Justice Ravi Kumar Divakar: ज्ञानवापी प्रकरण में अपने फैसले को लेकर देशभर में चर्चा में आए जज रवि कुमार दिवाकर एक बार फिर सुर्खियों में हैं. इस बार वजह किसी धार्मिक विवाद से जुड़ा मामला नहीं बल्कि हत्या के मामलों में लगातार सुनाए गए उनके कड़े फैसले हैं.
महज तीन महीने के भीतर उन्होंने मुजफ्फरनगर की अदालत में अलग-अलग हत्याकांडों में 13 दोषियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई है. इन फैसलों ने न्यायिक गलियारों के साथ-साथ आम लोगों के बीच भी नई बहस छेड़ दी है.
हालांकि, भारतीय न्याय व्यवस्था के तहत किसी भी ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई मृत्युदंड की सजा अंतिम नहीं होती. ऐसे सभी मामलों में दोषियों को उच्च न्यायालय में अपील करने का अधिकार होता है और फांसी की सजा पर अमल से पहले उच्च न्यायालय की पुष्टि आवश्यक होती है.
समीर सैफी हत्याकांड में फैसला
इन चर्चित फैसलों की शुरुआत 6 अप्रैल 2026 से हुई. अधिवक्ता समीर सैफी हत्याकांड में अदालत ने सिंगोल अल्वी, सोनू उर्फ रिजवान और शालू उर्फ अरबाज को दोषी मानते हुए मृत्युदंड की सजा सुनाई। इस फैसले को गंभीर अपराधों के खिलाफ अदालत के सख्त रुख के तौर पर देखा गया. इसके बाद 28 अप्रैल 2026 को अदालत ने शेखर हत्याकांड में एक ही परिवार के चार लोगों मुकेश और उसके तीन बेटों प्रदीप, संदीप और सोनू को फांसी की सजा सुनाई. यह फैसला भी पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना.
इन मामलों में भी सुनाई मौत की सजा
30 मई 2026 को राजेश देवी हत्याकांड में आरोपी रईस को मृत्युदंड दिया गया. अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर उसे दोषी करार दिया.
20 जून 2026 को राजेंद्र सैनी हत्याकांड में अदालत ने रामकरण उर्फ सावन गिरी और गीलू को फांसी की सजा सुनाई. अभियोजन पक्ष ने इसे पीड़ित परिवार के लिए न्याय की दिशा में बड़ा कदम बताया.
2 जुलाई 2026 को होमगार्ड रतिराम हत्याकांड में आरोपी दीपक को मृत्युदंड सुनाया गया. यह फैसला भी हालिया चर्चित मामलों में शामिल रहा.
इस मामले ने बटोरी सुर्खियां
इन सभी मामलों में सबसे ज्यादा चर्चा 6 जुलाई 2026 को आए फैसले की हुई. यह मामला मुजफ्फरनगर के तितावी थाना क्षेत्र के मांडी गांव का था, जहां प्रधानी चुनाव की रंजिश ने एक किसान के परिवार की जिंदगी बदल दी थी. घटना 24 अगस्त 2010 की है। किसान राजबीर सिंह अपने खेत में काम कर रहे थे. आरोप है कि इसी दौरान उन पर गोलियां बरसा दी गईं और उनकी मौके पर ही मौत हो गई. हत्या के बाद गांव में तनाव फैल गया और परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा.
मृतक के बेटे प्रदीप ने तितावी थाने में अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया. पुलिस जांच आगे बढ़ी तो गांव के ही सहदेव, तत्कालीन प्रधान प्रमोद कुमार, अमित और विपिन शर्मा के नाम सामने आए. चारों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया और मामला अदालत पहुंचा. मुकदमे की सुनवाई कई सालों तक चली. इस दौरान आरोपी अमित और विपिन शर्मा की पुलिस मुठभेड़ों में मौत हो गई, जिसके बाद मुकदमा सहदेव और पूर्व प्रधान प्रमोद कुमार के खिलाफ जारी रहा. अदालत में अभियोजन पक्ष ने गवाहों, दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों के आधार पर अपना पक्ष रखा.
लगभग 16 साल लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद 6 जुलाई 2026 को फास्ट ट्रैक कोर्ट के न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने सहदेव उर्फ पप्पू और पूर्व प्रधान प्रमोद कुमार को दोषी करार देते हुए मृत्युदंड की सजा सुनाई. अदालत ने दोनों पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया. फैसला सुनाए जाने के बाद दोनों दोषियों को पुलिस अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया.
अभियोजन पक्ष ने क्या कहा?
मुजफ्फरनगर के जिला शासकीय अधिवक्ता (डीजीसी) राजीव शर्मा ने इस बारे में जानकारी देते हुए कहा कि अदालत के इन फैसलों से पीड़ित परिवारों का न्याय व्यवस्था पर विश्वास और मजबूत हुआ है. उनका कहना है कि गंभीर अपराधों में कठोर सजा समाज में स्पष्ट संदेश देती है कि कानून अपना काम पूरी सख्ती से करता है और अपराधियों के मन में कानून का भय बना रहता है.
क्यों हो रही है इतनी चर्चा?
एक ही न्यायाधीश द्वारा महज तीन महीने के भीतर अलग-अलग हत्या के मामलों में 13 दोषियों को मृत्युदंड सुनाया जाना अपने आप में चर्चा का विषय बन गया है. कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि प्रत्येक मामले में अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों और कानूनी प्रावधानों के आधार पर स्वतंत्र रूप से फैसला सुनाया है. वहीं, सभी दोषियों को कानून के तहत उच्च न्यायालय में अपील करने और आगे की न्यायिक प्रक्रिया अपनाने का पूरा अधिकार प्राप्त है.

