Dailyhunt Logo
  • Light mode
    Follow system
    Dark mode
    • Play Story
    • App Story
Kanwar Yatra: डाक, खड़ी, झांकी.कितने तरह के होते हैं कांवड़, क्या हैं इनके नियम?​

Kanwar Yatra: डाक, खड़ी, झांकी.कितने तरह के होते हैं कांवड़, क्या हैं इनके नियम?​

कांवड़ यात्रा शुरू हो चुकी है. भक्तजन गंगा एवं अन्य पवित्र नदियों से जल लेकर शिव मंदिरों की ओर बढ़ चुके हैं. 13 दिनों तक चलने वाली यात्रा देश भर में अलगअलग कई स्थानों से शुरू होगी और शिव मंदिरों पर जाकर समाप्त होगी.

सामान्य दशा में यह सावन के पहले दिन शुरू होकर की सावन की शिवरात्रि पर जलाभिषेक के साथ समाप्त होती है. इस साल यात्रा 30 जुलाई से शुरू होकर 11 अगस्त तक चलेगी. आइए, इसी बहाने समझते हैं कि कितनी तरह की कांवड़ यात्रा होती है? इनके सामान्य नियम क्या हैं? किनकिन राज्यों में कांवड़ यात्रा निकलती है?

कांवड़ यात्रा के नियम क्षेत्र, परंपरा और परिवार के अनुसार अलग हो सकते हैं. फिर भी कुछ नियम लगभग हर जगह माने जाते हैं. कांवड़ यात्रा देश में अलगअलग नाम से जानीपहचानी जाती है.

सामान्य या बैठी कांवड़

सामान्य कांवड़ सबसे अधिक दिखाई देती है. इसमें कांवड़िया अपनी सुविधा के अनुसार पैदल यात्रा करता है. वह रास्ते में रुक सकता है. कुछ देर आराम भी कर सकता है. इस कांवड़ को जमीन पर सीधे नहीं रखा जाता. कांवड़िया इसे किसी स्टैंड या विशेष स्थान पर टांगता है. कई जगह इसे बैठी कांवड़ भी कहा जाता है.

सामान्य कांवड़.

इस यात्रा में श्रद्धालु गंगाजल भरकर अपने शहर या गांव के शिव मंदिर तक जाता है. दूरी कम या अधिक हो सकती है. कुछ कांवड़िए कई दिनों तक पैदल चलते हैं. सामान्य कांवड़ में यात्रा की गति पर बहुत कठोर नियम नहीं होते. ये समाचार आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है। फिर भी श्रद्धालु संयम और भक्ति का पालन करते हैं.

डाक कांवड़

डाक कांवड़ को तेज गति वाली कांवड़ माना जाता है. इसमें कांवड़िया गंगाजल लेकर बिना लंबा विश्राम किए अपने गंतव्य की ओर बढ़ता है. डाक कांवड़ में कई बार एक समूह शामिल होता है. एक कांवड़िया आगे चलता है. दूसरे लोग उसके लिए रास्ते की व्यवस्था करते हैं. जरूरत पड़ने पर वे आपस में जिम्मेदारी बदल भी सकते हैं.

सामान्य कांवड़.

डाक कांवड़ का उद्देश्य तय समय में जल को शिव मंदिर तक पहुंचाना होता है. इसके लिए यात्रा की योजना पहले से बनाई जाती है. रास्ते में भोजन, पानी और चिकित्सा सहायता की व्यवस्था रहती है. कई डाक कांवड़िए वाहन का उपयोग भी करते हैं. लेकिन जिस व्यक्ति के पास कांवड़ की जिम्मेदारी होती है, वह अक्सर पैदल चलता है. इस परंपरा के नियम अलगअलग क्षेत्रों में अलग हो सकते हैं.

खड़ी कांवड़

खड़ी कांवड़ में कांवड़ को जमीन पर रखना वर्जित माना जाता है. इसे हमेशा खड़ा रखा जाता है. कांवड़ को किसी स्टैंड, पेड़ या विशेष सहारे पर टांगा जाता है. कांवड़िया थकने पर आराम कर सकता है. लेकिन कांवड़ को जमीन से दूर रखना जरूरी माना जाता है. इस कारण यात्रा के साथ विशेष स्टैंड भी रखा जाता है.

