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भूजल संचयन, पुनर्भरण एवं प्रबंधन

सारांश

जल प्रकृति के द्वारा प्रदान किया गया एक सुंदर एवं बहुमुल्य उपहार है। पानी के बिना किसी भी गृह पर जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। सर्वविदित है कि पुरे ब्रम्हांड में पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा गृह है जहाँ पर जीवन और पानी दोनों विद्यमान हैं। इसलिए हमें अपने जीवन में जल के महत्व को समझना चाहिए और जल को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करने चाहिए। आज स्वच्छ जल की उपलब्धता सबसे बड़ी समस्या बन कर विश्व के सामने खड़ी है। पानी का संकट अनुमानों की सीमा को तोड़ते हुए दिन प्रतिदिन विकराल रुप लेता जा रहा है जिसके कारण देश के कई क्षेत्रों में जीवन यापन करना भी बहुत कठिन हो गया है। यह प्रकृति प्रदत्त समस्या नहीं है, अपितु यह मानव क्रियाओं द्वारा उत्पन्न हुआ संकट है। पिछले दो दशकों में, भारत के बहुत से भागों में अत्यधिक मात्रा में भूजल निकालने से जल स्तर बड़ी तेजी के साथ गिरा है। भूमिगत जल स्तर में गिरावट का विपरीत प्रभाव प्राकृतिक संपदा, पर्यावरण पेयजल की उपलब्धता, कृषि क्षेत्र, औद्योगिक क्षेत्र आदि पर सीधे तौर पर पड़ रहा हैं।

वैश्विक जल संकट विशेषज्ञ एवं काउंसिल ऑफ कनाडा की सदस्य माउधी बारलो ने अपनी पुस्तक ब्लूकविनन्ट (नीला प्रतिज्ञापत्र) में लिखा है। 20वीं शताब्दी में वैश्विक जनसंख्या तीन गुनी हो गई लेकिन पानी का उपयोग सात गुना बढ़ गया। सन् 2050 तक हमारी जनसंख्या में 3 अरब जनसँख्या और जुड़ जाएगी। जिसके लिया जल आपूर्ति में 80 प्रतिशत वृद्धि की आवश्यकता होगी। कोई नहीं जानता कि यह पानी कहां से आएगा। शुद्ध पानी की माँग तेजी से बढ़ रही है, परंतु इसके स्रोत न केवल सीमित हैं बल्कि घटते जा रहे हैं।

आज दुनिया में उपलब्ध जल स्रोतों से प्राप्त जानकारी के अनुसार पृथ्वी पर विद्यमान जल में से लगभग 97.2% जल खारे पानी के रुप में समुद्रों में है और शेष 2.8% मीठा जल पृथ्वी पर अन्य स्रोतों के रुप में उपलब्ध है। पृथ्वी पर विद्यमान शुद्ध जल में से 68.7% जल बर्फ के रुप में हिमनदों एवं हिमखंडों पर, 30.1% जल पृथ्वी के भीतर भूमिगत जल के रुप में, 0.3% जल सतही जल के रुप में और 0.9% जल अन्य रुपो में पृथ्वी पर विद्यमान है। सतह पर उपलब्ध जल का 87% जल झीलों, तालाबों आदि में, 11% मृदा नमी, आद्रता आदि के रुप में और शेष 2% जल नदियों में विद्यमान है।

Abstract

Water is a beautiful and precious gift provided by nature. Life cannot be imagined on any planet without water. It is believed that the Earth is the only planet in the entire universe where both life and water exist. We must understand the importance of water in our lives and make every possible efforts for properly use and save water. But due to our short-sightedness, availability of clean water has become the biggest problem facing the world today. In the last few decades, the water level has dropped drastically due to excessive amount of groundwater extraction in most parts of India. According to estimates made regarding water management, many parts of the country will be in the grip of water scarcity for the next decade. This water shortage will create food crisis in the country, make it difficult for industries to run, increase unemployment, migration and mutual conflict which will adversely affect the economy of the country.

To deal with this problem, along with water management, special attention should also be taken to water harvesting and ground water recharge. Depending on the region, natural or artificial techniques can be adopted for water harvesting and ground water recharge. Techniques such as check dams or nala dams, channel speeding techniques, percolation tanks, spreading basin techniques and recharge wells are the very popular techniques for ground water recharge. In agriculture, residential and industrial sectors are required special attention for water management where most of water used of our water sources. Although many efforts are being made to solve this problem by Indian government with the cooperation of non-government organizations and local bodies of the area, in many areas, positive results have been achieved, but in the fields of water harvesting, ground water recharge and water management require to work on high level priority.

