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कोरोना बनाम अस्पृश्यता

कोरोना बनाम अस्पृश्यता

डॉ. मोक्षराज

जीवन में शुद्धि व स्वच्छता अत्यंत आवश्यक है, यह सिद्धांत सर्वमान्य है। संसार के सभी महापुरुष एवं विभिन्न पवित्र ग्रंथ भी स्थान, शरीर, वाणी एवं मन की शुद्धि के लिए प्रेरणा देते रहे हैं। स्थान व शरीर की अपेक्षा वाणी एवं मन की पवित्रता को भी भारतीय साहित्य ने पर्याप्त महत्व दिया है, वेदों में 'यस्मिन्त्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः। तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यत:।' कहकर स्पष्ट कर दिया है कि समस्त प्राणियों में अपनी आत्मा के समान देखें एवं मोह व शोक से परे होकर एकत्व भाव में जीएँ। यही विचार युगों-युगों तक चलता रहा है।

यथायोग्य व्यवहार की थी वैदिक परंपरा

ऋग्वेदीय ऐतरेय ब्राह्मण के रचनाकार महर्षि महिदास इतरा नाम की शूद्रा के पुत्र थे, जिनके नाम पर ऐतरेय ब्राह्मण प्रसिद्ध हुआ।

इसी ब्राह्मणग्रंथ में जहाँ सृष्टि विद्या एवं सूर्यविद्या का विवेचन किया है, वहीं इसके एक आख्यान में उल्लिखित है कि- महर्षि विश्वामित्र ने स्वयं की सौ संतान होते हुए भी दूसरे कुल में उत्पन्न हुए निर्धन शुन:शेप को श्रेष्ठ संतान के रूप में स्वीकार कर विशेष प्रतिष्ठा दिलायी। रामायण में निषादराज गुह्य, केवट रघु, शबरी, वन में रहने से वानर कहलाने वाले महाबली सुग्रीव- हनुमान, गृद्धकूट के महामानव जटायु, तपस्वी साधक संपाति, आर्यपुत्र श्रीराम-लक्ष्मण, राक्षस कुल के विभीषण व त्रिजटा, मुनि वशिष्ठ, विश्वामित्र एवं भारद्वाज आदि अलग-अलग शारीरिक बौद्धिक और भावनात्मक क्षमता वाले सभी नर-नारियों के मैत्रीपूर्ण वर्णन हैं। महाभारत में देवकन्या मेनका, धीवर की पुत्री सत्यवती, नागकन्या उलोपी, असुर पुत्री हिडिंबा तथा प्रतिष्ठित राज्यों की राजकुमारियाँ रुक्मिणी, द्रौपदी, उत्तरा आदि भरतवंश की वधू हुईं तथा परिश्रमी दासी के पुत्र महात्मा विदुर एक महान नीतिज्ञ हुए।

मुगलों व अंग्रेजों ने भारत में घृणा का विष घोला

व्यापक स्तर पर शस्त्र त्याग, अशास्त्रीय अहिंसा तथा दुष्टों को क्षमादान देने जैसे निरर्थक अभियान ने भारत के वीर भावों को न केवल अत्यधिक क्षति पहुँचाई बल्कि वे भारतवर्ष के लिए अदूरदर्शितापूर्ण सिद्ध हुए, परिणामस्वरूप भारत में विभिन्न आक्रांताओं के सामाजिक दुष्प्रभाव भी दिखाई देने लगे। मुगलों के काल में उत्पन्न छुआछूत की नई बीमारी व भेदभाव के दूषित भाव को रोकने के लिए तत्कालीन संत कबीरदास, समर्थ गुरु रामदास, रविदास, रैदास, बिहारी एवं भास्कर कवि ने समाज के तानेबाने को छिन्न- भिन्न होने से रोक कर रखा किंतु अंग्रेजों ने छल-कपट, वैमनस्य, भेदभाव अर्थात् फूटनीति व कूटनीति से निर्ममतापूर्वक भारत पर शासन करते हुए छुआछूत की बीमारी को सुनियोजित ढंग से बढ़ाया। अंग्रेज एवं मुगलों के आने से पहले भारत में भावनात्मक रूप से कोई भेदभाव नहीं था। यदि किसी साहित्य में भेदभाव की कोई भी घटना बताई भी जाती है तो वह षड्यंत्रपूर्वक जोड़ी हुई घटना मात्र है। वैसे भी समाज के अच्छे भविष्य के निर्माण हेतु इतिहास की अच्छाइयों को ही अपनाना उचित है, किसी शत्रु देश या विघटनकारियों की कठपुतली बनकर वर्तमान को बिगाड़ने से किसी का भला नहीं होगा ।

