आजकल की भागदौड़ भरी लाइफस्टाइल, आरामदायक सुविधाओं और बढ़ती हेल्थ टेंशन के बीच बैंक बैलेंस जल्दी खाली हो जाता है. दूसरी ओर महीने के अंत तक सैलरी क्रेडिट होने वाले मैसेज का भी बेसब्री से इंतजार रहता है.
कई लोग तो सैलरी की अपडेट को लेकर दिन में दो-चार बार मोबाइल चेक करते हैं. कभी बैंकिंग ऐप तो कभी SMS. क्या आप भी उनमें से एक हैं जो दिन में बार-बार अपनी सैलरी या बैंक बैलेंस का अपडेट चेक करते हैं तो शायद लोगों ने आपको भी पैसों के पीछे भागने वाला या कंजूस कहा होगा लेकिन मनोवैज्ञानिकों कुछ और ही कहता है. साइकोलॉजी के मुताबिक, बार-बार बैलेंस चेक करना सिर्फ पैसों का हिसाब रखना नहीं है, बल्कि यह आपके खर्चों के फैसलों से जुड़े रहने का एक बेहतरीन तरीका है. आइए समझते हैं कि यह छोटी सी आदत आपकी जेब और दिमाग पर क्या असर डालती है.
फाइनेंशियल अवेयरनेस के लिए अच्छा
आप अपना ऐप ओपन करते हैं. बैंक बैलेंस देखते हैं, फिर लॉग आउट कर देते हैं. इसमें मुश्किल से दो सेकंड लगते हैं लेकिन यह छोटी सी आदत सिर्फ यह नहीं बताती कि सैलरी आई है या नहीं. बल्कि यह आपको हर स्वाइप, टैप और ऑनलाइन ट्रांसफर से जोड़ती है. जब भी आप बैलेंस के नंबर्स पर गौर करते हैं तो आपको अपने पुराने ट्रांजेक्शन या खर्चे याद आते हैं. बैलेंस कम हो तो आप खर्चे भी कम कर देते हैं. इसे जुनूनी होना नहीं. अपने फैसलों के प्रति जागरुक होना कहते हैं.
सेफ जोन में आने लगते हैं आप
पहले जब हम कैश यूज करते थे तो जेब से नोट निकलते ही या जब भी पर्स खाली होता था तो ब्रेन का अलर्ट मिल जाता था. लेकिन कार्ड और यूपीआई ऐप्स ने दर्द को खत्म कर दिया है. लेकिन चिंता बढ़ा दी है क्योंकि एक स्वाइप और पूरा बैलेंस गायब. इस बीच आप जब-जब बैलेंस चेक करते हैं तो अपने दर्द को दोबारा याद करते हैं. स्वीडन के स्टॉकहोम स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के रिसर्चर्स ने इस पर एक स्टडी की, जिसका नाम था Mind the App. शोधकर्ताओं ने पाया कि जो लोग मोबाइल पर अपना बैलेंस लगातार देखते रहते हैं, उनके कम आवश्यक खर्चों में कमी आ जाती है. वे एटीएम से कैश भी कम निकालते हैं और उनके खाते में ज़्यादा पैसे बचे रहते हैं.
बैलेंस दिखाता है आपको आईना
ज़्यादातर लोग सोचते हैं कि बार-बार बैंक बैलेंस चेक करना मतलब स्ट्रेस को गले लगाना या फिर अपने जख्मों को बार-बार कुरेदना. लेकिन ऐसा नहीं है. यह आदत एक आईने की तरह काम करती है. जब भी आप बैलेंस चेक करते हैं तो आपके दिमाग में सबसे पहले यह बात आती है कि बड़े और अनावश्यक खर्चे कहां-कहां हुए. क्या सही जगह खर्च किया. यदि नहीं तो पुराने फैसलों को सुधारने का सबक मिलता है. यही यादें आपको भविष्य के लिए फाइनेंशियली स्ट्रांग बनाती हैं.
बजटिंग ऐप्स से लाख गुना बेहतर
आज के आधुनिक दौर मे लोग अपने खर्चे और महीने का बजट बैलेंस करने के लिए बजटिंग ऐप्स का यूज करते हैं.हालांकि यह काम थोड़ा टाइम चेकिंग और मेहनती है लेकिन बैलेंस चेक करने में बिल्कुल मेहनत नहीं लगती. साफ-साफ नजर आ जाता है कि कितना खर्च हो चुका है. काफी बार बैलेंस कम होने पर दिल को झटका तो लगता है लेकिन इससे अगले महीने के लिए सबक मिलता है. हालांकि कई बार सिर्फ जरूरी चीजों पर खर्च करने पर बैलेंस अधिक दिखता है तो सेविंग्स के लिए मोटिवेशन भी मिलती है.
खुद को कभी न कोसें
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, जब भी आप अपना बैलेंस चेक करें तो अपने आप को बिल्कुल न कोसें. क्योंकि आपकी आज की जागरुकता, कल की फाइनेंशियल लिटरेसी बनेगी. आपका पैसों से सीधा कनेक्शन बनेगा. आप खर्च करने के साथ-साथ पैसे बचाना और इन्वेस्ट करना सीखेंगे. आपकी हर 2 सेकंड की जागरूकता, हर महीने बैठकर बजट डिसाइड करने से कहीं ज्यादा बेहतरीन तरीके से आपके फाइनेंशियल डिसीजन को निखारती है.