1. भूमिगत जल संचयन

भारत में जल संचयन और प्रबन्धन का इतिहास सदियों पुराना है जिसके प्रमाण सर्वप्रथम सिंधु घाटी में पाए गए थे। तब से आज तक देश के विभिन्न क्षेत्रो में आवश्यकता के अनुरूप जल संचयन और प्रबन्धन को अपनाया जाता रहा है, जैसे राजस्थान में खड़ीन, कुंड और नाडी, महाराष्ट्र में बन्धारा और ताल, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में बन्धी, बिहार में आहर और पइन, हिमाचल में कुहल, तमिलनाडु में एरी, केरल में सुरंगम, जम्मू क्षेत्र के कांडी इलाके के पोखर, कर्नाटक में कट्टा पानी को सहेजने और एक जगह से दूसरी जगह प्रवाहित करने के कुछ अति प्राचीन साधन थे, जो आज भी प्रचलन में हैं। इन पारम्परिक व्यवस्थाओं से जहाँ एक ओर जल कि तात्कालिक जरुरतो की पुर्ती होती है, वहीं दुसरी ओर भूमिगत जल पुनर्भरण में भी सहायता मिलती है, जिससे भूमिगत जल के दोहन एवं भूमिगत जल पुनर्भरण के बीच संतुलन बनाये रखने में विशेष मद्द मिलती हैं।

पारम्परिक व्यवस्थाएँ उस क्षेत्र की पारिस्थितिकी और संस्कृति की विशिष्ट देन होती है, जिनमें उनका विकास उस क्षेत्र की आवश्यक्ताओं के अनुसार होता है। ये परंपरागत व्यवस्थाएँ न केवल काल की कसौटी पर खरी उतरी हैं, बल्कि उन्होंने स्थानीय जरूरतों को भी पर्यावरण में तालमेल रखते हुए पूरा किया है। आधुनिक व्यवस्थाएँ जहाँ पर्यावरण का दोहन करती हैं, इसके विपरीत यह प्राचीन व्यवस्थाएँ पारिस्थितिकीय संरक्षण पर जोर देती है। भूमिगत जल के पुनर्भरण की आसान, उपयोगी और सस्ती तकनीको से देश के किसान अंजान नहीं हैं बल्कि उन्हें प्रोत्साहन की जरूरत है। किसानो को बताया जाए कि जहाँ पानी बरसकर भूमि पर गिरे उसे यथासंभव वहीं रोका जाए। ढाल के विपरीत जुताई तथा खेतों की मेड़बंदी से पानी रुकता है। खेतों के किनारे फलदार वृक्ष लगाना चाहिए। छोटे-बड़े सभी कृषि क्षेत्रों पर क्षेत्रफल के हिसाब से तालाब बनाना जरूरी है। ग्राम स्तर पर बड़े तालाबों का निर्माण गाँव के लिये जल उपलब्ध कराता है, साथ ही भू-गर्भ जलस्तर को बढ़ाता है। देश की मानसूनी वर्षा का लगभग 75 फीसदी जल भूमि जल के पुनर्भरण के लिये उपलब्ध है, देश के विभिन्न पारिस्थितिकीय क्षेत्रों के अनुसार लगभग 3 करोड़ हेक्टेयर मीटर जल का संग्रहण किया जा सकता है। रासायनिक खेती के बजाय जैविक खेती अपनाकर कृषि में जल का अपव्यय रोका जा सकता है।

2. भूमिगत जल पुनर्भरण

पृथ्वी पर विद्यमान पानी का निरंतर वाष्पीकरण होता रहता है और यही पानी वर्षा जल के रुप में पुनः धरती पर बरसता है। इस पूरे घटनाक्रम को जल चक्र के रुप में जानते हैं। वर्षा के रुप में पृथ्वी पर गिरने वाला पानी कई माध्यमों से मिट्टी में समाहित होकर भूमिगत जल स्तर तक पहुँचता है और भूजल स्तर की मात्रा में वृद्धि करता हैं। इसी घटना को हम भूजल पुनर्भरण कहते हैं। भूजल पुनर्भरण को हम दो रुपो में विभक्त कर सकते हैं।

