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मंदिर के चढ़ावे से विपक्षी सांसदों तक डाकेजनी!

मंदिर के चढ़ावे से विपक्षी सांसदों तक डाकेजनी!

(आलेख : राजेंद्र शर्मा)

योध्या के राम मंदिर चढ़ावा डकैती कांड का ऊंट आखिरकार किस करवट बैठेगा, यह अभी कहना मुश्किल है। इस कांड के सूत्र जिस तरह से खुल रहे हैं और धीरे-धीरे नहीं, बल्कि तेजी से प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर बढ़ रहे हैं, उसे देखते हुए इस पूरे मामले की ईमानदारी से तथा गहरी जांच-पड़ताल होने और छोटे-बड़े सभी दोषियों को सजा दिलाए जाने की उम्मीद शायद ही किसी को होगी।

आम धारणा तो यही है कि यह कांड इतना बड़ा हो गया है तो, छोटी-छोटी मछलियां जरूर जाल में पकड़ी जाएंगी, लेकिन मगरमच्छों को बचा दिया जाएगा। अयोध्या में राम मंदिर के मुख्य कर्ताधर्ता माने जाने वाले चंपत राय और अनिल मिश्रा के इस्तीफा देकर खुद को इस कांड से अलग कर लेने और मंदिर ट्रस्ट के 8 छोटे कारकूनों के खिलाफ कथित रूप से ट्रस्ट की शिकायत के आधार पर, जो कि योगी सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) की प्रारंभिक रिपोर्ट आने के बाद करायी गयी, एफआईआर दर्ज किए जाने और उनके ठिकानों पर छापेमारी, जब्ती आदि और उनकी गिरफ्तारियों से, चढ़ावे में चोरी के शिकार, रामलला को न्याय मिलने की उम्मीदें नहीं बढ़ी हैं।

दूसरी ओर, लूट कांड पर से पर्दा हटना शुरू होने के बाद से, उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की सक्रियता ने, सत्ताधारी डबल इंजन सरकार के दो इंजनों के बीच खींच-तान की अटकलों को और बल दे दिया है। यह किसी से छुपा हुआ नहीं है कि राम मंदिर के संचालन के तंत्र के विशेष रूप से उच्चतर हलके, जिसमें ट्रस्टी आदि आते हैं, केंद्र वाले इंजन द्वारा चुन-चुनकर वहां बैठाए गए हैं और उनकी वफादारी सबसे बढ़कर प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रति है। चंपत राय तो प्रधानमंत्री मोदी को 'विष्णु का अवतार' घोषित कर, इसकी पुष्टि भी कर चुके हैं। स्वाभाविक रूप से मुख्यमंत्री योगी इस स्थिति को लेकर सहज नहीं हैं, जो उन्हें अपने अधिकार क्षेत्र में अनुचित अतिक्रमण जैसी लगती है। इसीलिए, उत्तर प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य के अनेक प्रेक्षकों को लगता है कि इस कांड पर से मीडिया के एक हिस्से द्वारा पर्दा उठाए जाने के बाद से, एसआईटी के गठन में तत्परता समेत योगी सरकार की सक्रियता, सिर्फ सत्ताधारी भाजपा के मुख्यमंत्री के नाते डैमेज कंट्रोल करने की उनकी चिंता को ही नहीं दिखाती है। इसके पीछे, केंद्रीय हस्तक्षेप के औजारों का रास्ता मुश्किल बनाने की कोशिश भी है।

इस धारणा को इस तथ्य से भी बल मिलता है कि बाबरी मस्जिद-रामजन्म भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से विशाल राम मंदिर बनने का रास्ता साफ होने के बाद से ही, मंदिर के निर्माण से संबंधित निर्णयों पर बार-बार विवाद उठते रहे थे, जिनमें प्रस्तावित मंदिर के आस-पास के इलाकों में जमीनों की खरीद-बिक्री में बेहिसाब कमाई से लेकर, मंदिर निर्माण में कमीशनखोरी तक के आरोप शामिल थे। वृहत मंदिर परियोजना के लिए तिगुने-चौगुने से भी ज्यादा दामों पर जमीनों की खरीद को लेकर मीडिया में काफी शोर भी मचा था और विपक्षी राजनीतिक पार्टियों ने भी इन गड़बड़ियों को उठाया था। इसके बावजूद, योगी सरकार ने इससे पहले कभी इन आरोपों की जांच कराना तो दूर, उनका नोटिस तक लेना जरूरी नहीं समझा था। इसलिए, इस बार के भंडाफोड़ के बाद योगी सरकार द्वारा दिखाई गयी सक्रियता को बहुत से लोग, केंद्र तथा योगी और खासतौर पर अमित शाह और योगी के बीच, योगी के वर्तमान कार्यकाल के बड़े हिस्से में और खासतौर 2024 के आम चुनाव के बाद से, बिना ज्यादा पर्दे के चलते आए, शह-मात के खेल में, योगी के अपनी स्थिति मजबूत करने के पैंतरे के रूप में देख रहे हैं।

