी पड़ती थी। खाना बनाने वाली के हाथ का खाना ना मोहन को भाता, ना अलका को। वंदना और शिल्पा के हाथों का बना स्वादिष्ट खाना उसे दोनों समय याद आता। मोहन को अब अपने परिवार की जुदाई बहुत खल रही थी। अल्का भी कहां खुश थी।
एक दिन मोहन ने कहा, ‘अलका यह तो बहुत ही मुश्किल हो रही है काश तुमने थोड़ा समझ लिया होता। मां थोड़ी-सी मदद ही करने का तो बोल रही थीं।
‘तुम भी तो थे ना वहां, मुझे अकेले को दोष क्यों दे रहे हो?
अब उन दोनों के बीच झगड़े शुरू हो गए। इसी बीच अल्का प्रेगनेंट हो गई, उसने अपनी मम्मी को बुला लिया। मम्मी कुछ दिनों के लिए आ गईं लेकिन वह पंद्रह दिन रह कर ही वापस अपने घर चली गईं।
मोहन कई बार शाम को वंदना के पास आकर रात का खाना खाने लगा। जब उसने वंदना को बताया कि अलका प्रेगनेंट है तो पूरे घर में खुशी की लहर दौड़ गई।
वंदना ने कहा, ‘वहां उसका ख्याल रखने के लिए कोई नहीं है। यदि तुम दोनों चाहो तो यहां आकर भी रह सकते हो।
मोहन कोई जवाब ना दे पाया।
जब वह घर गया तो उसने अलका से पूछा, ‘अलका क्या हम वापस घर चलें?
‘ये क्या बोल रहे हो? अब इस तरह जाने में क्या हमारी पहले की तरह इज्जत रह पाएगी? मैं जाने के लिए तैयार नहीं हूं।
वंदना और शिल्पा जानते थे कि अलका का अभिमान उसे वापस नहीं आने देगा। उन्होंने हर रोज मोहन के हाथ से अलका के लिए कुछ ना कुछ उसकी पसंद की चीजें भेजना शुरू कर दिया।
अलका ने फिर अपनी मम्मी को आने के लिए फोन लगाना शुरू कर दिया।
एक दिन अलका की भाभी जया ने अपनी सास से कहा, ‘मम्मी अलका दीदी गलत हैं। ऐसे में आप उनका साथ देंगी, तो उन्हें कभी अपनी गलती का एहसास नहीं होगा। अलका की मम्मी ने कहा, ‘जया तुम ठीक कह रही हो, लोग कहेंगे मां ने अच्छे संस्कार नहीं दिए।
इसलिए जब अलका ने अपनी मां को फोन करके बुलाया तो उन्होंने आने से मना कर दिया। अलका का चेहरा उतर गया।
अलका की तबीयत खराब हो गई। मोहन ने वंदना से कहा, ‘अलका बीमार है।
‘मोहन उसे लेकर यहां आ जाओ। हम उसका पूरा ख्याल रखेंगे।
मोहन ने अलका से कहा, ‘मां कह रही थीं, कुछ दिन के लिए वहां चल कर आराम कर लो। तुम्हें क्या लगता है, सब को छोड़ कर हम दोनों अकेले रह लेंगे? मां पूरी जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार हैं।
मोहन के इतना समझाने से अलका मान गई और पंद्रह दिनों के लिए वे घर पर आ गए। सभी बहुत खुश थे, वंदना और शिल्पा अलका का बहुत ख्याल रख रही थीं। अलका हैरान थी कि उसकी गलतियों के बाद भी वे उसका कितना ख्याल रख रहे हैं।
एक दिन उसने शिल्पा से कहा, ‘जीजी थैंक यू, आप लोग कितना कर रहे हैं मेरे लिए।
शिल्पा ने कहा, ‘हम एक दूसरे का ख्याल नहीं रखेंगे तो और कौन रखेगा।
अलका अब अच्छा महसूस कर रही थी और अब वह वापस अपने घर चली गई। बीच-बीच में हर रविवार मोहन और अलका वंदना के पास आते रहते थे। नौ माह के बाद अलका ने एक बेटे को जन्म दिया।
पंद्रह दिन के लिए उसकी मम्मी मीना भी आ गईं। वंदना ने मीना के जाने के बाद अलका को फिर से अपने घर बुला लिया ताकि देखरेख में कोई कमी ना रहे। बच्चा धीरे-धीरे तीन माह का हो गया।
एक दिन अलका ने वंदना से कहा, ‘मां अब मैं संभाल सकती हूं, मुझे जाना चाहिए।
‘अलका यह घर तुम्हारा है। तुम यहां रह सकती हो। कभी भी संकोच मत करना।
अलका ने कहा, ‘मां मैं जानती हूं।
अलका और मोहन फिर अपने घर चले गए। अब अलका का ऑफिस शुरू हो गया। बच्चे को ऑफिस जाते समय अलका ससुराल में छोड़ देती। वंदना और शिल्पा बच्चे का पूरा ख्याल रखते। धीरे-धीरे काफी जवाबदारी वंदना और शिल्पा पर ही आ गई।
एक दिन अलका ऑफिस से सीधे अपनी मां के घर आई। वह डोर बेल बजाने ही वाली थी कि उसे भाभी की आवाज आई।
वह मम्मी से कह रही थी, ‘गलती तो अलका दीदी की है। पिंकू की सारी जवाबदारी शिल्पा भाभी और आंटी पर ही तो है। अलका दीदी तो पिंकू को छोड़कर सुबह ऑफिस चली जाती हैं। ये तो वह लोग बहुत अच्छे हैं मम्मी, जो दीदी के इतने खराब व्यवहार करने के बावजूद सब कर रहे हैं।
अपनी मम्मी और भाभी का यह वार्तालाप सुनकर अलका की रूह कांप गई। उसका हाथ अपने आप ही डोर बेल से नीचे आ गया और वह उल्टे पांव वहां से चली गई। वह रात भर सो नहीं पाई। उसे बार-बार वही शब्द कानों में सुनाई दे रहे थे। उन शब्दों की गूंज उसके मन मस्तिष्क को भेद रही थी।
वह सुबह उठी तो उसने मोहन से कहा, ‘मोहन मुझे घर ले चलो, इसी वक्त।
‘क्या हुआ अलका, काफी उदास दिख रही हो?
