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बंगाल की भवानीपुर सीट पर टिकी सबकी नजर... ममता बनर्जी के गढ़ में क्या सुवेंदु अधिकारी मारेंगे बाजी?

बंगाल की भवानीपुर सीट पर टिकी सबकी नजर... ममता बनर्जी के गढ़ में क्या सुवेंदु अधिकारी मारेंगे बाजी?

सोमवार को जैसे ही मतगणना शुरू हुई, पश्चिम बंगाल की सबसे चर्चित राजनीतिक टक्कर पर सबकी नजरें टिक गईं. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी के बीच यह मुकाबला सिर्फ एक सीट का नहीं, बल्कि सियासी प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुका है.

दोनों ही नेता इस बार आमने-सामने हैं और परिणाम राज्य की राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं.

ममता बनर्जी ने एक बार फिर भवानीपुर सीट से चुनाव मैदान में उतरकर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की है. इस सीट पर दूसरे चरण में 29 अप्रैल को मतदान हुआ था. वहीं, भाजपा के नेता सुवेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम के साथ-साथ भाबानीपुर में भी सक्रिय प्रचार करते हुए बनर्जी को सीधी चुनौती दी है.

2021 में भी हुआ था आमना-सामना

साल 2021 के चुनावी में ममता बनर्जी ने नंदीग्राम सीट से चुनाव लड़ा था, जहां उन्हें सुवेंदु अधिकारी के हाथों करीब 1,956 वोटों से हार का सामना करना पड़ा था. अब स्थिति उलट है, क्योंकि इस बार सुवेंदु अधिकारी भवानीपुर में बनर्जी के खिलाफ खड़े हैं, जो उनका मजबूत गढ़ माना जाता है.

भवानीपुर: ममता का मजबूत किला

भवानीपुर सीट लंबे समय से ममता बनर्जी के प्रभाव में रही है. वह 2011 से यहां की विधायक हैं और इस सीट से उन्होंने कभी हार नहीं देखी. मुख्यमंत्री बनने के बाद 2011 के उपचुनाव में उन्होंने बड़ी जीत हासिल की थी और तब से लगातार इस क्षेत्र में उनका दबदबा बना हुआ है.

पिछले चुनावों के आंकड़े

2016 के चुनाव में ममता बनर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार दीपा दासमुंशी को हराया था, हालांकि जीत का अंतर पहले की तुलना में कम हुआ. उस चुनाव में भाजपा ने भी अच्छा प्रदर्शन करते हुए अपने वोट शेयर में बढ़ोतरी की थी. 2021 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने इस सीट को बरकरार रखा. पार्टी के उम्मीदवार शोवनदेब चट्टोपाध्याय ने भाजपा के रुद्रनील घोष को हराया. इसके बाद हुए उपचुनाव में ममता बनर्जी ने खुद मैदान में उतरकर बड़ी जीत दर्ज की और मुख्यमंत्री पद पर बनी रहीं.

मतदाता सूची में बदलाव

इस बार भवानीपुर में मतदाता सूची में बड़ा बदलाव देखने को मिला है. करीब 41 हजार नाम हटाए गए हैं, जिससे कुल मतदाता संख्या घटकर लगभग 1.6 लाख रह गई है. यह बदलाव चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकता है. कुछ शोधकर्ताओं द्वारा किए गए विश्लेषण में यह बात सामने आई है कि जिन मतदाताओं को 'निर्णय प्रक्रियाधीन' श्रेणी में रखा गया है, उनमें मुस्लिम समुदाय का अनुपात अपेक्षा से अधिक है.

2011 की जनगणना के अनुसार, इस क्षेत्र में उनकी आबादी करीब 20% है, लेकिन इस श्रेणी में उनकी हिस्सेदारी इससे कहीं ज्यादा बताई गई है. इसके अलावा, अन्य श्रेणियों जैसे 'अनुपस्थित या स्थानांतरित' और 'अज्ञात' मतदाताओं में भी अलग-अलग स्तर पर बदलाव देखने को मिला है. कुछ मामलों में यह अनुपात तेजी से बढ़ा है, जो चुनावी गणित को प्रभावित कर सकता है.

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