खड़ी कांवड़.

खड़ी कांवड़ के लिए कई श्रद्धालु बांस, लकड़ी या लोहे का सहारा रखते हैं. कुछ समूह कांवड़ रखने के लिए अलगअलग स्थान बनाते हैं. इन स्थानों पर कांवड़ को सुरक्षित रखा जाता है. इस परंपरा में पवित्रता और अनुशासन का विशेष महत्व है. कांवड़ को पैर से छूना या उसके पास गंदगी करना उचित नहीं माना जाता.

झांकी कांवड़

झांकी कांवड़ को सजाकर तैयार किया जाता है. इसमें भगवान शिव, माता पार्वती, नंदी या धार्मिक कथाओं से जुड़े दृश्य बनाए जाते हैं. झांकी कांवड़ आकार में बड़ी हो सकती है. इसमें रंगीन कपड़े, फूल, बिजली की लाइट और धार्मिक चित्र लगाए जाते हैं. कुछ कांवड़िए इसे आकर्षक रूप देने के लिए संगीत और भजन का भी उपयोग करते हैं.

झांकी कांवड़.

झांकी कांवड़ अक्सर समूह में निकाली जाती है. इसमें कई लोग शामिल होते हैं. कुछ लोग कांवड़ उठाते हैं. कुछ लोग भजन गाते हैं. अन्य लोग व्यवस्था संभालते हैं. झांकी कांवड़ में सजावट के साथ सुरक्षा भी जरूरी है. बिजली के तार खुले नहीं होने चाहिए. कांवड़ बहुत भारी नहीं होनी चाहिए. सड़क पर चलते समय दूसरे लोगों के लिए पर्याप्त जगह छोड़ना जरूरी है.

बड़ी या विशाल कांवड़

कुछ श्रद्धालु बहुत बड़ी कांवड़ बनाते हैं. इन कांवड़ों को विशाल कांवड़ कहा जा सकता है. इनकी ऊंचाई और सजावट लोगों का ध्यान आकर्षित करती है. बड़ी कांवड़ को संभालने के लिए कई लोगों की जरूरत होती है. यात्रा के दौरान इसे मोड़ने, घुमाने और रोकने के लिए पहले से योजना बनाई जाती है. ऐसी कांवड़ मुख्य रूप से धार्मिक उत्साह और सामूहिक भक्ति का प्रतीक होती है. लेकिन इसके कारण यातायात प्रभावित हो सकता है. इसलिए प्रशासन की अनुमति और स्थानीय नियमों का पालन जरूरी है.

दांडी कांवड़.

दांडी कांवड़

कुछ क्षेत्रों में दांडी कांवड़ की परंपरा भी मिलती है. इसमें श्रद्धालु विशेष अनुशासन के साथ यात्रा करता है. कई बार वह दंडवत या लगातार झुककर आगे बढ़ता है. यह यात्रा सामान्य कांवड़ की तुलना में अधिक कठिन होती है. इसमें शारीरिक क्षमता और मानसिक दृढ़ता की जरूरत होती है. दांडी कांवड़ के नियम स्थानीय परंपरा के अनुसार बदल सकते हैं. इसलिए इस प्रकार की यात्रा शुरू करने से पहले अनुभवी व्यक्ति या धार्मिक गुरु से जानकारी लेना उचित है.

कई राज्यों में है कांवड़ यात्रा का महत्व

कांवड़ यात्रा मुख्य रूप से उत्तर भारत के राज्यों में बहुत लोकप्रिय है, लेकिन देश के अन्य हिस्सों में भी इसके अलगअलग रूप देखने को मिलते हैं. प्रमुख राज्य जहाँ कांवड़ यात्रा धूमधाम से निकलती है, वे निम्न हैं.

