*छह दशक बाद गोरखपुर में सुविख्यात निर्देशक जॉय मैसनाम मिताई ने: "अंधा युग“नाटक एथिक्स का रोमांचकारी आख्यान प्रस्तुत*
-नाटक अंधा युग“युद्द और विनाश, करुणा और मानवता, हिंसा और एथिक्स का रोमांचकारी आख्यान
गोरखपुर।नाटक की रचना के सात दशक और इसके प्रथम मंचन से छह दशक बाद गोरखपुर में सुविख्यात निर्देशक जॉय मैसनाम मिताई ने ”अंधा युग“ नाटक को अभियान थिएटर ग्रुप द्वारा भारतेंदु नाट्य अकादमी लखनऊ, उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र प्रयागराज और ड्रामा टाकीज मुंबई के सौजन्य से नेशनल थियेटर फेस्टिवल रंग महोत्सव 2023 के तीसरे दिन दर्शको से खचाखच भरे बाबा योगी गंभीर नाथ प्रेक्षागृह के मंच पर प्रस्तुत किया।
-नाटक अंधा युग“युद्द और विनाश, करुणा और मानवता, हिंसा और एथिक्स का रोमांचकारी आख्यान
गोरखपुर।नाटक की रचना के सात दशक और इसके प्रथम मंचन से छह दशक बाद गोरखपुर में सुविख्यात निर्देशक जॉय मैसनाम मिताई ने ”अंधा युग“ नाटक को अभियान थिएटर ग्रुप द्वारा भारतेंदु नाट्य अकादमी लखनऊ, उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र प्रयागराज और ड्रामा टाकीज मुंबई के सौजन्य से नेशनल थियेटर फेस्टिवल रंग महोत्सव 2023 के तीसरे दिन दर्शको से खचाखच भरे बाबा योगी गंभीर नाथ प्रेक्षागृह के मंच पर प्रस्तुत किया।
सायको फिजिकल स्टाइल का नाटक ”अंधा युग“ युद्द और विनाश, करुणा और मानवता, हिंसा और एथिक्स का रोमांचकारी आख्यान प्रस्तुत किया। हिंदी के प्रसिद्द लेखक धर्मवीर भारती द्वारा लिखित नाटक अंधा युग की एनएसडी तथा लन्दन स्कूल ऑफ परफार्मिंग आर्ट्स, लन्दन द्वारा प्रशिक्षित सुविख्यात निर्देशक जॉय मैसनाम मिताई के निर्देशन में हुई बेजोड़ प्रस्तुति से ट्रेजर आर्ट एसोसिएशन नई दिल्ली के कलाकार आज गोरखपुरवासियो के दिल में उतर गए।
नाटक ”अंधा युग“ महाभारत युद्ध के आखिरी दिन पर केन्द्रित है जहां युद्ध की निरर्थता के साथ-साथ प्रतिहिंसा अपने पूरे उभार में है। अश्वत्थामा इसी प्रति हिंसा में अपने क्रूरतम रूप में आता है तो गांधारी कृष्ण को मृत्यु का अभिशाप दे देती है। न्याय-अन्याय, आस्था-अनास्था, सत्ता और लोभ का अंधापन ही अंधायुग है। धृतराष्ट्र दृष्टिहीन हैं तो उन्माद में दूसरे भी विवेक और दृष्टि खो बैठते हैं। एक आखिरी प्रतिशोध क्रिया की लालसा के लिए अश्वत्थामा ने आखिरी हथियार ब्रह्मास्त्र जो दुनिया को नष्ट करने के खतरे के साथ छोड़ दिया।
नाटक ”अंधा युग“ महाभारत युद्ध के आखिरी दिन पर केन्द्रित है जहां युद्ध की निरर्थता के साथ-साथ प्रतिहिंसा अपने पूरे उभार में है। अश्वत्थामा इसी प्रति हिंसा में अपने क्रूरतम रूप में आता है तो गांधारी कृष्ण को मृत्यु का अभिशाप दे देती है। न्याय-अन्याय, आस्था-अनास्था, सत्ता और लोभ का अंधापन ही अंधायुग है। धृतराष्ट्र दृष्टिहीन हैं तो उन्माद में दूसरे भी विवेक और दृष्टि खो बैठते हैं। एक आखिरी प्रतिशोध क्रिया की लालसा के लिए अश्वत्थामा ने आखिरी हथियार ब्रह्मास्त्र जो दुनिया को नष्ट करने के खतरे के साथ छोड़ दिया।
ऐसे गंभीर नाटक की प्रस्तुति निर्देशक के साथ ही कलाकारों के लिये बड़ी चुनौती होती है। बेहतर करने की संभावनाओं के साथ सभी कलाकारों ने अपने-अपने चरित्रों को इस नाटक में आज बखूबी निभाया।
