नई दिल्ली। कुछ संत ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान उनके जीवनकाल से आगे निकलकर उनकी शिक्षाओं और उनके प्रति लोगों की आस्था में बस जाती है। नीम करोली बाबा यानी महाराज जी भी ऐसी ही आध्यात्मिक विभूति माने जाते हैं।
उनका जीवन सादगी, भक्ति, सेवा और मानवता के संदेश से जुड़ा रहा। उन्होंने कभी खुद को किसी का आधिकारिक गुरु घोषित नहीं किया और न ही पारंपरिक तरीके से दीक्षा देने की परंपरा अपनाई, लेकिन आज दुनिया भर में लाखों लोग उन्हें अपना आध्यात्मिक मार्गदर्शक मानते हैं।
बचपन में ही घर छोड़ दिया, फिर लौटकर अपनाया गृहस्थ जीवन
नीम करोली बाबा का जन्म लक्ष्मण नारायण शर्मा के रूप में हुआ माना जाता है। कम उम्र में ही उनके भीतर वैराग्य की भावना प्रबल हो गई थी। करीब 11-12 वर्ष की उम्र में उन्होंने घर छोड़ दिया और एक भटकते साधु की तरह साधना और आध्यात्मिक खोज में समय बिताने लगे।
हालांकि, बाद में पिता के आग्रह पर वह वापस घर लौटे और गृहस्थ जीवन भी अपनाया। उनके जीवन का यह पक्ष इस धारणा को चुनौती देता है कि आध्यात्मिकता के लिए संसार का त्याग ही जरूरी है। उनके जीवन में साधना और पारिवारिक जिम्मेदारियां दोनों साथ दिखाई देती हैं।
1960-70 का दशक और दुनिया तक पहुंचा 'महाराज जी' का संदेश
नीम करोली बाबा की अंतरराष्ट्रीय पहचान 1960 और 1970 के दशक में तेजी से बढ़ी। अमेरिकी आध्यात्मिक साधक राम दास, जिनका पूर्व नाम रिचर्ड अल्पर्ट था, सहित कई पश्चिमी साधक उनके संपर्क में आए।
इसके बाद महाराज जी की शिक्षाएं भारत की सीमाओं से बाहर तक पहुंचने लगीं। उनके संदेश का सार बेहद सरल था-'सब एक हैं', 'सबको प्यार करो, सबकी सेवा करो।'
इन्हीं सरल लेकिन गहरे विचारों ने पश्चिमी दुनिया में भी लोगों को प्रभावित किया। उनके लिए आध्यात्मिकता केवल पूजा-पाठ या किसी विशेष धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं थी, बल्कि दूसरों के प्रति प्रेम, करुणा और निस्वार्थ सेवा में भी दिखाई देती थी।
11 सितंबर 1973 को वृंदावन में ली अंतिम सांस
नीम करोली बाबा ने 11 सितंबर 1973 को वृंदावन में अपने प्राण त्यागे। उनके देहावसान के बाद भी उनकी लोकप्रियता कम नहीं हुई। उनके आश्रमों, अनुयायियों और उनकी शिक्षाओं के माध्यम से आज भी बड़ी संख्या में लोग उनके विचारों से जुड़े हुए हैं।
महाराज जी के अनुयायियों के लिए उनका जीवन इस बात का संदेश है कि इंसान की आध्यात्मिक ऊंचाई केवल व्यक्तिगत साधना से नहीं, बल्कि दूसरों के प्रति उसके व्यवहार और सेवा भावना से भी तय होती है।
'हनुमान अंश' में बड़े पर्दे पर महाराज जी की कहानी
अब नीम करोली बाबा की आध्यात्मिक यात्रा और उनसे जुड़े चमत्कारों को फिल्म 'हनुमान अंश' के जरिए बड़े पर्दे पर पेश किया गया है। 7 अगस्त 2026 को रिलीज हुई इस फिल्म में महाराज जी के जीवन, उनकी आध्यात्मिक यात्रा और मानवता से जुड़े संदेश को सिनेमाई रूप देने की कोशिश की गई है।
फिल्म में मुख्य भूमिका निभाने वाले अभिनेता शोभितनव सत्य ने नीम करोली बाबा के किरदार को जीवंत करने का प्रयास किया है। उनके अभिनय के जरिए महाराज जी के व्यक्तित्व के आध्यात्मिक और मानवीय दोनों पहलुओं को सामने लाने की कोशिश की गई है।
चमत्कारों से आगे निकलती है फिल्म की कहानी
'हनुमान अंश' की खास बात यह बताई जा रही है कि कहानी केवल बाबा से जुड़े चमत्कारों को दिखाने तक सीमित नहीं रहती। फिल्म उनके जीवन के उस संदेश को भी केंद्र में रखती है, जिसमें निस्वार्थ सेवा, प्रेम, करुणा और सकारात्मक सोच को महत्व दिया गया है।
महाराज जी की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण यही सरल संदेश रहा-दूसरों से प्रेम करो, उनकी सेवा करो और हर व्यक्ति में एक ही चेतना को देखने का प्रयास करो।
आज, उनके निधन के पांच दशक से अधिक समय बाद भी नीम करोली बाबा का नाम आध्यात्मिक दुनिया में लिया जाता है। उनके आश्रमों में आने वाले श्रद्धालु हों या विदेशों में उनके विचारों से प्रभावित लोग-महाराज जी की विरासत किसी एक स्थान या समुदाय तक सीमित नहीं रह गई है।
शायद यही उनकी सबसे बड़ी पहचान है-एक ऐसे संत की, जिन्होंने खुद को गुरु घोषित किए बिना भी लोगों के जीवन में गुरु जैसी जगह बना ली।

