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चार दशक बाद बदली तस्वीर, आदिवासी इलाकों में दौड़ी बसें, इस IAS ने शिक्षा, रोजगार तक आसान बनाई पहुंच

चार दशक बाद बदली तस्वीर, आदिवासी इलाकों में दौड़ी बसें, इस IAS ने शिक्षा, रोजगार तक आसान बनाई पहुंच

IAS Story: चार दशक से ज्यादा समय तक वामपंथी उग्रवाद की चुनौती झेलने वाले छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में अब बदलाव की एक नई तस्वीर दिखाई दे रही है. जिन गांवों में कभी बस का पहुंचना भी मुश्किल था, वहां अब सार्वजनिक परिवहन लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को आसान बनाने लगा है.

यह बदलाव सिर्फ सड़कों और बसों तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बाजार से जुड़ने का रास्ता भी खोल रहा है.

छत्तीसगढ़ के गठन के समय, यानी 1 नवंबर 2000 को राज्य में सरकारी परिवहन व्यवस्था मौजूद थी. लेकिन नक्सली हमलों और दूरदराज के क्षेत्रों में यात्रियों की कम संख्या के कारण बस संचालन लगातार मुश्किल होता गया. आखिरकार 2006 में सरकारी बस सेवा बंद करनी पड़ी. इसका सबसे ज्यादा असर उन आदिवासी परिवारों पर पड़ा, जिनके पास निजी वाहन की सुविधा नहीं थी. स्कूल, अस्पताल, बाजार और सरकारी कार्यालय तक पहुंचने के लिए कई ग्रामीणों को लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़ती थी.

कालीकट यूनिवर्सिटी से आर्किटेक्चर में B.Tech. की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने अपने करियर की दिशा तय की. तकनीकी शिक्षा ने उन्हें डिजाइन, प्लानिंग और निर्माण की बारीकियां समझने के साथ आगे बढ़ने का मजबूत आधार दिया.

अब गांवों तक पहुंच रही हैं 108 बसें

सुरक्षा व्यवस्था में सुधार के बाद राज्य सरकार ने दूरदराज के इलाकों को दोबारा जोड़ने की दिशा में कदम बढ़ाया है. इसके लिए सरकार ने अपना नया परिवहन निगम बनाने के बजाय निजी बस ऑपरेटरों के साथ साझेदारी का मॉडल अपनाया है. फिलहाल बस्तर सहित 13 जिलों में 108 बसें संचालित की जा रही हैं. बसें आम तौर पर सुबह और शाम दो बार चलती हैं. इनका किराया 8 रुपये से शुरू होता है, जिससे ग्रामीणों के लिए सफर अपेक्षाकृत किफायती बना रहता है.

छात्रों के लिए बस बनी उम्मीद की सवारी

इस पहल का सबसे बड़ा फायदा स्कूली बच्चों को मिल रहा है. पहले कई बच्चों को स्कूल जाने के लिए लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़ती थी. अब बस सेवा ने उनके लिए नियमित रूप से स्कूल पहुंचना आसान किया है. राज्य में अनुसूचित जनजाति समुदाय की साक्षरता दर करीब 59.1 प्रतिशत बताई गई है. ऐसे में बेहतर परिवहन व्यवस्था शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकती है.

इलाज, बाजार और रोजगार तक आसान पहुंच

बस सेवा का लाभ केवल विद्यार्थियों तक सीमित नहीं है. छोटे कारोबारी अपने कृषि और वन उत्पाद नजदीकी बाजारों तक ले जा पा रहे हैं. रोजगार के लिए कस्बों में जाने वाले ग्रामीणों और नियमित इलाज के लिए शहर जाने वाले मरीजों को भी इसका फायदा मिल रहा है. हालांकि कई रूट पर बस चलाना ऑपरेटरों के लिए आर्थिक रूप से आसान नहीं है. इसे ध्यान में रखते हुए सरकार सब्सिडी देकर परिवहन सेवा को बनाए रखने में मदद कर रही है.

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IAS अधिकारी एस. प्रकाश की अहम भूमिका

इस पहल की अगुवाई परिवहन सचिव एस. प्रकाश कर रहे हैं. उनका कहना है कि आदिवासी समुदायों को स्कूलों, उच्च शिक्षा और जरूरी सेवाओं से जोड़ना इस योजना का प्रमुख उद्देश्य है. ग्रामीणों से मिल रहे सकारात्मक रिस्पॉन्स के बीच यह पहल छत्तीसगढ़ में सामान्य जनजीवन की वापसी का संकेत देती है. दशकों के संघर्ष के बाद किसी गांव में चलती बस शायद एक छोटी उपलब्धि लगे, लेकिन वहां रहने वाले परिवारों के लिए यह स्कूल, अस्पताल, बाजार और बेहतर भविष्य तक पहुंचने का साधन है.

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