नाटक एक क्षण के लिये भी दर्शकों को बोझिल न लगे, इसका भरपूर जतन निर्देशक जॉय मैसनाम मिताई ने किया और इसमें वे पूरी तरह कामयाब रहे। भव्यता लाइट, सेट, कास्ट्यिूम, प्राप्स आदि सब में थी जिसे दर्शकों ने भरपूर महसूस किया। दरससल अच्छा नाटक वही होता है जो जल्दी ही दर्शक को अपने से बांध ले। ’अंधा युग’ नाटक शुरू होते ही दर्शकों को बांध लेता है और आखिरी तक बांधे रखता है। यह इस नाटक की सबसे बड़ी खूबी थी और यही उसकी सफलता। अंधा युग नाटक की जीवंतता उसकी कथावस्तु के साथ के साथ उसकी काव्यमयी भाषा में समाहित है और कलाकारों ने अपनी संवाद अदायगी में उस काव्यात्मकता को बखूबी निभाया। नाटक ”अंधा युग“ में विभिन्न भूमिकाओं में साजिदा साजि, सैफ सिद्दीकी, साहिल, जॉय मैसनाम, मुहम्मद शाहनवाज़, मधुसूदन, कृत वर्मा, आदित्य, आशीष, अवनीश झा, रिया पनवर, रितु, आकांक्षा, गौरव, हरेराम, शैलेश, मुकुंद और सौरभ रहे जबकि मंच से परे कास्ट्यूम डिजाइन साजिदा, लाइट हिमांशु बी जोशी, साउंड लेट देबरती मजूमदार, सेट सज्जा प्रकाश सिंह प्रॉपर्टीज सूरज और अवनीश का रहा।
नाटक एक क्षण के लिये भी दर्शकों को बोझिल न लगे, इसका भरपूर जतन निर्देशक जॉय मैसनाम मिताई ने किया और इसमें वे पूरी तरह कामयाब रहे। भव्यता लाइट, सेट, कास्ट्यिूम, प्राप्स आदि सब में थी जिसे दर्शकों ने भरपूर महसूस किया। दरससल अच्छा नाटक वही होता है जो जल्दी ही दर्शक को अपने से बांध ले। ’अंधा युग’ नाटक शुरू होते ही दर्शकों को बांध लेता है और आखिरी तक बांधे रखता है। यह इस नाटक की सबसे बड़ी खूबी थी और यही उसकी सफलता। अंधा युग नाटक की जीवंतता उसकी कथावस्तु के साथ के साथ उसकी काव्यमयी भाषा में समाहित है और कलाकारों ने अपनी संवाद अदायगी में उस काव्यात्मकता को बखूबी निभाया। नाटक ”अंधा युग“ में विभिन्न भूमिकाओं में साजिदा साजि, सैफ सिद्दीकी, साहिल, जॉय मैसनाम, मुहम्मद शाहनवाज़, मधुसूदन, कृत वर्मा, आदित्य, आशीष, अवनीश झा, रिया पनवर, रितु, आकांक्षा, गौरव, हरेराम, शैलेश, मुकुंद और सौरभ रहे जबकि मंच से परे कास्ट्यूम डिजाइन साजिदा, लाइट हिमांशु बी जोशी, साउंड लेट देबरती मजूमदार, सेट सज्जा प्रकाश सिंह प्रॉपर्टीज सूरज और अवनीश का रहा।
*रंग महोत्सव के चौथे दिन होगा महाकवि सूर्य कांत निराला द्वारा रचित काव्य "राम की शक्ति पूजा"*
गोरखपुर।
रंग महोत्सव के चौथे दिन की प्रस्तुति के बारे में आयोजन समिति के मीडिया समन्वयक नवीन पांडे ने बताया कि रंग विमर्श के अंतर्गत शाम 6 बजे "नाटक में जीवन ; सम सामयिकता का दबाव और पारंपरिक शिल्प" विषय पर प्रसिद्ध रंग निर्देशक श्री व्योमेश शुक्ल से श्री राजशेखर त्रिपाठी की बातचीत होगी। श्री पाण्डेय ने बताया कि रंग विमर्श के फौरन बाद महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला द्वारा रचित काव्य "राम की शक्ति पूजा" की रंग प्रस्तुति रूप वाणी थिएटर ग्रुप वाराणसी के कलाकारों के द्वारा किया जाएगा जिसका निर्देशन प्रसिद्ध निर्देशक व्योमेश शुक्ल ने किया है। उन्होंने बताया कि दिन में दो बजे से प्रख्यात निर्देशकों से शहर के विभिन्न विद्यालयों के छात्र छात्र प्रशिक्षण भी प्राप्त कर रहे है।

