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Explained: वही ब्रांड, वही पैकेट, विदेश में क्वालिटी बढ़िया, लेकिन भारत में घटिया!'

Explained: वही ब्रांड, वही पैकेट, विदेश में क्वालिटी बढ़िया, लेकिन भारत में घटिया!'

क ही कंपनी, एक ही ब्रांड. पैकेट का रंग भी लगभग वही, लेकिन जो प्रोडक्ट लंदन या सिडनी की दुकान पर बिक रहा है और जो आपके मोहल्ले की दुकान पर टंगा है, अंदर से दोनों एक जैसे नहीं हैं.

कहीं चीनी ज्यादा है, कहीं तेल सस्ता है और सबसे बड़ा फर्क यह है कि विदेश में जिस चीज पर पैकेट के सामने ही लाल निशान लगाकर चेतावनी दी जाती है, भारत में वही जानकारी पीछे छोटे अक्षरों में लिखी होती है.

कोल्ड ड्रिंक से समझ लें पूरी बात

लंदन में बिकने वाली फैंटा के एक कैन में करीब 63 कैलोरी होती है. वही ब्रांड भारत में खरीदिए तो उसमें करीब तीन गुना ज्यादा चीनी मिलती है. इसमें एक आर्टिफिशियल रंग भी होता है. यूरोप में इस रंग के इस्तेमाल पर पैकेट के सामने साफ चेतावनी लिखनी पड़ती है. भारत में यही बात कैन के पीछे छोटे अक्षरों में दर्ज रहती है, जहां आम खरीदार की नजर जाती ही नहीं.

दिलचस्प बात यह है कि जो कंपनियां भारत में ऐसे लेबल का विरोध करती रही हैं, वही यूरोप के करीब दो दर्जन बाजारों में अपनी ड्रिंक्स पर ट्रैफिक लाइट जैसे लेबल खुद लगाती हैं और उसे पारदर्शिता बताती हैं.

चॉकलेट में कोको कितना?

भारत में बिकने वाले आम किटकैट में कोको सॉलिड करीब साढ़े चार फीसदी होता है. ऑस्ट्रेलिया में बिकने वाले किटकैट की मिल्क चॉकलेट में कम से कम 22 फीसदी कोको होता है, यानी जिस चीज के लिए लोग चॉकलेट खरीदते हैं, भारतीय वर्जन में वही सबसे कम है. बाकी हिस्सा चीनी, दूध का पाउडर और वेजिटेबल फैट से भरा जाता है.

सबसे ज्यादा उलझा हुआ है मैगी वाला मामला

भारत में बिकने वाली मैगी के सभी वेरिएंट पाम ऑयल से बनते हैं. ब्रिटेन में बिकने वाले कई वर्जन में उससे महंगा सनफ्लावर ऑयल इस्तेमाल होता है और सबसे बड़ी बात यह कि ब्रिटेन में बिकने वाले कई मैगी पैकेट बनते भारत में ही हैं, लेकिन उन पैकेटों पर सामने की तरफ लाल निशान लगा होता है जो बताता है कि इसमें नमक ज्यादा है. वही पैकेट भारत में बिना किसी लाल निशान के बिकता है, यानी फैक्ट्री एक, प्रोडक्ट लगभग एक, फर्क सिर्फ नियम का है.

बच्चों के खाने में 50 साल का फर्क

नेस्ले ने 2024 में ऐलान किया कि वह भारत में बिना चीनी वाला सेरेलैक बेबी फूड बेचना शुरू करेगी. इससे पहले करीब पचास साल तक देश में सिर्फ चीनी वाला वर्जन ही बिकता रहा, जबकि कई दूसरे देशों में बिना चीनी वाला वर्जन पहले से मौजूद था. यह बदलाव तब आया जब कार्यकर्ताओं और सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों ने लगातार सवाल उठाए.

कंपनियां क्या कहती हैं?

