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'अंबेडकर भी देखते तो दुखी होते', पवन खेड़ा की जमानत पर SC में तीखी बहस, असम CM पर अभिषेक मनु सिंघवी ने कसा तंज

'अंबेडकर भी देखते तो दुखी होते', पवन खेड़ा की जमानत पर SC में तीखी बहस, असम CM पर अभिषेक मनु सिंघवी ने कसा तंज

India Daily 2 weeks ago

ई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस नेता पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत याचिका पर गुरुवार को तीखी बहस देखने को मिली. यह मामला असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा की पत्नी द्वारा दायर मानहानि के मामले से जुड़ा है.

बहस के दौरान पवन खेड़ा के वकील अभिषेक मनु सिंघवी और असम सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के बीच काफी तीखे तर्क-वितर्क हुए. सिंघवी ने मुख्यमंत्री पर व्यक्तिगत हमला बोलते हुए उन्हें 'संवैधानिक काउबॉय' करार दिया, जबकि तुषार मेहता ने फर्जी दस्तावेजों का मुद्दा उठाकर हिरासत की जरूरत पर जोर दिया.

सुप्रीम कोर्ट में पवन खेड़ा की जमानत याचिका पर बहस

सुप्रीम कोर्ट में पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई शुरू हुई. खेड़ा पर असम CM हिमंत विश्व शर्मा की पत्नी ने मानहानि का केस दर्ज कराया है. सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगाए. बचाव पक्ष ने मामले को राजनीतिक प्रतिशोध बताया, जबकि अभियोजन पक्ष ने इसे गंभीर दस्तावेज जालसाजी का मामला करार दिया.

अभिषेक मनु सिंघवी की तीखी दलीलें

पवन खेड़ा की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा पर निशाना साधा. उन्होंने उन्हें 'संवैधानिक काउबॉय' और 'संवैधानिक रेम्बो' कहा. सिंघवी ने कहा कि अगर डॉ. अंबेडकर आज यह देखते कि कोई संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति इस तरह बोल रहा है, तो उन्हें बहुत दुख होता. उन्होंने पुलिस की भारी फोर्स वाले घेराबंदी पर भी सवाल उठाया.

तुषार मेहता का पलटवार

असम सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पवन खेड़ा की जमानत याचिका का पुरजोर विरोध किया. उन्होंने अदालत को बताया कि खेड़ा द्वारा पेश किए गए पासपोर्ट फर्जी और जाली हैं. मेहता ने कहा कि मामले की सच्चाई जानने के लिए खेड़ा की हिरासत में पूछताछ जरूरी है. उन्होंने दावा किया कि यह सिर्फ मानहानि का मामला नहीं, बल्कि दस्तावेज जालसाजी का गंभीर मामला है.

दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस

बचाव पक्ष ने दलील दी कि खेड़ा एक सार्वजनिक व्यक्ति हैं और उनके भागने का कोई खतरा नहीं है. ज्यादातर धाराएं जमानती हैं, इसलिए हिरासत की जरूरत नहीं है. वहीं अभियोजन पक्ष ने कहा कि फर्जी दस्तावेजों की जांच के लिए हिरासत में पूछताछ अनिवार्य है. दोनों पक्षों की तीखी बहस के बाद अब सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर अपना फैसला सुनाएगा.

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