(2.1) प्राकृतिक भूजल पुनर्भरण

वर्षा जल एकमात्र स्रोत है जो पृथ्वी पर जल की उपलब्धता, मृदा नमी, भूमिगत जल पुनर्भरण आदि के लिए प्रमुख स्रोत हैं। वर्षा जल ही अन्य स्रोतों जैसे नदियाँ, धाराएँ, जलासय, झील एवं कृषि सिंचाई के माध्यम से भूमिगत जल एवं मृदा नमी में प्राकृतिक रुप से वृद्धि होती रहती हैं। वर्षा जल पहाडि़यो, नालियों, झरनों आदि से माध्यम से बहते हुए नदियों तक पहुँचता है और यह जल बहते हुए सतही मिट्टी की पारगम्यता के अनुसार प्राकृतिक रूप उसमें समाहित होता रहता है और भूमिगत जल स्तर में वृद्धि करता है। जिन चट्टानों में भूजल जमा होता है, उन्हें जलभृत (एक्विफर) कहा जाता है। सामान्य तौर पर, जलभृत बजरी, रेत, बलुआ पत्थर या चूना पत्थर से बने होते हैं। इन चट्टानों से पानी नीचे की और रिसता जाता है क्योंकि चट्टानों के बीच में ऐसी परस्पर जुड़ी हुई जगहें होती हैं, जो चट्टानों को पारगम्य बना देती हैं। जलभृतों में जिन जगहों पर पानी भर जाता है, वे संतृप्त जोन कहलाते हैं। सतह से जिस गहराई पर पानी मिलता है, वह उस क्षेत्र का जल स्तर (वॉटर टेबल) कहलाता है।

(2.2) कृत्रिम भूजल पुनर्भरण

वर्षा जल प्राकृतिक रुप से मिट्टी के अंदर समाहित होकर भूमिगत जल स्तर तक पहुँच कर उसे पुनर्भरित करता है, लेकिन समय के साथ पानी की बढ़ती माँग के कारण भूमिगत जल का दोहन बढ़ता गया, जिसके कारण भूमिगत जल स्तर और पुनर्भरण स्तर के बीच का फासला बढ़ने लगा। इस समस्या के समाधान के रुप में कृत्रिम पुनर्भरण तकनीक को अपनाकर भूमिगत जल स्तर और पुनर्भरण स्तर के अंतर को कम किया अथवा पुरी तरह से समाप्त किया जा सकता है। कृत्रिम पुनर्भरण तकनीको को अपनाकर देश के कई क्षैत्रो के भूजल स्तर में आवश्यक्ता के अनुरुप वृद्धि हुई एवं जिसके सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुए। कृत्रिम भूजल पुनर्भरण तकनीको का चयन क्षेत्र कि भौगोलिक स्थिती, क्षेत्र में वर्षा जल की उपलब्धता एवं उपलब्ध संसाधनों के आधार पर किया जाता है। सामान्यतः कृत्रिम भूजल पुनर्भरण तकनीको में से कुछ प्रमुख तकनीक इस प्रकार है।

(क) छोटे बाँध या नाला बाँध

यह केवल वाहिका में जल भण्डारण ही नहीं बल्कि भूमि जल पुनर्भरण को बढ़ाता हैं। इस प्रकार की संरचनाओं के निर्माण के लिए तकनीकी एवं भूवैज्ञानिक तैयारियों की अधिक आवश्यक्ता नहीं हैं, और यह तकनीक आर्थिक दृष्टि से काफी फायदेमंद होती है। इन बाँधों के निर्माण के लिए बड़े भूभाग की भी आवश्यक्ता नहीं होती है। इस प्रकार की संरचनाएँ छोटी नदियों एवं नालों के लिये काफी उपयोगी साबित हो रही है।

(ख) वाहिका फैलाव तकनीक

इस विधि में वाहिका में अंग्रेजी अक्षर स् के आकार के अवरोधों का निर्माण किया जाता है जिससे कि पानी का बहाव अधिक लम्बा रास्ता तय करें। इससे भूमिगत जल स्तर में सुधार होता हैं। यह पद्धति ऐसे स्थानो पर बहुत उपयोगी है जहाँ एक छोटी वाहिका किसी घाटी के माध्यम से बहती है, लेकिन यह पद्धति नदियों एवं जहाँ तेज बहाव या बाढ़ हो वहाँ उपयोगी नहीं होती है, क्योंकि ऐसे स्थानो पर वाहिका के अवरोधों के टूटने का खतरा होता है।

