'हमारी शिक्षा : हम सभी का भविष्य' विषय पर संगोष्ठी, शिक्षाविदों ने मौजूदा शिक्षा व्यवस्था पर जताई चिंता
लखनऊ, 20 सितंबर। शिक्षा मूल रूप से एक सामाजिक प्रक्रिया है, जिसमें शिक्षक और विद्यार्थी मिलकर हाथ और दिमाग से काम करते हुए ज्ञान का निर्माण करते हैं।
शिक्षा में बढ़ता मशीनीकरण और मूल्यांकन की अत्यधिक वस्तुनिष्ठ प्रणाली इस प्रक्रिया को प्रभावित कर रही है। सबसे गंभीर चिंता एमसीक्यू आधारित व्यवस्था को लेकर है, जिसमें मूल्यांकन की भूमिका तेजी से मशीनों के हाथ में जा रही है।
यह बात दिल्ली विश्वविद्यालय की शिक्षाविद् प्रो. अनीता रामपाल ने रविवार को 'हमारी शिक्षा : हम सभी का भविष्य' विषय पर आयोजित संगोष्ठी में कही। जन विचार मंच की ओर से विचारक अशोक गर्ग और केके चतुर्वेदी की स्मृति में कैफी आजमी अकादमी सभागार, पेपरमिल कॉलोनी में संगोष्ठी आयोजित की गई।
नीट, पेपर लीक और कोचिंग संस्कृति पर सवाल
संगोष्ठी की शुरुआत भोपाल की नीना द्वारा फैज की नज्म 'हम देखेंगे' की प्रस्तुति से हुई। इसके बाद प्रो. अनीता रामपाल ने शिक्षा व्यवस्था में नीट परीक्षा, पेपर लीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और कोचिंग उद्योग के बढ़ते प्रभाव पर चिंता जताई।
उन्होंने कहा कि आज बच्चों में पढ़ने, लिखने और स्वतंत्र रूप से सोचने की क्षमता विकसित करने के बजाय परीक्षा-केंद्रित व्यवस्था का दबाव बढ़ रहा है। उनके मुताबिक, वस्तुनिष्ठ सवालों का इस्तेमाल सीमित होना चाहिए और भविष्य के शिक्षकों को तकनीक का महज संचालक बनने के बजाय मानवीय संवेदनाओं और विवेक से जोड़ना जरूरी है।
प्रो. रामपाल ने कहा कि पेशेवर मानवीय क्षमताओं को पूरी तरह मशीनों से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता। उन्होंने स्वीडन, नॉर्वे और फिनलैंड में शिक्षा के प्रयोगों का उल्लेख करते हुए डिजिटल शिक्षा और पाठ्यपुस्तकों के बीच संतुलन की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भविष्य की शिक्षा में आलोचनात्मक सोच और दृष्टि विकसित करना प्रमुख लक्ष्य होना चाहिए।
'शिक्षा आज शीर्षासन की तरह पलट गई है'
संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहीं लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति प्रो. रूपरेखा वर्मा ने शिक्षा व्यवस्था में लंबे समय से आ रही विसंगतियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि "शिक्षा आज शीर्षासन की तरह एकदम पलट गई है।"
उन्होंने विश्वविद्यालयों में 'प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस' की व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। उनके अनुसार शिक्षा केवल रोजगार हासिल करने का माध्यम नहीं है, बल्कि व्यक्ति के वैयक्तिक और सामाजिक निर्माण की प्रक्रिया है।
शिक्षा मानवता को आजाद और सक्षम बनाए : प्रो. नदीम हसनैन
विषय प्रवर्तन करते हुए प्रसिद्ध मानवशास्त्री प्रो. नदीम हसनैन ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य मानवता को आजाद करने और उसे ताकत देने वाला होना चाहिए। उन्होंने शिक्षक और विद्यार्थी के बीच संवाद तथा सह-विवेचन की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के चयन की प्रक्रिया में बदलाव आया है और यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे प्राथमिक शिक्षा तक भी पहुंच रही है। उन्होंने विज्ञान को सीधे पौराणिक संदर्भों से जोड़ने की प्रवृत्ति पर भी सवाल उठाते हुए इसे तर्कसंगत दृष्टि के अनुरूप नहीं बताया।
श्रोताओं के सवालों के दिए जवाब
संगोष्ठी के दौरान अरुण, आएशा, राघव, अंशू और रीता चौधरी सहित कई श्रोताओं ने शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवाल पूछे। प्रो. अनीता रामपाल ने इन सवालों के जवाब देते हुए शिक्षा में मानवीय संवाद, आलोचनात्मक सोच और स्वतंत्र चिंतन को महत्वपूर्ण बताया।
कार्यक्रम का संयोजन नवाबुद्दीन ने किया, जबकि संचालन प्रतुल जोशी ने किया। कार्यक्रम में अंशू केडिया, मधु गर्ग, भोपाल की संध्या शैली और नीना के साथ इप्टा के राकेश, नाइन हसन, नागेंद्र, मृदुला भारद्वाज समेत अनेक प्रबुद्धजन मौजूद रहे।
इस अवसर पर अशोक गर्ग की लिखी पुस्तकों के साथ अन्य पुस्तकों का स्टॉल भी लगाया गया।

