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मधुमेह के लिए आयुर्वेद: एक विशेषज्ञ की सलाह

मधुमेह एक चयापचय विकार होता है जो शून्य (टाइप १ डायबिटिज) या इंसुलिन हार्मोन के अपर्याप्त उत्पादन (टाइप २ डायबिटिज), जो शर्करा चयापचय बढ़ाता है- इन दोनों वजहों से होता है। यही कारण है कि मरीज़ में रक्त शर्करा स्तर काफी उच्च स्तर पर चला जाता है।

९० फीसदी मधुमेह रोगी टाइप २ डायबिटिज के शिकार होते हैं। जिसका दुष्परिणाम उनकी आंखों (डायबिटिक रेटिनोपैथी), किडनी (डायबिटिक नेफ्रोपैथी), तंत्रिकाओं (डायबिटिक न्यूरोपैथी), और यहां तक कि हृदय पर भी पड़ता है। मरीज़ का वज़न घटने लगता है, अंगों में सुस्ती महसूस होने लगती है, और दिल के दौरे का खतरा पैदा हो जाता है।

लोग हमेशा मधुमेह को एक नई तरह की बीमारी समझते हैं और इसे आज के दौर की नई पद्धतियों से ठीक करने की कोशिशें करते हैं। लेकिन दरअसल, यह एक प्राचीन बीमारी है जिसका आयुर्वेद पहले ही इलाज सुझा चुका है।

आयुर्वेद क्यों?

मधुमेह बाह्य बायोटिक या रसायनिक हमलों से उत्पन्न नहीं होता। बल्कि यह हमारे आंतरिक शरीर में रसायनों के अंसतुलित होने से पैदा होता है। एलोपैथी, मधुमेह के इलाज के लिए कई प्रकार की दवाइयां, आहारों में परहेज़, और व्यायाम करने की सलाह देता है जिनके मरीज़ के शरीर पर दुष्प्रभाव पड़ते हैं।

इस दिशा में, आयुर्वेद अनोखा साबित होता है। यह प्राचीन चिकित्सीय पद्धति किसी भी व्यक्ति को संपूर्णता से ठीक करती है, यह पूरे शरीर पर केंद्रीत होती है ना कि सिर्फ किसी विशेष अंग या हिस्से पर। सच्चाई भी तो यही है कि हमारा शरीर सिर्फ कई अंगों का समूह ही नहीं है; बल्कि ये सारे अंग एक दूसरे से मिलकर कार्य करते हैं ताकि हम स्वस्थ और क्रियाशील रह सकें।

आयुर्वेद द्वारा शरीर-केंद्रीत विश्लेषण

अलग-अलग शरीर में किसी भी बीमारी के अलग-अलग लक्षण देखने को मिल सकते हैं। इसलिए, सिर्फ उन लक्षणों पर ध्यान देने के बजाय, आयुर्वेद मरीज़ के पूरे शरीर पर केंद्रीत होता है।

आयुर्वेद, व्यक्ति को इन तीन विभिन्न श्रेणियों के आधार पर विश्लेषित करता है- वात, पित्त, और कफ़। यह पुराने ज़माने का श्रेणियों में बांटने का तंत्र किसी भी व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक स्थितियों का बिल्कुल सटीक पता लगाने में कारगर होता है। जिसके परिणामस्वरूप, आयुर्वेद द्वारा मधुमेह का इलाज ज़्यादा प्रभावी होता है।

मस्तिष्क, शरीर, और आत्मा के बीच तालमेल

मस्तिष्क और शरीर को आयुर्वेद एक रूप में देखता है, क्योंकि ये दोनों आपस में करीब से जुड़े होते हैं और एक साथ मिलकर कार्य करते हैं। कई बार, किसी शारीरिक बीमारी का जुड़ाव सीधे व्यक्ति के मस्तिष्क से होता है। आयुर्वेद इस बिंदु को ध्यान में रखता है और किसी रोगी व्यक्ति के इलाज के प्रति एक समग्र दृष्टिकोण अपनाता है।

औषधि-पौधे(जड़ी-बूटी इत्यादि): आयुर्वेद का चमत्कार

आयुर्वेद उन दवाइयों का इस्तेमाल करता है जो पौधों से तैयार की जाती हैं। यह दवाइयां हमारे शरीर के लिए इंसुलिन पैदा करने वाली पाचक-ग्रंथि को दोबारा से ठीक और मजबूत कर उन्हें सहारा प्रदान करती हैं। दूसरी तरफ एलोपैथिक दवाइयां पाचक-ग्रंथि से अत्यधिक कार्य करवाती हैं, और इस तरह से उन्हें कमज़ोर करती हैं। जिसका असर यह होता है कि, एक मधुमेह रोगी जो शुरुआत में मुंह से दवाइयां खाता है, कुछ सालों बाद उसे इंसुलिन के इंजेक्शन लेने पड़ते हैं।

दूसरे विकारों से भी बचाव

मधुमेह के मूल कारणों के साथ-साथ आयुर्वेद इसके साथ पैदा हुए दूसरे लक्षण जैसे डायबिटिक न्यूरोपैथी, डायबिटिक नेफ्रोपैथी या डायबिटिक रेटिनोपैथी पर भी काम करता है। आयुर्वेद इन सभी के लिए सटीक बचाव साधन का उपाय बतलाता है। आयुर्वेदिक दवाइयां मानव प्रतिरक्षा प्रणाली को भी मजबूत बनाती हैं।

निष्कर्ष:

एक आयुर्वेदिक दवाई ही किसी मधुमेह पीड़ित की कई सारी समस्याओं को ठीक कर सकती है- जैसे मांसपेशियों में कमज़ोरी, थकावट, शर्करा चयापचय, इत्यादि। चूंकि आयुर्वेद १०० प्रतिशत प्राकृतिक है और इसके कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ते, यह मधुमेह रोगी को संपूर्णता के साथ एक आनंदित जीवन प्रदान करने में कारगर साबित हो सकती है।

आयुर्वेद पारंपरिक औषधियों की एक वह व्यवस्था है, जो मधुमेह से ग्रस्त लोगों की अच्छी तरह से देखभाल को सुनिश्चित कर सकती है।

डॉ. संतोष सुभाष ढागे आयुर्वेद, मेडिसिन, और सर्जरी के विशेषज्ञ हैं।

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