
उत्तर प्रदेश में बच्चों के मजबूत स्वास्थ्य और कुपोषण से मुक्ति दिलाने की दिशा में योगी सरकार का प्रयास रंग ला रहा है। 'सक्षम आंगनबाड़ी एवं पोषण-2.0' की गाइडलाइन के तहत संचालित 'हॉट कुक्ड मील योजना' के माध्यम से 3 से 6 वर्ष तक के नौनिहालों को नियमित रूप से ताजा, गर्म और पौष्टिक आहार दिया जा रहा है।
प्रदेश में संचालित लगभग 1.45 लाख को-लोकेटेड और 0.44 लाख नॉन को-लोकेटेड आंगनबाड़ी केंद्रों पर आने वाले करीब 32.88 लाख बच्चे इस योजना का नियमित लाभ उठा रहे हैं।
साप्ताहिक मेन्यू के आधार पर मिल रहा विविधतापूर्ण पौष्टिक भोजन
बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग द्वारा तैयार साप्ताहिक मेन्यू के अनुसार बच्चों के खान-पान का विशेष ध्यान रखा जा रहा है। बच्चों को हफ्ते के अलग-अलग दिनों में रोटी-सब्जी, दाल-चावल, मौसमी सब्जियों से बनी तहरी और अन्य पौष्टिक व्यंजन परोसे जाते हैं। योगी सरकार का उद्देश्य आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से बच्चों को केवल भोजन उपलब्ध कराना ही नहीं है, बल्कि कम उम्र से ही उनमें संतुलित और पौष्टिक आहार की आदतें विकसित करना भी है।
स्वच्छता और खाद्यान्न की गुणवत्ता पर विभाग का सख्त पहरा
योगी सरकार ने बच्चों को दिए जाने वाले भोजन की शुद्धता और गुणवत्ता को लेकर कड़े मानक तय किए हैं। योजना के तहत कोटेदार से मिलने वाला खाद्यान्न उत्तम गुणवत्ता का होना अनिवार्य किया गया है। भोजन पकाने से पहले अनाज की बेहतर सफाई और हरी सब्जियों को दो से तीन बार स्वच्छ पानी से धोने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि बच्चों को पूरी तरह से स्वच्छ, सुरक्षित और कीटाणुरहित भोजन मिल सके।
परोसने से पहले दो वयस्क करते हैं भोजन का परीक्षण
भोजन की गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विभाग ने एक विशेष निगरानी व्यवस्था लागू की है। बच्चों को भोजन परोसने से ठीक पहले कम से कम दो वयस्क व्यक्तियों द्वारा रोस्टर के आधार पर भोजन का स्वाद और गुणवत्ता परखा जाता है। जांच में सही पाए जाने के बाद ही भोजन बच्चों की थाली तक पहुंचता है।
32.88 लाख बच्चों को प्रति दिन 70 ग्राम खाद्यान्न का आहार
महिला कल्याण, बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग की अपर मुख्य सचिव लीना जौहरी ने बताया कि योजना के जरिए रोजाना 32.88 लाख बच्चों को 70 ग्राम खाद्यान्न से तैयार भोजन दिया जा रहा है। प्राथमिक व उच्च प्राथमिक विद्यालयों से जुड़े (को-लोकेटेड) आंगनबाड़ी केंद्रों पर पीएम पोषण योजना की रसोई और संसाधनों का उपयोग किया जाता है। वहीं, नॉन-को-लोकेटेड केंद्रों पर ग्राम पंचायतों और स्थानीय निकायों द्वारा दिए गए बर्तन व गैस चूल्हे से भोजन तैयार कराया जाता है।
अभिषेक यादव