संभवत: इसीलिए, इस पूरे घटनाक्रम से जुड़कर, किंतु इसके हाशिए पर, उत्तर प्रदेश में जो कुछ हो रहा था, वह भी कम दिलचस्प नहीं है। याद रहे कि इस रामलला लूट कांड पर से पर्दा उठाने में, उत्तर प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी, सपा की अग्रणी भूमिका रही है। पहले, समाजवादी पार्टी के एक मंझले स्थानीय नेता, पवन पांडेय ने इस घोटाले का मुद्दा उठाया था। सोशल मीडिया में इस संबंध में चर्चाओं के जोर पकड़ने के बाद, अप्रत्याशित रूप से सत्ताधारी भाजपा के समर्थक माने जाने वाले, एक प्रमुख हिंदी दैनिक ने इस भंडाफोड़ को आगे बढ़ाया। और इसके बाद, सपा अध्यक्ष, अखिलेश यादव ने इस मुद्दे को उठाकर, सारे देश के ही ध्यान में ला दिया।

बहरहाल, जब इस मंदिर के चंदाचोरी का भंडाफोड़ अपने शुरूआती दौर में ही था, उसी दौरान भाजपा के और सुहेलदेव समाज जैसी उसकी सहयोगी पार्टियों के कुछ नेताओं ने, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी में बड़ी फूट पड़ने और उसके 25-26 सांसदों के पार्टी से अलग होने की तैयारियां कर रहे होने के दावे करने शुरू कर दिए। ये दावे करने वालों में प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री, केशव प्रसाद मौर्य और मंत्री ओपी राजभर के नाम सबसे प्रमुख थे। ये दावे प. बंगाल से तृणमूल कांग्रेस के कुल 27 में से 20 लोकसभा सदस्यों को, भाजपा की वृहत्तर कार्ययोजना के तहत तोड़े जाने और उनका एक अज्ञात साइन बोर्ड पार्टी के साथ विलय कराए जाने और उसके फौरन बाद, महाराष्ट्र में शिव सेना (उद्घव बाल ठाकरे) के छ: सांसदों को तोड़कर, उनका शिव सेना से ही टूटकर अलग हुए, भाजपा के सहयोगी शिंदे गुट में विलय कराने की तैयारियों के बीच, किए जा रहे थे। इससे यह सब एक वृहत्तर योजना का हिस्सा बन जाता है।

यह वृहत्तर योजना है, महिला आरक्षण के लागू होने का रास्ता बनाए जाने की आड़ में, लोकसभा की सीटों की संख्या डेढ़ गुनी करते हुए, संसदीय क्षेत्रों के नये परिसीमन को थोपने की। याद रहे कि बजट सत्र के आखिर में भाजपा ने, विपक्ष से किसी प्रकार की चर्चा किए बिना, इसके लिए संविधान संशोधन विधेयक को एक प्रकार से धक्के से पारित कराने की कोशिश की थी। लेकिन, विपक्ष के एकजुट विरोध के सामने यह कोशिश विफल हो गयी, क्योंकि सत्ताधारी भाजपा और उसके सहयोगी मिलकर भी, संविधान संशोधन प्रस्ताव पारित कराने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत से काफी पीछे रह गए। संसद में इस खेल का रास्ता रुक जाने के बावजूद, भाजपा ने इस योजना को छोड़ा नहीं है।

