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'राजनीतिक आत्मरक्षा' या मौके की नजाकत: जिस महिला आरक्षण बिल के खिलाफ थे सपा प्रमुख, शर्तों के साथ समर्थन के क्यों दिए संकेत?

'राजनीतिक आत्मरक्षा' या मौके की नजाकत: जिस महिला आरक्षण बिल के खिलाफ थे सपा प्रमुख, शर्तों के साथ समर्थन के क्यों दिए संकेत?

उत्तर प्रदेश में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव की सियासी तपिश के बीच समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने एक बड़ा राजनीतिक 'यू-टर्न' लिया है। लोकसभा के आगामी मानसून सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन बिल के दोबारा पेश होने की चर्चाओं के बीच सपा प्रमुख की रणनीति पूरी तरह बदली हुई नजर आ रही है।

मंगलवार को विभिन्न महिला संगठनों और सिविल सोसाइटी से जुड़े एक प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात करने के बाद, अखिलेश यादव ने सरकार के सामने तीन बड़ी शर्तें रखकर इन दोनों महत्वपूर्ण बिलों को सकारात्मक संकेत दे दिए हैं। इस कदम को राजनीतिक विश्लेषक 'राजनीतिक आत्मरक्षा' और मौके की नजाकत से जोड़कर देख रहे हैं, क्योंकि तीन महीने पहले तक सपा इस बिल के धुर विरोधियों में शामिल थी।

16 अप्रैल को संसद में हुआ था भारी विरोध, पीएम मोदी ने याद दिलाई थी 'दोस्ती'
गौरतलब है कि 16 अप्रैल 2026 को जब संसद में महिला आरक्षण और परिसीमन बिल के मुद्दे पर चर्चा चल रही थी, तब माहौल बेहद गर्म था। लोकसभा में भाषण के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सपा प्रमुख को संबोधित करते हुए कहा था, 'अखिलेश जी मेरे मित्र हैं, जो कभी-कभी हमारी मदद कर देते हैं।'

हालांकि, उस समय सपा सांसदों ने सरकार का समर्थन करने के बजाय विपक्ष के साथ मजबूती से खड़े रहकर दोनों ही बिलों के खिलाफ वोटिंग की थी, जिसके चलते मोदी सरकार इसे संसद से पास नहीं करा सकी थी। उस समय भारतीय जनता पार्टी ने अखिलेश यादव को 'महिला विरोधी' के कठघरे में खड़ा करने की पूरी कवायद की थी। अब ठीक तीन महीने बाद मानसून सत्र से पहले अखिलेश यादव ने शर्तों के साथ पासा फेंककर भाजपा के उस पुराने चक्रव्यूह को तोड़ने की कोशिश की है।

विपक्ष का बिगड़ा गेम और भाजपा का बढ़ता बहुमत देख बदला सपा का रुख
अखिलेश यादव के इस अचानक बदले रुख के पीछे पिछले तीन महीनों में तेजी से बदला देश का सियासी माहौल है। पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद ममता बनर्जी की पार्टी में बड़ी टूट देखने को मिली है, जहां टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसद अलग होकर एनसीपीआई में विलय कर सरकार के समर्थन में खड़े हो गए हैं।

इसके अलावा उद्धव ठाकरे की पार्टी के 9 में से 6 लोकसभा सांसद भी टूटकर शिंदे खेमे के साथ चले गए हैं, जबकि इंडिया ब्लॉक से द्रमुक (DMK) भी अलग हो चुकी है। विपक्ष के इस बिखरते गेम के चलते भाजपा के अगुवाई वाला एनडीए गठबंधन अब संसद में दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े के बेहद करीब पहुंचता नजर आ रहा है। अखिलेश यादव इस बात को अच्छी तरह समझ रहे हैं कि अब विरोध करके भी इस बिल को रोकना मुमकिन नहीं होगा, ऐसे में 'विलेन' बनने के बजाय शर्तों के साथ समर्थन देकर अपने पीडीए एजेंडे को सेट करना ज्यादा फायदेमंद है।

अखिलेश यादव ने सरकार के सामने रख दीं ये 3 शर्तें

  1. सीट विस्तार का दायरा बढ़े: परिसीमन बिल के माध्यम से न केवल लोकसभा, बल्कि उच्च सदन यानी विधान परिषद और राज्यसभा के संदर्भ में भी सीट विस्तार कर सीटों की संख्या बढ़ाई जाए।
  2. मुस्लिम और पिछड़ा प्रतिनिधित्व अनिवार्य हो: महिला आरक्षण बिल के तहत पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) में शामिल पिछड़े समाज की महिलाओं और विशेष रूप से अल्पसंख्यक मुस्लिम महिलाओं का उचित प्रतिनिधित्व विधिक रूप से सुनिश्चित किया जाए।
  3. 2027 चुनाव से ही हो लागू: महिला आरक्षण के प्रावधानों को जनगणना और परिसीमन से अलग करके तत्काल प्रभाव से आगामी 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ही लागू कराया जाए।

प्रतिनिधिमंडल ने सपा प्रमुख से मांग की थी कि संसद के भीतर और बाहर इस मांग पर दबाव बनाया जाए। इसके बाद अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया के जरिए अपनी इन मांगों को सार्वजनिक कर दिया है। राजनीतिक हलकों में साफ चर्चा है कि अगर केंद्र सरकार इन मांगों पर सकारात्मक रुख अपनाती है, तो सपा इस बिल को अपना समर्थन दे सकती है, जिससे आगामी यूपी चुनाव में महिलाओं के बीच उनकी छवि को भी एक बड़ा बूस्ट मिलेगा।

अभिषेक यादव

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