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मुसलमानों को लेकर रविंद्रनाथ टैगोर की सोच क्या थी?

मुसलमानों पर उनकी सोच आज के अधिकतर मुस्लिमों को अच्छी नहीं लगेगी। उन्होंने बहुत से असुविधाजनक सच उजागर किये हैं। वे भारत के उन प्रथम कवियों में हैं जो यथार्थवाद से मिलने का प्रयास कर रहे थे। इसने उन्हें सभ्यता के स्वभाव के प्रति अत्यंत सचेत और स्पष्ट कर दिया था।

इसके अलावा उन्हें एक प्रश्न का उतार ढूंढने में मोहम्मद अली (भारत के प्रसिद्ध खलीफत आंदोलन के अली बंधुओं में एक) ने धोखा दिया था। रविंद्रनाथ टैगोर कभी भी सत्य से बचने के लिये अपने शब्दों को बना कर नहीं बोलते थे। जिसके कारण उन्हें "गुरुदेव" कहा जाता है।

उस समय वे मुस्लिमों को लेकर जो सोचते थे वह ये रहा -

हिंदू-मुस्लिम एकता की सिद्धि पाना लगभग असंभव बनाने वाला एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण कारक यह है कि मुस्लिम अपनी देशभक्ति किसी एक देश तक सीमित नहीं कर सकते। मैंने खुलकर (मुस्लिमों से) पूछा था कि यदि ऐसी कोई घटना हो जिसमें कोई मोहम्मडन शक्ति भारत पर आक्रमण कर दे, तो वे (मुस्लिम) अपने हिंदू पड़ोसियों के साथ अपनी इस सामूहिक भूमि की रक्षा के लिये खड़े होंगे। मुझे उनसे मिलने वाले उत्तर से मैं संतुष्ट नहीं हुआ... श्रीमान् मोहम्मद अली (खलीफत आंदोलन के नेताओं — अली बंधुओं में एक) जैसे पुरुष ने भी घोषणा कर रखी है कि किसी भी परिस्थिति में किसी भी मोहम्मडन के लिये, उसका देश जो भी हो, किसी मोहम्मडन के विरुद्ध खड़े होना क्षम्य नहीं है।

(स्रोत - रविंद्रनाथ टैगोर, 'टाइम्स ऑफ इंडिया' में रविंद्रनाथ टैगोर का साक्षात्कार, १८-४-१९२४ को "खलीफत पश्चात हिंदू-मुस्लिम दंगों पर भारतीय आँखों से" नामक स्तंभ में)

पृथ्वी पर दो मजहब हैं जिनकी बाकी सभी मजहबों से सुस्पष्ट शत्रुता है। ये दोनों हैं ईसाईयत और इस्लाम। उन्हें केवल अपने मजहब के नियम-पालन से संतुष्टि नहीं है, बल्कि वे दूसरे सभी मजहबों को नष्ट करने को दृढ़ हैं। इसीलिये उनके मजहबों को अंगीकार करना ही उनके साथ शांति बहाल करने का एकमात्र तरीका है।

(स्रोत - Original works of Rabindranath खण्ड २४, पृष्ठ ३७५, विश्व भारती; १९८२)

आज की दृष्टि से ये शब्द बेहद कटु और कट्टर लग सकते हैं। किंतु, हमें यह समझना चाहिये कि रविंद्रनाथ गलत भी नहीं थे। इब्राहिमी मजहब (विशेषकर ईसाईयत और इस्लाम) मतांतरण के प्रति सचमुच बहुत गंभीर हैं। हिंदू पंथ में ७० के दशक में इस्कॉन के उदय से पहले तक ऐसे कोई उदाहरण नहीं थे (इस्कॉन के कुछ अनुयायी तो अपनी पहचान हिंदू से अलग भी बताते हैं)। यदि आप उनके तरीके नहीं मानते तो आप नर्क में जायेंगे। किंतु, कुछ शिष्टता बनाये रखने के लिये कोई यह बात मुख पर नहीं कहता।

रविंद्रनाथ टैगोर ने बाद में अपनी रचना — परिचय में अपने कथनों पर सफाई दी (किंतु उन्हें वापस नहीं लिया) -

जब दो-तीन मजहब दावा करें कि केवल उनका अपना मजहब ही सच्चा है और दूसरे सभी मजहब झूठे हैं, उनका मजहब ही स्वर्ग पाने एक एकमात्र रास्ता है, तब झगड़ों से बचा नहीं जा सकता। अतः यह रूढ़िवाद दूसरे सभी मजहबों को मिटाने का प्रयास करता है। इसे मजहब में साम्यवाद कहते हैं। केवल हिंदू धर्म द्वारा दिखाया मार्ग विश्व को इस नीचता से मुक्त कर सकता है।

(स्रोत - रविंद्रनाथ टैगोर, 'परिचय' पुस्तक में 'आत्मपरिचप')

लोग आश्चर्य कर सकते हैं कि इसी काल में अंबेडकर भी थे और उन्होंने हिंदुओं के विरुद्ध करीब दस या बीस वर्षों के बाद कटु टिप्पणियाँ लिखीं। तो रविंद्रनाथ के हिंदुओं पर ऐसे अनुकूल विचार कैसे थे? आखिर रविंद्रनाथ एक ऐसे समय में रह रहे थे जहाँ जातिवाद और अधिक खराब था। अतीत में उदारवादियों के विचारों में ऐसे विरोधाभास कैसे हो सकते हैं?