विधानसभाई चुनाव के पिछले चक्र में, पश्चिम बंगाल में पहली बार सत्ता पर काबिज होने और तमिलनाडु के चुनाव में हार के बाद डीएमके पार्टी के विपक्षी इंडिया गठबंधन से अलग होने के बाद, भाजपा को जोड़-तोड़ और खरीद-फरोख्त से दो-तिहाई बहुमत जुगाड़ना अपनी पहुंच में नजर आने लगा। इसके बाद शुरू हुआ, पहले तृणमूल कांग्रेस और फिर उद्घव ठाकरे की शिवसेना के सांसदों को तोड़ने का खेल। और इसी खेल की अगली कड़ी के तौर पर समाजवादी पार्टी के लोकसभा सांसदों के दो-तिहाई से ज्यादा को तोड़ने की तैयारियां हो रही थीं। दो-तिहाई का आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण था कि संबंधित पार्टी के इतने सांसदों का गुट ही, किसी अन्य पार्टी में विलय के पैंतरे के सहारे, जिस पार्टी के टिकट पर चुन कर आया है, उससे अलग होकर भी, संसदीय अयोग्यता की सजा से बच सकता है। वैसे कानून के जानकारों के अनुसार, दलबदल पर रोक का मूल कानून भी इसकी इजाजत नहीं देता है, क्योंकि कानून पार्टियों के विलय की ही इजाजत देता है, संसदीय ग्रुप के दो-तिहाई या अधिक के विलय की नहीं। और पार्टी परिभाषित होती है, अपने स्वीकृत संविधान से। लेकिन अगर स्पीकर से अनुकूल निर्णय करा लेने का भरोसा हो, तो इस दलबदल को वैध विभाजन की मान्यता देकर, इस मामले को लंबे अदालती विवाद में फंसाया जा सकता है। याद रहे कि शिवसेना में मूल विभाजन का विवाद, चार साल बाद भी सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन ही पड़ा हुआ है।

यह पूरा प्रकरण यही दिखाता है कि अपनी मनमानी चलाने के लिए संघ-भाजपा को, जनतंत्र के मुख्य साधन के रूप में चुनाव को ही बेमानी बनाने और उसके लिए राजनीतिक पार्टियों को ही निरर्थक बनाने में भी कोई हिचक नहीं होगी। कहने की जरूरत नहीं है कि राजनीतिक पार्टियों की व्यवस्था के बिना किसी भी तरह के काम करने वाले जनतंत्र की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। वास्तव में काम करने वाली राजनीतिक पार्टियों के बिना, जनता के सामने विकल्प के अर्थ में, चुनाव की ही कल्पना कैसे की जा सकती है? जनतंत्र ठीक इसी संकल्पना पर आधारित है कि जनता के सामने विकल्प हों, जिनके बीच से वह अपने विचार से अनुकूलतम का चुनाव करे। जनतंत्र और चुनाव, राजनीतिक पार्टियों की बहुलता की मांग करते हैं, जबकि एक ही पार्टी का होना तो, एक प्रशासनिक तंत्र का ही होना होगा, जिसका जनतंत्र के लिए कोई अर्थ नहीं है। संघ-भाजपा, सत्ता के सहारे और साम-दाम-दंड-भेद के सभी हथियारों का सहारा लेकर, विपक्षी पार्टियों को तथा इस रास्ते से भी जनतंत्र को खत्म कर, अपनी तानाशाही कायम करना चाहते हैं। यह, चुनाव आयोग की मदद से, मतदाता सूचियों से लेकर मतदान तथा मतगणना तक में धांधलियों के जरिए, चुनाव मात्र को बेमानी बनाने के उस रास्ते का पूरक है, जिसकी एक झलक हमें पिछले ही दिनों मध्य प्रदेश में राज्यसभा के चुनाव में, कांग्रेस उम्मीदवार की नामजदगी जबरन खारिज किए जाने में देखने को मिली।

खैर! ऐसा लगता है कि अयोध्या चढ़ावा लूट कांड के बेपर्दा होने और उसे संभालते-संभालते, योगी आदित्यनाथ के पलड़ा अपनी तरफ झुकाने की कोशिश करने के बीच, समाजवादी पार्टी को विभाजन की कोशिशों से फिलहाल राहत मिल गयी है। राम मंदिर की लूट ने मौर्य और राजभर जैसों के सिर्फ मुंह बंद नहीं कर दिए हैं, बल्कि विपक्षी पार्टियों को तोड़ने के केंद्र के खेल पर भी ब्रेक लगा दिया है। निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता है, लेकिन हो सकता है कि संघ-भाजपा को, देश पर अपनी मर्जी का परिसीमन थोपने के अपने मंसूबे को, आगामी मानसून सत्र से आगे खिसकाना पड़ जाए। लेकिन, अगर कोई पार्टी आम चुनाव में जनता द्वारा बहुमत से काफी पीछे रोके जाने के बावजूद, जनता के उसी फैसले को राजनीतिक तोड़-फोड़ के जरिए, संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत में तब्दील करने की कोशिश कर सकती है और इसके लिए देश के सबसे बड़े थैलीशाहों और उनके द्वारा नियंत्रित मीडिया से लेकर, अदालतों तक सभी संवैधानिक संस्थाओं को अपने रथ में जोत सकती है, तो उसके सामने विपक्षी पार्टियां कब तक अपनी खैर मनाती रह सकती हैं। इस अघोषित इमरजेंसी में राजनीतिक पार्टियों के अस्तित्व के लिए ही खतरा है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका 'लोकलहर' के संपादक हैं।)

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