Bilaspur. बिलासपुर। बिलासपुर में शिक्षा विभाग से जुड़ा एक बड़ा मामला सामने आया है, जहां पदोन्नति आदेश को लेकर शुरू हुआ विवाद अब उच्च स्तर तक पहुंच गया है। डीपीआई की दखल के बाद जेडी बिलासपुर ने मुंगेली जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा जारी पदोन्नति आदेश को निरस्त कर दिया है।
इस कार्रवाई के बाद पूरे मामले पर कई गंभीर सवाल उठने लगे हैं, खासकर यह कि गलत आदेश जारी करने वाले अधिकारियों पर कब कार्रवाई होगी।
मामला छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के एक आदेश की व्याख्या से जुड़ा हुआ है। आरोप है कि मुंगेली जिला शिक्षा अधिकारी ने हाई कोर्ट के आदेश की गलत व्याख्या करते हुए 9 सहायक शिक्षकों को पदोन्नति देकर प्रधान पाठक के पद पर पदस्थ कर दिया था। यह पदोन्नति डीपीआई द्वारा पहले खारिज किए गए अभ्यावेदन के आधार पर की गई थी, जिससे प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए हैं। जेडी बिलासपुर द्वारा जारी आदेश में स्पष्ट किया गया है कि यह कार्रवाई डीपीआई के निर्देश पर की गई है। आदेश में कहा गया है कि संबंधित पदोन्नति शासन के नियमों और निर्देशों के विपरीत पाई गई, इसलिए इसे निरस्त किया जाता है।
सूत्रों के अनुसार, यह पूरा मामला तब और गंभीर हो गया जब सामने आया कि कुछ शिक्षकों को दो साल पहले निरस्त हो चुके आदेशों के बावजूद पदोन्नति दी गई थी। बिलासपुर जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा लगभग 10 शिक्षकों को हेड मास्टर पद पर पदोन्नत किए जाने की भी बात सामने आई है, जिनके मामलों पर पहले ही आपत्तियां और निरस्तीकरण हो चुका था। इस पूरे प्रकरण को लेकर शिकायतें कलेक्टर, कमिश्नर और जेडी स्तर तक पहुंच चुकी थीं, लेकिन अब तक किसी भी स्तर पर जिम्मेदार अधिकारियों या लाभ प्राप्त शिक्षकों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई थी। इसी कारण अब यह मामला और अधिक चर्चा में आ गया है।
जानकारी के अनुसार, मुंगेली डीईओ कार्यालय द्वारा 31 जनवरी 2026 के हाई कोर्ट आदेश के पालन का हवाला देते हुए सहायक शिक्षकों को प्रधान पाठक पद पर पदोन्नति दी गई थी। इसमें कई शिक्षकों के नाम शामिल थे, जिनमें रूपेश कुमार राजार, दुर्गानेताम, रविप्रसाद लहरे, महावीर सिंह राजपूत, कल्याणी धूर, धनेश जायसवाल, पुष्कर सिंह राजपूत, रामप्रकाश राजपूत और हरेश्वरी शामिल हैं। लेकिन बाद में परीक्षण के दौरान यह पाया गया कि यह पदोन्नति शासन के निर्देशों के अनुरूप नहीं थी। इसके बाद जिला शिक्षा अधिकारी मुंगेली के 23 मार्च 2020 के पदोन्नति आदेश को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया गया। इस कार्रवाई के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है।
जब मुंगेली जिले में गलत पदोन्नति आदेश पर तुरंत कार्रवाई हो गई, तो बिलासपुर जिले में इसी तरह के मामलों पर अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई है। स्थानीय स्तर पर इस मुद्दे को लेकर शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। शिक्षा विभाग के जानकारों का कहना है कि इस तरह के मामलों में यदि आदेशों की गलत व्याख्या होती है तो उससे न केवल प्रशासनिक अव्यवस्था पैदा होती है, बल्कि योग्य और पात्र शिक्षकों के साथ भी अन्याय होता है। वहीं, इस पूरे मामले ने विभागीय पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर भी बहस छेड़ दी है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि उच्च स्तर पर इस पूरे प्रकरण की आगे क्या जांच होती है और क्या बिलासपुर डीईओ कार्यालय की भूमिका की भी समीक्षा की जाएगी या नहीं। फिलहाल डीपीआई और जेडी स्तर पर कार्रवाई के बाद मामला औपचारिक रूप से तो निरस्त कर दिया गया है, लेकिन प्रशासनिक जवाबदेही और कार्रवाई को लेकर सवाल अभी भी बरकरार हैं।