आपको यह भी देखना होगा कि बंगाल राजा राममोहन राय (१८१४) के कोलकाता लौटने और महाभारत का संस्कृत से बंगाली में अनुवाद शुरू करने के समय से ही, अर्थात लगभग १०० वर्षों से सांस्कृतिक क्रांति का केंद्र था। बाकी भारत की तुलना में वहाँ जातिवाद लगभग सुप्त था। बंगाल में अंतर का आधार कमोबेश वर्गवाद था क्योंकि यदि केवल जाति को एकाश्म की तरह देखें तो जमींदार और व्यापारी बहुत नीचे आते। बंगाल में दूसरे राज्यों की अपेक्षा जातिवाद को बहुत हद तक रोक दिया गया था। जिससे हिंदू धर्म के प्रति ऐसे अनुकूल विचार देखने को मिले। साथ ही, रविंद्रनाथ टैगोर गरीब और अमीर के भेद पर लिखने वालों में सर्वोत्कृष्ट लेखक थे। उनकी उत्कृष्ट कविता दुई बीघा जमीन, जिसे दो बीघा जमीन नामक फिल्म ने सर्व-लोकप्रिय किया, इसकी मिसाल थी। बलाका, चंडालिका इत्यादि ऐसी दूसरी रचनायें हैं। जब गांधी ने अपनी हरिजन पत्रिका के लिये उनसे लिखने को कहा तो उन्होंने तुरंत ही एक कविता लिखी — हरिजन खंड १, संख्या ७ (२५ मार्च १९३३) के लिये 'The Sacred Touch'।

किंतु मूल प्रश्न जातियों पर नहीं था। अतः आगे देखते हैं कि वे मुस्लिमों पर क्या सोचते थे।

जब भी मुस्लिम समाज से किसी मुस्लिम ने गुहार लगाई, उसे कभी विरोध नहीं झेलना पड़ा-वह एक ईश्वर के नाम पर 'अल्लाह-हो-अकबर' की पुकार लगाता। वहीं दूसरी ओर, जब हम (हिंदू) पुकार लगायें, 'हिंदुओं, आगे आओ', तो कौन उत्तर दे? हम, हिंदू, कई छोटे समाजों में बंटे हैं, कई अवरोध-संकीर्णता-इन सब रुकावटों को पार कर कौन प्रतिक्रिया दे? हमने कई खतरे झेले, किंतु कभी एकजुट न हो सके। जब मोहम्मद गोरी ने बाहर से पहला प्रहार किया, तो आसन्न संकट के उन दिनों में भी हिंदू एकजुट न हो सके। जब मुस्लिमों ने एक के बाद एक मंदिर ढहाने शुरू किये, और देवी-देवताओं की मूर्तियां तोड़ने लगे, हिंदुओं ने छोटी टुकड़ियों में युद्ध किया और मारे गये, पर वे एकजुट न हो सके। यह पहले से देखा हुआ है कि हम अपने मतभेद के कारण विभिन्न कालों में मारे गये हैं।

निर्बलता पाप को आश्रय देती है। अतः यदि मुस्लिमों ने हमें मारा और हम, हिंदुओं ने बिना विरोध किये इसे सह लिया - तो हम जान लेंगे कि यह केवल हमारी निर्बलता के कारण ही संभव हो सका। हमारे लिये और हमारे पड़ोसी मुस्लिमों के लिये भी, हमें अपनी निर्बलता छोड़नी होगी। 'कृपया हमसे क्रूरता मत करो। कोई मजहब नरसंहार पर आधारित नहीं हो सकता' - इस प्रकार की अपील और कुछ नहीं, केवल एक निर्बल व्यक्ति का रूदन है। जब वायु में निम्न दाब बनता है तो तूफान स्वतः आता है; मजहब के नाम पर कोई इसे रोक नहीं सकता। इसी तरह, यदि निर्बलता पाली जाती है और उसका अस्तित्व बनाये रखा जाता है, तो उत्पीड़न स्वयमेव आता है - इसे कोई रोक नहीं सकता। संभव है कि हिंदू और मुस्लिम एक-दूसरे से कुछ समय के लिये झूठी मित्रता कर लें, किंतु यह मित्रता सदा नहीं रहेगी। जब तक आप उस मिट्टी का शोधन नहीं करते जिसपर केवल कांटेदार झाड़ियां ही निकलती हैं, आप मीठे फल की अपेक्षा नहीं कर सकते।

(स्रोत - स्वामी श्रद्धानंद, कालांतर, १९२७ - टैगोर के श्रेष्ठ उपन्यासों में एक)

मैं लोगों से अनुरोध करुंगा कि हमारे आधुनिक समाज की आँखों से रविंद्रनाथ टैगोर को नहीं देखें। हिंदू और मुस्लिम समाज के बीच उन दिनों अत्यधिक झगड़े होते थे। आज के मुकाबले कहीं अधिक।

टैगोर ने हमेशा रूढ़िवाद का, भेदसूचक व्यवहार का और निरंकुश विशुद्धिवाद का विरोध किया, मजहब कोई भी हो। उन्होंने हिंदू समाज में होने वाले (शास्त्रीय या प्रामाणिक) अन्याय के विरुद्ध भी कहा।

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