गायक-अभिनेता दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’ को लेकर इन दिनों विवाद हो रहा है. फिल्म को जी5 पर रिलीज किया गया था. और रिलीज के दो दिन बाद ही इसे प्लैटफार्म से हटा दिया गया.
दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन समिति (DSGMC) ने इस कदम पर आपत्ति जताते हुए इसे सामाजिक कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की कहानी को दबाने का प्रयास बताया है. इसके अलावा DSGMC ने फिल्म को जनता तक पहुंचाने के लिए सार्वजनिक स्क्रीनिंग और शैक्षिक सेमिनार आयोजित करने की भी घोषणा की है.
डीएसजीएमसी के अध्यक्ष ने क्या कहा?
मंगलवार को डीएसजीएमसी के अध्यक्ष हरमीत सिंह कालका ने कहा कि जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित यह फिल्म पंजाब में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों को उजागर करने के लिए कार्यकर्ता के प्रयासों को दर्शाती है और इसे दर्शकों तक पहुंचने से नहीं रोका जाना चाहिए. उन्होंने कहा, ‘चूंकि यह फिल्म जसवंत सिंह खालरा की जीवनी पर आधारित है, इसलिए यह दर्शाती है कि कैसे एक समाजसेवी ने लोगों को सच्चाई से अवगत कराया. उन्होंने 25,000 शवों के ‘लावारिस’ घोषित कर दाह संस्कार किए जाने के सबूत उजागर किए और इस मुद्दे को न केवल देश में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उठाया, जिससे पंजाब की भयावह स्थिति सामने आई. इस कहानी को दबाना, उस अंधकारमय युग की घटनाओं को जनता तक पहुंचने से रोकना घोर गलत है और इसने सिख समुदाय में भारी आक्रोश पैदा किया है.’
फिल्म की सार्वजनिक स्क्रीनिंग की जाएगी
आगे उन्होंने कहा, ‘हमने सभी गुरुद्वारा समिति सदस्यों से फिल्म डाउनलोड करने और अपने-अपने क्षेत्रों में दिखाने का अनुरोध किया है ताकि यह जनता तक पहुंच सके. इसके अलावा, हम जल्द ही अपने स्कूलों और कॉलेजों के अध्यक्षों के साथ एक बैठक आयोजित करेंगे. जसवंत सिंह खालरा के जीवन और विरासत पर चर्चा करने के लिए प्रत्येक कॉलेज में सेमिनार आयोजित किए जाएंगे. हम चाहते हैं कि लोग यह समझें कि एक अकेला सामाजिक कार्यकर्ता समाज पर कितना प्रभाव डाल सकता है. अगर एक व्यक्ति इतना कुछ हासिल कर सकता है, तो हम सभी मिलकर ऐसा क्यों नहीं कर सकते.’
‘सतलुज’ फिल्म के बारे में
फिल्म ‘सतलुज’ में दिलजीत दोसांझ ने जसवंत सिंह खालरा का किरदार निभाया है, जो एक बैंक क्लर्क से मानवाधिकार कार्यकर्ता बने. उन्होंने 1980 के दशक के उत्तरार्ध और 1990 के दशक के आरंभिक वर्षों में पंजाब में चल रहे उग्रवाद और आतंकवाद विरोधी अभियानों के दौरान कथित अवैध हत्याओं और गुप्त दाह संस्कारों का पर्दाफाश किया था. खालरा 1995 में लापता हो गए थे. दस साल बाद, पंजाब पुलिस के चार कर्मियों को उनके अपहरण, यातना और कथित हत्या के आरोप में दोषी ठहराया गया। खालरा का शव आज तक नहीं मिला है.
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