Shanidev: शनि देव की मूर्ति को महिलाओं द्वारा न छूने या गर्भगृह में प्रवेश न करने के पीछे मुख्य रूप से पौराणिक कथाएं, ज्योतिषीय मान्यताएं और सांस्कृतिक परंपराएं जिम्मेदार हैं। हालांकि, यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है कि ये प्रतिबंध सर्वव्यापी नहीं हैं और न ही शास्त्रसम्मत रूप से हर जगह अनिवार्य हैं।
यहाँ इसके मुख्य कारण दिए गए हैं:
श्राप की कथा (पौराणिक मान्यता): मान्यता है कि शनिदेव की पत्नी ने उन्हें श्राप दिया था कि वे जिसे भी अपनी सीधी दृष्टि से देखेंगे, उसका अनिष्ट (नाश) हो जाएगा। चूँकि महिलाएं (विशेषकर विवाहित) को शक्ति का रूप माना जाता है, इसलिए माना जाता है कि उन पर शनिदेव की नकारात्मक ऊर्जा का सीधा असर पड़ सकता है।
नकारात्मक ऊर्जा और उग्रता: शनिदेव को कर्मफल दाता और रहस्यमय विद्याओं का कारक माना जाता है। मान्यता है कि शनिदेव की मूर्ति से एक विशेष प्रकार की ऊर्जा निकलती है, जो महिलाओं की संवेदनशीलता के कारण उन पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।
ऐतिहासिक परंपराएँ और सुरक्षा: शनि शिंगनापुर जैसे कुछ मंदिरों में, जहाँ शनिदेव खुले में शिला के रूप में स्थापित हैं, वहाँ वर्षों से चली आ रही परंपरा का हवाला दिया जाता है। चूँकि यह मूर्ति एक शिला के रूप में है, इसे केवल पुरुष (पुजारी) स्पर्श करते हैं।
शारीरिक अवस्था: कुछ पुरानी रूढ़िवादी मान्यताओं में, महिलाओं के मासिक धर्म को अशुद्ध मानकर भी उन्हें मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश या प्रतिमा स्पर्श से रोका जाता रहा है।
महत्वपूर्ण तथ्य:
यह एक सांस्कृतिक परंपरा अधिक है, न कि कोई कठोर धार्मिक नियम। महिलाएं शनिदेव की पूजा कर सकती हैं, मंत्र जाप कर सकती हैं और दूर से सरसों का तेल अर्पित कर सकती हैं। आधुनिक समय में और उच्च न्यायालय के फैसलों के बाद, कई मंदिरों में यह भेदभाव समाप्त हो रहा है और महिलाएं भी पूजा कर रही हैं।
निष्कर्ष:
औरतों को शनिदेव की मूर्ति को इसलिए न छूने की सलाह दी जाती है क्योंकि मान्यता है कि उनकी तेज़ और नकारात्मक ऊर्जा महिलाओं को प्रभावित कर सकती है, लेकिन यह कोई अनिवार्य नियम नहीं है।

