Kartik Swami Temple: आज बैसाखी के पावन अवसर पर हिमाचल प्रदेश के दुर्गम इलाके भरमौर में स्थित कार्तिक स्वामी मंदिर कुगती के कपाट खुले हैं। 134 दिन बाद आज संक्रांति के अवसर पर विधि-विधान के साथ श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए है।
कपाट खुलने से पहले मंदिर में पूरी रात जागरण चलता रहा। सुबह विशेष पूजा, हवन और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ मंदिर के कपाट खोले गए। हिमाचल के अलावा पंजाब, हरियाणा, जम्मू समेत कई राज्यों के सैकड़ों श्रद्धालु भरमौर पहुंचे है और कार्तिक स्वामी के दर्शन कर रहे हैं।
दीपावली के बाद जाते हैं एकांतवास में
भरमौर के कुगती इलाके में सर्दियों में भारी बर्फबारी होती है। मान्यता है कि भगवान शिव के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिक स्वामी दीपावली के बाद एकांतवास (पाताल लोक) में चले जाते हैं और उनके लौटने तक मंदिर के कपाट बंद रहते हैं। बैसाख माह की संक्रांति पर कार्तिक स्वामी मंदिर में लौट आते हैं। कपाट बंद होने के दौरान मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र में जाना पूर्णतः वर्जित माना जाता है। इसलिए, ग्रामीण और श्रद्धालु इस परंपरा का सख्ती से पालन करते हैं। कुगती स्थित कार्तिक मंदिर आने वाले श्रद्धालु मणिमहेश यात्रा पर जरूर जाते हैं। हालांकि इस बार अभी मणिमहेश जाने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया गया है। बीते साल मानसून की भारी बारिश और बादल फटने से भी मणिमहेश के रास्ते पूरी तरह टूटे हुए हैं। इसे देखते हुए एसडीएम भरमौर ने धंछो से आगे मणिमहेश की तरफ जाने पर पूरी तरह रोक लगाई है।
भगवान शिव के ज्येष्ट पुत्र केलंग बजीर
कार्तिक स्वामी भगवान शिव के ज्येष्ट पुत्र हैं। गद्दी समुदाय के अधिकतर लोग इन्हें कुल देवता के रूप में पूजते हैं। लोग इन्हें केलंग बजीर भी कहते हैं। जिसे देवताओं का सेनापति भी कहा गया है। कुगती गांव से करीब 6 किलोमीटर दूर एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित केलंग बजीर का मंदिर हजारों लोगों की आस्था का केंद्र है। लोकमान्यता है कि जब भगवान कार्तिकेय को पता चला कि माता पार्वती ने गणेश जी का राज्यभिषेक करवा दिया है, तो वे क्रोधित हो उठे और माता पार्वती को उनका मांस व दूध वहीं अपर्ण कर दिया और अपना कंकाल स्वरूप लेकर कैलाश पर्वत से निकल पड़े। कहा जाता है कि कैलाश से कार्तिकेय सीधे कुगती पहुंचे थे और वहां पर कुछ देर विश्राम करने के बाद लाहुल की ओर चल पड़े।
अब कैलाश तो नहीं जाएंगे
कुगती में जिस स्थान पर भगवान कार्तिक स्वामी ने विश्राम किया था, उस स्थान पर आज भी लोग कार्तिक स्वामी की पूजा करते हैं। लाहुल में कई देवताओं के मनाने के बावजूद कार्तिकेय नहीं माने और अंततः भोलेनाथ ने स्वयं आकर उनको मनाया और कैलाश पर्वत साथ चलने को कहा। लेकिन, कार्तिकेय ने भोलेनाथ से कहा कि वह अब कैलाश तो नहीं जाएंगे, लेकिन पिता का आदेश है तो कैलाश पर्वत से पीछे एक पहाड़ी पर उनका वास रहेगा। बताया जाता है कि जिस स्थान पर कार्तिकेय ने अपना स्थान लिया उस जगह को शिव भयाली कहा जाता है।
मनोज ठाकुर
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