कंपनियों का तर्क सीधा है. हर देश में लोगों का स्वाद अलग है और खर्च करने की क्षमता अलग है इसलिए रेसिपी बदलनी पड़ती है. इंडस्ट्री में काम कर चुके लोग भी मानते हैं कि रेसिपी में इतना फर्क होने की सबसे बड़ी वजह कीमत और लोगों की जेब है. सस्ता प्रोडक्ट बनाने के लिए सस्ता कच्चा माल लेना पड़ता है.

सवाल यहीं से शुरू होता है. सस्ता बनाना एक बात है, लेकिन जानकारी छिपाना दूसरी बात है. अगर वही कंपनी ब्रिटेन के पैकेट पर लाल निशान लगा सकती है तो भारत के पैकेट पर क्यों नहीं?

लेबल की लड़ाई कहां अटकी है?

दुनिया के करीब बीस देशों में पैकेट के सामने ही लाल और हरे निशान लगते हैं ताकि एक नजर में पता चल जाए कि चीनी, नमक या फैट ज्यादा है. भारत में यह बहस 2017 से चल रही है, जब रंगीन चेतावनी और स्टार रेटिंग जैसे प्रस्ताव सामने आए थे. लेकिन नियम आज भी वही है कि कंपनियों को सिर्फ पीछे की तरफ सामग्री और बेसिक न्यूट्रिशन जानकारी देनी है.

अगस्त में फूड रेगुलेटर एफएसएसएआई ने पैकेट के सामने रंगीन चेतावनी लगाने का इरादा छोड़ दिया. उसका कहना था कि ऐसे लेबल इस बात का ध्यान नहीं रखते कि भारतीय खाने का स्वाद पश्चिमी खाने से ज्यादा तेज होता है. उसकी जगह उसने काले सफेद टेबल का सुझाव दिया, जिसमें चीनी, फैट और नमक की मात्रा लिखी होगी.

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट इस फैसले को देख रहा है. फरवरी में अदालत ने रेगुलेटर से कहा था कि वह चेतावनी वाले लेबल पर गंभीरता से विचार करे और इजरायल में चल रहे लाल हरे निशान वाले सिस्टम को भी देखे.

अगस्त में रेगुलेटर ने अदालत को बताया कि पैकेजिंग को अंतरराष्ट्रीय मानकों जैसा बनाना मुश्किल है. इस पर जजों ने नाराजगी जताई और कहा कि दुनिया को यह पता चलना चाहिए कि भारत अपने नागरिकों की सेहत को लेकर गंभीर है.

दांव कितना बड़ा है?

लांसेट में छपी एक हालिया स्टडी के मुताबिक, साल 2050 तक भारत में करीब पैंतालीस करोड़ लोग मोटापे या ज्यादा वजन की चपेट में आ सकते हैं. दूसरी तरफ इंडस्ट्री के अपने अनुमान कहते हैं कि देश के 100 अरब डॉलर से बड़े पैकेज्ड फूड और बेवरेज बाजार में करीब अस्सी फीसदी सामान ऐसा है, जिसे ज्यादा फैट, चीनी या नमक वाला माना जा सकता है. यानी अगर लाल निशान वाला नियम लागू हुआ तो दुकानों की रैक लाल निशानों से भर जाएगी. यही वजह है कि इंडस्ट्री इस पर इतनी सख्ती से अड़ी हुई है.

फिलहाल आप क्या कर सकते हैं?

जब तक पैकेट के सामने कोई साफ चेतावनी नहीं आती, ग्राहक के पास एक ही रास्ता है. पैकेट पलटकर पीछे लिखी छोटी लाइनें पढ़िए. खास तौर पर तीन चीजें देखिए. 100 ग्राम में कितनी चीनी है, कितना नमक है और कौनसा तेल इस्तेमाल हुआ है. सामग्री की सूची में जो चीज सबसे पहले लिखी होती है, वह उस प्रोडक्ट में सबसे ज्यादा होती है. अगर पहले या दूसरे नंबर पर ही चीनी लिखी है तो समझ जाइए कि वह प्रोडक्ट असल में क्या है.

ध्यान रहे- किटकैट, मैगी और फैंटा से जुड़े आंकड़े प्रोडक्ट लेबल और कंपनियों की सार्वजनिक ऑनलाइन जानकारी पर आधारित हैं

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Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Himachal Fast News