गुप्त उपचार की महत्वपूर्ण परंपरा निभाई गई
बुखार से स्वास्थ्य लाभ की मान्यता के बीच श्रीअंग पर किया गया औषधीय तेल का लेप
नवयौवन वेश की तैयारियां हुईं तेज
पुरी। श्रीजगन्नाथ मंदिर में अणसर पंचमी के अवसर पर भगवान श्रीजगन्नाथ, भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और भगवान सुदर्शन के श्रीअंग पर पवित्र फूलुरी तेल का लेप किया गया।
दैतापति सेवायकों ने परंपरागत विधि-विधान के अनुसार इस महत्वपूर्ण अनुष्ठान को संपन्न कराया, जिसे महाप्रभु के गुप्त उपचार का अहम हिस्सा माना जाता है।
स्नान पूर्णिमा के दिन महाअभिषेक के बाद चतुर्धा विग्रहों के बीमार पड़ने की धार्मिक मान्यता है। इसके बाद उन्हें अणसर गृह में विश्राम और गुप्त चिकित्सा के लिए रखा जाता है, जहां भक्तों का प्रवेश नहीं होता। अणसर के चौथे दिन श्रीअंग फिता नीति (शरीर शुद्धिकरण) संपन्न होने के बाद पंचमी तिथि पर फूलुरी तेल से मालिश की परंपरा निभाई जाती है।
यह विशेष फूलुरी तेल हर वर्ष बड़ा ओड़िया मठ द्वारा मंदिर को उपलब्ध कराया जाता है। इसके निर्माण की प्रक्रिया अत्यंत प्राचीन और विशिष्ट है। घानी में निकाले गए सरसों के तेल में 14 प्रकार के सुगंधित पुष्प, सात प्रकार की औषधीय जड़ियां एवं जड़ी-बूटियां तथा केतकी, हिना, जूही और मल्ली जैसे सुगंधित फूल मिलाकर मिश्रण तैयार किया जाता है। इसके बाद इसे मिट्टी के पात्र में बंद कर पूरे एक वर्ष तक भूमि के भीतर सुरक्षित रखा जाता है।
स्नान पूर्णिमा से पहले इस पात्र को बाहर निकालकर तेल को छानकर सुरक्षित रखा जाता है। अणसर पंचमी के दिन इसे दोबारा छानकर विशेष विधि से तैयार किया जाता है। मध्याह्न धूप नीति के बाद पतिमहापात्र सेवक इस तेल को तीन रजत पात्रों में विधिवत पवित्र करते हैं और फिर दैतापति सेवकों को सौंपते हैं। इसके बाद सेवक अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ महाप्रभु के श्रीअंग पर इस औषधीय तेल की मालिश करते हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार फूलुरी तेल का यह लेप अणसर काल में चलने वाली गुप्त चिकित्सा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पाना और चकटा भोग के साथ यह पारंपरिक औषधीय उपचार महाप्रभु के बुखार को दूर कर उन्हें स्वास्थ्य लाभ प्रदान करता है तथा आगामी रथयात्रा से पूर्व होने वाले नवयौवन वेश के लिए तैयार करता है।
सदियों पुरानी यह परंपरा श्रीजगन्नाथ संस्कृति, आयुर्वेदिक ज्ञान और सेवकों की महाप्रभु के प्रति अटूट श्रद्धा एवं समर्पण का अद्भुत प्रतीक मानी जाती है।