  • उत्तराखंड: उत्तराखंड कांवड़ यात्रा का मुख्य केंद्र है. यहीं स्थित हरिद्वार, ऋषिकेश और गोमुख से देश भर के कांवड़िए गंगाजल भरते हैं. सावन के महीने में हरिद्वार की रौनक देखने लायक होती है.
  • उत्तर प्रदेश: उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रा का सबसे विशाल रूप देखने को मिलता है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लाखों श्रद्धालु हरिद्वार जाते हैं. वाराणसी के लिए भी बड़ी संख्या में कांवड़िए सुल्तानगंज से जल लेकर आते हैं.
  • हरियाणा: हरियाणा के लगभग हर जिले से श्रद्धालु हरिद्वार जाते हैं. यहां के कांवड़िए अनुशासन और लंबी पैदल यात्रा के लिए जाने जाते हैं. कुरुक्षेत्र और अन्य धार्मिक स्थलों से भी छोटी यात्राएं निकलती हैं.

    कांवड़ यात्रा.

  • दिल्ली: राजधानी दिल्ली कांवड़ यात्रा का एक प्रमुख मार्ग भी है और केंद्र भी. यहां के हजारों श्रद्धालु हरिद्वार जाते हैं. सावन में दिल्ली की सीमाओं पर कांवड़ियों के लिए विशेष शिविर लगाए जाते हैं.
  • राजस्थान: राजस्थान के पूर्वी हिस्सों अलवर, भरतपुर आदि से बड़ी संख्या में लोग गंगाजल लेने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जाते हैं. यहाँ से कांवड़िए अपने स्थानीय शिव मंदिरों और जयपुर के प्रसिद्ध मंदिरों तक जल लाते हैं.
  • बिहार और झारखंड: यहां की कांवड़ यात्रा को बोल बम यात्रा के नाम से जाना जाता है. यह विश्व की सबसे लंबी पैदल धार्मिक यात्राओं में से एक है. श्रद्धालु बिहार के भागलपुर जिले के सुल्तानगंज से गंगाजल भरते हैं और लगभग 105 किलोमीटर पैदल चलकर झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में जल अर्पित करते हैं.
  • मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश में भी कांवड़ यात्रा का काफी प्रचलन है. यहाँ उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर और खंडवा के ओंकारेश्वर मंदिर के लिए श्रद्धालु नर्मदा नदी का जल लेकर यात्रा करते हैं.
  • पंजाब और हिमाचल प्रदेश: पंजाब के हिंदू बहुल क्षेत्रों और हिमाचल प्रदेश के निचले इलाकों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु हरिद्वार और नीलकंठ महादेव के लिए कांवड़ उठाते हैं.
  • अन्य राज्य: छत्तीसगढ़, ओडिशा और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में भी स्थानीय स्तर पर नदियों का जल भरकर शिव मंदिरों तक ले जाने की परंपरा है.

क्या हैं कांवड़ यात्रा के सामान्य नियम?

  • पवित्रता का पालन: कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालु साफसफाई का ध्यान रखते हैं. वे स्नान करके यात्रा शुरू करते हैं. गंगाजल के कलश को स्वच्छ कपड़े से ढककर रखा जाता है. कांवड़ को गंदे स्थान पर नहीं रखा जाता. उसके पास जूतेचप्पल रखने से भी लोग बचते हैं.
  • नशे से दूरी: कांवड़ यात्रा में शराब, तंबाकू, गुटखा और अन्य नशीले पदार्थों से दूर रहना अनिवार्य माना गया है.
  • खानपान में संयम: कई कांवड़िए यात्रा के दौरान सात्विक भोजन करते हैं. वे मांसाहार, अंडा और नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करते. कुछ लोग प्याज और लहसुन से भी परहेज करते हैं.
  • ब्रह्मचर्य और अनुशासन: कई कांवड़िए यात्रा के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं. वे क्रोध, झूठ और अपशब्दों से बचने का प्रयास करते हैं. कांवड़ यात्रा केवल पैदल चलने का नाम नहीं है. यह आत्मसंयम और भक्ति की यात्रा भी है.

सरल शब्दों में कहें तो कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को धार्मिक नियमों के साथ सामाजिक जिम्मेदारियों का भी पालन करना होता है. दूसरों को परेशानी न हो. यातायात बाधित न हो. पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे. यही सच्ची भक्ति और जिम्मेदार कांवड़ यात्रा है.

Dailyhunt
Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Himachali Khabar Hindi