कर्बला की लड़ाई मुस्लिम धर्म के इतिहास में एक बहुत बड़ी घटना हैं। यह लड़ाई मात्र दो पक्षों की न होकर दो विचारधाराओं की थी। इस लड़ाई ने मुस्लिम समाज को दो भागों में बांट दिया था। जिसमें एक शिया कहलाया,दुसरे को सुन्नी के नाम से जाना जाता हैं। कर्बला की जंग के कारण दोनो पक्षों में आज भी साफ तौर पर एक दूसरे के प्रति कड़वा साफ दिखती है।
इस लड़ाई की बुनियाद तो पैगम्बर मुहम्मद की मृत्यु के बाद ही पड़ गई थी, जहाँ हज़रत अली के समर्थक पैग़म्बर मुहम्मद का उत्तराधिकारी हज़रत अली को मानते थे। पर अली के विरोधी अबु बुकर उम्मय्या को खलीफा बनाना चाहते थे। अली के समर्थक बहुत से थोड़े थे अंत अबु बकर दूसरे खलीफा बने।
इसलिये उसने एक बडी फ़ौज भेज कर कर्बला में हुसैन के परिवार और उसके आदमियों को घेर लिया। उनके यहां खाना-पानी पहुंचने पर पाबन्दी लगा दी। तीन दिन भूखे-प्यासे रखने के बाद यजीद उन्हें फिर अपने पक्ष में समर्थन देने या युद्ध करने की शर्त रखता है पर हजरत हुसैन युद्ध चुनता है और अपने कुछ साथियों ,जो 72 के जितने बताए गए है उनके साथ , यजीद की 100000 सेना से भिड़ जाते है। हुसैन औऱ उसके आदमी बहादुरी से लड़े पर थोड़े ही समय मे यजीद की सेना के तीरों के शिकार हो गए।
यजीद ने हुसैन औऱ उनके साथियों के शवों के साथ भी क्रूरता की। यहाँ तक कि हुसैन के बेटे जो उस समय मात्र 6 माह का था का भी सर कलम कर दिया। यहीं से मुस्मिल धर्म शिया ओर सुन्नी में बंट गया। हजरत अली और उसके परिवार के समर्थक शिया कहलाये। और उम्मय्या औऱ उसके वंश यजीद के समर्थक सुन्नी कहलाये। शिया मानते है कि यजीद ने जो हजरत हुसैन और उसके परिवार से जो किया वह गलत था।
इस युद्ध मे जीत तो यजीद की सेना की हुई पर शिया के लिए हजरत हुसैन अमर हो गए। क्यों वे मानते है यजीद एक अत्याचारी था। और हजरत हुसैन ने उसके अत्याचारों के आगे अपना सच्चा इमान नहीँ खोया। आज भी शिया समाज मुहर्रम पर हुसैन और उसके परिवार के लिए अल्लाह से दुआ मांगते है । तथा ये कामना करते है कि वे भी हजरत हुसैन की भांति अपने ईमान को बचा सके।