(ग) अंतःस्त्रवण कुण्ड तकनीक

यह पद्धति जलोढ़ एवं कठोर चट्टानीय संरचनाओं के क्षेत्रों में जलाशयी भूजल पुनर्भरण के लिए हमारे देश में सबसे प्रचलित पुनर्भरण तकनीक है। जहाँ चट्टानें अधिक खंडित और आद्रता युक्त होती है वहाँ इस तकनीक की प्रभावोत्पादकता और व्यवहार्यता बहुत अधिक होती हैं। यह पुनर्भरण विधि महाराष्ट्र के सतपुड़ा की पहाडि़यों पर भी जल पुनर्भरण में बहुत कारगर साबित हुई हैं।

(घ) कुओं एवं कुण्डों का पुनर्भरण संरचना के रुप में संशोधन

क्षेत्र में पहले से विद्यमान कुओं एवं कुण्डों का, जो किसी कारणवश उपयोगी नहीं रहे हैं, पुनर्भरण संरचना के रुप में संशोधित किया जा सकता है। क्षेत्र के कुओं और टैंकों की सफाई करने के उपरांत अपशिष्ट जल को इन कुओं तक पहुँचा कर इन्हे पुनर्भरण संरचना के रुप में उपयोग किया जा सकता हैं। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र औत कर्नाटक आदि राज्यों में इस प्रकार की संरचनाओं का निर्माण कुशलता पूर्वक किया गया हैं।

(ङ) कुओं एवं हाथ पंपों का पुनर्भरण

इस पद्धति में पहले से ऐसे खुदे हुए कुएँ जो या तो सुख गये हैं या उनके जल के स्तर में काफी गिरावट आई है, उनका इस्तेमाल भूजल पुनर्भरण जलाशय की संरचना के रुप में किया जा सकता हैं। वाहिकाओं, नालियों एवं अन्य स्रोतों से आने वाले वर्षा जल को शुष्क जलवाही स्तर के पुनर्भरण के लिए सीधे इन संरचनाओं में पहुँचाया जा सकता हैं। शहरी एवं ग्रामीण इलाकों में छतों पर इकत्त होने वाले जल को संरक्षित कर इस तकनीक में पुनर्भरण के लिए उपयोग किया जा सकता हैं।

(च) पुनर्भरण शैफ़्ट

यह पद्धति जलवाही स्तर के सीधे पुनर्भरण के लिए बहुत उपयोगी है एवं यह आर्थिक दृष्टि से भी काफी फायदेमंद संरचना हैं। इन संरचनाओं का निर्माण उन सभी क्षेत्रों में किया जा सकता है जहाँ जल स्रोतों से जल निरंतर उपलब्ध होता है या कुछ समय के लिए उपलब्ध रहता हैं। इन पुनर्भरण संरचनाओं का निर्माण दो विभिन्न तकनीकों से किया जा सकता है।

(ट) ऊध्र्वाधर पुनर्भरण शैफ़्ट

(ठ) पाश्र्व पुनर्भरण शैफ़्ट

(छ) प्रेरित पुनर्भरण

कृत्रिम पुनर्भरण की यह एक अप्रत्यक्ष विधि है जिसमें जलवाही स्तर में पंपन एवं भूजल जलाशय के प्रेरित पुनर्भरण के साथ द्रवचालकीय संबन्ध शामिल हैं। जब अवसाद नदी अथवा अन्य संरचनाओं की पुनर्भरण सीमाओं को अवरोधित करता है, तब सतह के स्रोत से जलवाही स्तर तक एक द्रवचालकीय संबंध स्थापित किया जाता है जिससे भूजल पुनर्भरण के लिए जल का पंपन होना प्रारंभ हो जाता है। इस प्रकार की विधियों में भूमिगत जल भण्डारण वास्तविक रुप से कृत्रिम निर्माण नहीं है, परंतु एक जलवाही स्तर के द्वारा पंपन से सतही जल का विचरण होता है।