‘मोहन प्लीज कुछ मत पूछो, मुझे लेकर चलो।
‘ठीक है अलका चलो।
पिंकू को गोद में उठाकर अलका मोहन के साथ निकल गई। घर नजदीक ही था। घर पर पहुंच कर उसने पिंकू को वंदना की गोद में देते हुए कहा, ‘मां यह लो आप का पोता, मैं रसोई में जा रही हूं, शिल्पा दीदी की मदद करने।
वंदना भौंचक्की होकर सुन रही थीए देख भी रही थी। अलका फिर रसोई में गई जहां शिल्पा खाना बना रही थी।
अलका ने कहा, ‘जीजी हटो आज से रोज मैं भी आपको गरमा-गरम रोटी बनाकर खिलाऊंगी जैसी आप सबको खिलाती हैं पर आखिर में खुद ठंडी ही खा लेती हैं।
शिल्पा ने उसकी तरफ देखा तो अलका की आंखों से आंसू बह रहे थे, जिसमें उन आंसुओं के साथ उसका पूरा अभिमान बहता हुआ साफ दिखाई दे रहा था। आंखों में वह अपनापन था जो इससे पहले कभी नहीं दिखाई दिया था।
शिल्पा ने कहा, ‘मेरी छोटी बहना पगली, रो क्यों रही है? आज तो मेरी अलका बड़ी हो गई है, समझदार हो गई है, कहते हुए शिल्पा ने उसे सीने से लगा लिया।
पिंकू को गोद में लिए वंदना रसोई के दरवाजे पर खड़ी यह दृश्य देख रही थी। तभी उसकी नजर शिल्पा से मिली।
तब शिल्पा ने कहा, ‘देखो मां, मैं ना कहती थी कि अभी अलका छोटी है धीरे-धीरे सब समझ जाएगी। आज हमारी अलका बड़ी हो गई मां और समझदार भी।
अलका ने झुककर वंदना के पैर छुए और कहा, ‘मां मैं गलत थी अब मुझे समझ में आ गया कि अकेले रहना कितना मुश्किल है। यदि परिवार का साथ हो तो हर चीज आसान लगने लगती है। मां मुझे माफ कर दो, मैं स्वार्थी हो गई थी। मेरा-मेरा करने में हमारा शब्द तो मैं भूल ही गई थी। आज यदि कोई पिंकू को मुझसे दूर कर दे तो? यह सोच कर ही मेरी रूह कांप जाती है और मैं पागल मोहन को आपसे दूर करने चली थी।
वंदना ने कहा, ‘अलका काश तुम्हारी मां की तरह यदि हर मां अपनी बेटी को सही रास्ता दिखलाए तो फिर कोई अलका अपने मोहन को लेकर अलग नहीं जाए और कोई मोहन अपने मां बाप से जुदा ना हो पाए। आज हमारे समाज के टूटते बिखरते परिवारों में हर मां और हर बेटी यदि थोड़ी समझदारी, थोड़ा धैर्य और थोड़ा एडजस्टमेंट करना सीख जाएं तो फिर हमारे परिवार टूटेंगे नहीं बल्कि और मजबूत होंगे। जिनमें रहना स्वर्ग की अनुभूति करने से कम नहीं होगा। आज हमारा परिवार उसी सुख को महसूस कर रहा है। मैं सोच रही हूं कि मैं कितनी भाग्यशाली हूं बेटा। अब मुझे क्या चिंता, अब तो हम दोनों को दादा-दादी बनकर दोनों के बच्चों को ही संभालना है, बाकी सब तो मेरी दोनों बेटियां ही संभाल लेंगी। अब मैं रसोई से रिटायर होकर दादी का फर्ज निभाऊंगी। अब तो एक नहीं मुझे दो-दो को संभालना होगा।
अलका ने दंग होते हुए पूछा, ‘मां यह क्या कह रही हैं आप?
‘हां अलका अब तुम चाची बनने वाली हो, कल ही डॉक्टर ने बताया है।
अलका ने फिर से शिल्पा को गले लगा दिया। शिल्पा और अलका दोनों वंदना के पास गए और दोनों उनकी बांहों में ऐसे लिपट गए जैसे वही उनकी मां हो। यह दृश्य देखकर सभी खुश थे लेकिन मोहन की खुशी का ठिकाना ही नहीं था।