आर्यसमाज ने चलाया था मुगलों व अंग्रेजों के षड्यंत्रों को विफल करने का अभियान

1875 में स्थापित हुए आर्यसमाज ने छुआछूत की बीमारी को दूर हटाने के लिए भी व्यापक स्तर पर अभियान चलाया। यह अभियान भारत सहित दक्षिण अफ्रीका, त्रिनिदाद, मॉरीशस, बर्मा, नेपाल, यूगांडा, फीजी तक फैला था। आज भी भारत में लाखों लोग ऐसे हैं जो चाहे किसी दलित परिवार के माने जाते रहे हों या किसी अन्य के, उन्हें आर्यसमाज ने ब्राह्मण बनाकर यज्ञ का ब्रह्मा व उपदेशक तक बनाया है। तथाकथित महापुरुष केवल अपनी ही जाति विशेष की भलाई में लगे रहे हों किंतु महर्षि दयानंद सरस्वती ब्राह्मण कुल में जन्मने के उपरांत भी लाखों पिछड़ों/दलितों को ब्राह्मण व सच्चा आर्य बना गए थे। महर्षि दयानंद सरस्वती के अनन्य भक्त तथा उनकी उत्तराधिकारिणी परोपकारिणी सभा के माननीय सदस्य बड़ौदा के राजा गायकवाड़ ने भीमराव की प्रतिभा को देखकर उन्हें छात्रवृत्ति देकर विलायत भेजा तथा मध्य प्रदेश स्थित महू के महादेव अंबेडकर नाम के एक महान ब्राह्मण गुरू ने अपना सरनेम अंबेडकर प्रदान कर जो सम्मान दिया वह ब्राह्मण बनाम दलित की विघटनकारी राजनीति करने वालों पर भी बड़ा तमाचा है। आधुनिक युग में ऐतरेय ब्राह्मण के समान अपना गोत्र तक देने के अन्य उदाहरण भरतपुर जैसी अनेक रियासतों में भी विद्यमान हैं। भरतपुर के महाराज बच्चूसिंह ने देश के विभाजन के बाद लाखों लोगों को न केवल स्वयं का फौजदार गोत्र प्रदान किया बल्कि उन्हें विशेष संरक्षण भी दिया, इस कार्य के पीछे भी आर्यसमाज की प्रेरणा थी। शुद्धि आंदोलन के प्रवर्तक स्वामी श्रद्धानंद ने अपने जीवन के एक भाग को मुगलों व अंग्रेजों द्वारा पैदा की गई अस्पृश्यता की दुर्गंध को मिटाने में आहूत कर दिया था। जबकि इक्कीसवीं सदी में विकसित कहलाने वाले कुछ आत्ममुग्ध व स्वयंभू देशों में आज भी श्वेत व्यक्ति अश्वेतों पर घृणा से थूक देता है। उन्हें शासकीय सेवा में वो स्थान नहीं मिलता, जो किसी चमड़ी विशेष या धर्म विशेष के लोगों को मिलता है।

अस्पृश्यता घृणा नहीं

आज कोरोना की संक्रामक महामारी में डॉक्टर व पुलिस वाले अपने घर के बाहर छह फ़ीट की दूरी पर हैं किन्तु न तो यह छुआछूत है और न ही नफ़रत। स्वच्छता व पवित्रता भारतीयों की जीवनचर्या का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। भारतीय घरों में आज भी श्मशान से लौटकर स्नान करना, अमावस्या पर देवताओं को दिए जाने वाले भोग (हवन) से पूर्व लिपे हुए चौके से बाहर या रसोई से बहुत दूर ही अपनी पादुकाएँ उतारना, कुष्ठ, क्षय, अस्थमा जैसी संक्रामक बीमारियों में अपने निकटतम संबंधी से भी विशेष दूरी बनाकर रखना और उत्तम स्वास्थ्य की अवस्था में एक ही तौलिया व साबुन से आठ-दस भाइयों व मित्रों का नहा लेना आदि ऐसे दृश्य हैं जो मन की दूरी को नहीं बल्कि संक्रमण की भयावहता की स्पष्ट समझ को प्रदर्शित करते हैं। उल्लेखनीय है कि स्वच्छता व पवित्रता की इस परम्परा को बनाए रखने में किसी भी परिवार की स्त्रियों का सर्वाधिक योगदान रहा है।

(लेखक वॉशिंग्टन डीसी में भारतीय संस्कृति शिक्षक हैं।)

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