(ज) विस्तारित बेसिन द्वारा

इस पद्धति में कृत्रिम भूजल पुनर्भर के उपयुक्त क्षेत्र को चुनकर वहाँ जमीन पर एक बड़ा हौज बनाकर उसमें मुख्य धारा या अन्य जल स्र¨त से पानी को भर दिया जाता है। मुख्य होज में इकत्त किये गए पानी को पुनर्भर बेसिन में आवश्यकता के अनुसार पुनर्भर संरचना निर्माण कर उसमे पंहुचा दिया जाता है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर इसे मौजूदा भू-भाग में खुदाई कर प्राप्त किया जा सके। यह तकनीक अच्छी गुणवत्ता वाले मृदा क्षेत्र में कृत्रिम पुनःभरण करने के लिये बहुत ही उपयोगी एवं प्रभावी तकनीक है। अच्छी गुणवत्ता वाले मृदा क्षेत्र में पानी का मिटटी परतों में अच्छी तरह रख-रखाव किया जा सकता है।

3. भूमिगत जल प्रबंधन

समय के साथ जल कि बढ़ती मांग को पूरा करने के लिये भूमिगत जल पर निर्भरता बढ़ने एवं इसके अंधाधुंध दोहन से भूमिगत जल स्तर में कमी और भूमिगत जल पुनर्भरण के बीच का अंतर बढ़ने लगा। भूमिगत जल के दोहन और भूमिगत जल पुनर्भरण के बीच संतुलन बनाये रखने के लिय भूमिगत जल के दोहन और पुनर्भरण के उचित प्रबंधन की आवश्यक्ता है।

हमारे देश में जल संसाधनों के प्रबंधन का इतिहास बहुत पुराना है। प्राचीन काल से ही भारतीय भागीरथों ने सभ्यता और संस्कृति के विकास के साथ-साथ भारत की जलवायु, मिट्टी की प्रकृति और अन्य विविधताओं को ध्यान में रखकर बरसाती पानी, नदी-नालों, झरनों और जमीन के नीचे मिलने वाले, भूजल संसाधनों के विकास और प्रबंधन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति कर ली थी। जल प्रबंधन का पहला प्रमाण सिंधु घाटी में खुदाई के दौरान मिला। धौरावीरा में अनेक जलाशयों के प्रमाण भी मिले हैं। इस क्षेत्र में बाढ़ के पानी की निकासी की बहुत ही अच्छी व्यवस्था की गई थी। इसी प्रकार कुएँ बनाने की कला का विकास भी हड़प्पा काल में हुआ था।

(3.1) कृषि क्षेत्र में जल प्रबंधन

जल प्रबंधन की शुरुआत कृषि क्षेत्र से करनी चाहिए क्योंकि सर्वाधिक मात्रा में कृषि कार्यों में ही जल का उपयोग किया जाता है तथा सिंचाई में जल का उचित इस्तेमाल बहुत आवश्यक है। जनमानस में धारणा है कि अधिक पानी अधिक उपज, जो कि गलत है। फसलों के उत्पादन में सिंचाई का योगदान 15-16 प्रतिशत होता है। फसल के लिये भरपूर पानी का मतलब मात्र मिट्टी में पर्याप्त नमी ही होती है। परंतु वर्तमान कृषि पद्धति में सिंचाई का अंधाधुंध इस्तेमाल किया जा रहा है। धरती के गर्भ से पानी की आखिरी बूँद भी खींचने की कवायत की जा रही है। बूँद-बूँद सिंचाई, बौछार (फव्वारा) तकनीक तथा खेतों के समतलीकरण से सिंचाई में जल का दुरुपयोग रोका जा सकता है। फसलों को जीवन रक्षक या पूरक सिंचाई देकर उपज को दोगुना किया जा सकता है। पानी लगाते समय या सिंचाई करते समय यह ध्यान रहे कि सिंचाई पौधे या पौध में की जा रही है न कि भूमि में । इसमें सिंचाई की विकसित सूक्ष्म सिंचाई विधियाँ उपयोग में लाई जा सकती हैं। लगभग तीन दशकों में सिंचाई की सूक्ष्म प्रणाली से फसलोत्पादन करने की प्रक्रिया में ऐसा पाया गया है कि औसतन अन्य पारंपरिक सिंचाई विधियों की तुलना में इसके द्वारा अपेक्षाकृत 50 से 60 प्रतिशत जल की मात्रा में बचत की जा सकती है। खेतो में सिंचाई करने के लिये आधुनिक तकनिको का उपयोग एवं जल का उचित प्रबंधन कर उत्पादन को भी बढ़ाया जा सकता हैं। परंपरगत सिंचाई तकनिकों के स्थान पर आवश्यकता के अनुरुप कुछ सामान्य बदलाव के साथ आधुनिक सिंचाई पद्वतियों का उपयोग कर सिंचाई क्षेत्र बढ़ाने के साथ-साथ उत्पादन को भी बढ़ाया जा सकता हैं। आधुनिक सिंचाई पध्दतियों में से कुछ प्रमुख इस प्रकार है।

(क) बौछारी (स्प्रिंकलर) सिंचाई तकनीक

बौछारी या स्प्रिंकलर विधि से सिंचाई में पानी को छिड़काव के रूप में दिया जाता है। जिससे पानी पौधों पर वर्षा की बूंदों जैसी पड़ती हैं। पानी की बचत और उत्पादन की अधिक पैदावार के लिहाज से बौछारी सिंचाई प्रणाली अति उपयोगी और वैज्ञानिक तरीका मानी गई है। किसानों में सूक्ष्म सिंचाई के प्रति काफी उत्साह देखी गई है। इस सिंचाई तकनीक से कई फायदे हैं।

(ख) टपक (ड्रिप) सिंचाई प्रणाली

ड्रिप प्रणाली सिंचाई की उन्नत विधि है, जिसके प्रयोग से सिंचाई जल की पर्याप्त बचत की जा सकती है। यह विधि मृदा के प्रकार, खेत के ढाल, जल के स्त्रोत और किसान की दक्षता के अनुसार अधिकतर फसलों के लिए अपनाई जा सकती हैं। ड्रिप विधि की सिंचाई दक्षता लगभग 80-90 प्रतिशत होती है। फसलों की पैदावार बढ़ने के साथ-साथ इस विधि से उपज की उच्च गुणवत्ता, रसायन एवं उर्वरकों का दक्ष उपयोग, जल के विक्षालन एवं अप्रवाह में कमी, खरपतवारों में कमी और जल की बचत सुनिश्चित की जा सकती है।

(3.2) आवासीय क्षेत्रो में जल प्रबंधन

देश में जनसंख्या में वृद्धि के साथ साफ पानी की मांग भी बढ़ती जा रही है और इस आवश्यक्ता को पुरा करना एक बहुत बढ़ी समस्या है। वर्तमान में पानी की समस्या शहरी क्षेत्रो में ही नहीं बल्की ग्रामीण क्षेत्रो मे भी विकराल रुप लेती जा रही है। इस समस्या से निपटने के लिये सरकारी एवं गैरसरकारी संस्थाओं द्वारा बहुत से कार्य किये जा रहे है, लेकिन ये नाकाफी साबीत हो रहे है। इस समस्या के प्रति जनमानस को जल को मितव्ययता के साथ उपयोग करने के लिये जाग्रत करने की आवश्यक्ता है। सभी लोगो को रोजमर्रा के जीवन में पानी का उपयोग करते समय पानी की बचत से सम्बंधित कुछ सामन्य सी बातो का ध्यान रखे तो पानी की समस्या से निपटने में बहुत बड़ी सहायता मिल सकती हैं। आवासीय क्षेत्रो में जल प्रबंधन के लिये आवश्यक रुप से अपनाये जाने योग्य कुछ साधरण उपाय इस प्रकार है।

(1) घरो, कॉलोनियों अथवा किसी भी प्रकार के रहवासी भवनों के निर्माण करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चहिये कि रहवासी परिसर में वर्षा जल के संचयन का प्रावधान किया गया है।

(2) रहवासी परिसरो में लोगो के द्वारा उपयोग किये गये पानी को व्यवस्थित तरीके से इकत्त कर पेड़-पौधों, बगीचों आदि में पुन(कोलन) उपयोग किया जा सकता है, आज कल यह तकनीकी देश में कई रहवासी कॉलोनियों में अपनाई जा रही है।

(3) शहरी परिदृश्य में होटलों तथा आवासीय स्थानों में अपशिष्ट जल को साफ कर पुनः प्रयोग एवं भूमिगत पुनर्भरण के लिये भी प्रयोग किया जाना चाहिये।

(4) जनमानस को जल की उपयोगिता एवं इसकी बढ़ती समस्या के लिए जागृत करना एवं जल को मितव्ययता के साथ उपयोग करने के लिये प्रेरित करने की आवश्यक्ता है।

(3.3) औद्योगिक क्षेत्र में जल प्रबंधन

आधुनिक युग में उद्योगों का विस्तार किसी भी राष्ट्र के विकास के लिये बहुत आवश्यक है। उद्योगों के समुचित विस्तार एवं विकास से किसी भी राष्ट्र की राष्ट्रीय ही नहीं अपितु अंतराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक स्थिती में मजबूती आती है और सामजिक स्तर पर लोगो को बड़े पैमाने पर रोजगार मिलता है, जिससे उनके जीवन स्तर में सुधार आता हैं। अधिकांश उद्योगों में बहुत अधिक मात्रा में पानी कि आवश्यक्ता होती है इसलिये आधुनिकीकरण के युग में अधिकांश उद्योग जल की उपलब्धता के कारण नदियों, झीलों एवं सागरों के किनारे लगाए जाते हैं। उद्योगो मे बहुत बड़ी मात्रा में पानी का उपयोग होना बड़ी समस्या नहीं है अपितु इन उद्योगो से विभिन्न रसायनो से युक्त प्रदूषित जल का शोधन किये बिना विसर्जित करना बहुत बड़ी समस्या है। आज देश के कई भागो में उद्योगो के द्वारा उपयोग किये जा रहे जल के मुकाबले कई गुना ज्यादा पानी इनसे विसर्जित किये जा रहे प्रदूषित जल के कारण बर्बाद हो रहा है। देश के कई क्षेत्रो में साफ पानी के स्रोत प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, लेकिन उद्योगो के द्वारा विसर्जित किये जा रहे प्रदूषित जल के कारण इन स्रोतो का पानी उपयोग करने के लायक नहीं रहा जिसके कारण इन क्षेत्रों में भी जल संकट पैदा हो गया है। सरकारी एवं गैरसरकारी स्तर पर संस्थाओं द्वारा इन क्षेत्रो के जल स्रोतो को साफ करने एवं उपयोग करने लायक बनाने के लिये भरसक प्रायस किये जा रहे है, जिसके बहुत ही सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुए है, लेकिन इस क्षेत्र में अभी जल प्रबंधन के लिये बहुत कार्य करने की आवश्यक्ता हैं।

4. निष्कर्ष

इस समस्या से निपटने के लिए जल प्रबंधन के साथ-साथ भूजल संचयन एवं पुनर्भरण पर भी विशेष ध्यान देने कि आवश्यकता है। भूजल संचयन एवं पुनर्भरण के लिए क्षेत्र के अनुरूप प्राकृतिक अथवा कृत्रिम तकनीकों को अपनाया जा सकता है। कृषी क्षेत्र, आवासीय क्षेत्र एवं औधोगिक क्षेत्र में भी जल प्रबंधन के लिए विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है जहाँ हमारे जल स्रोतों का सबसे अधिक दोहन किया जाता है। भूजल संचयन एवं प्रबंधन के लिए क्षेत्रानुसार छोटे बाँध या नाला बाँध, कुओं, कुण्डों एवं हाथ पंपों का पुनर्भरण, वाहिका फैलाव, अंतःस्त्रवण कुण्ड आदि तकनीको को अपना कर समस्या के निवारण की कोशिस की जानी चाहिये। वैसे भूजल संचयन एवं प्रबंधन के लिए काफी प्रयास किये जा रहे है, हाल ही ही में भारत सरकार ने इस समस्या के हल के लिए जल शक्ति अभियान के नाम से हर गाँव हर घर में सन 2024 तक जल पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। इस अभियान के अंतर्गत देश के अतिप्रभावित जिलों का चयन कर क्षेत्रीय, राज्य एवं केंद्रीय अधिकारियों एवं वैज्ञानिकों साथ लेकर कार्य शुरू किया गया है। वैसे पहले से ही इस समस्या के हल के लिए सरकारी एवं गैरसरकारी संगठनो व क्षेत्र के मूल निवासियों के सहयोग से कई तरह के प्रयास किये जा रहे है, और बहुत से इलाकों में इसके सकारात्मक परिणाम भी प्राप्त हुए है, लेकिन अभी भूजल संचयन, पुनर्भरण एवं प्रबंधन के क्षेत्र में युद्ध स्तर पर कार्य करने की आवश्यक्ता हैं।

Reference

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