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शिवसेना की असली पहचान पर कानूनी जंग, सुप्रीम कोर्ट में उद्धव गुट का बड़ा पक्ष

शिवसेना की असली पहचान पर कानूनी जंग, सुप्रीम कोर्ट में उद्धव गुट का बड़ा पक्ष

ई दिल्ली : शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न पर अधिकार को लेकर उद्धव ठाकरे गुट और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे गुट के बीच चल रही कानूनी लड़ाई एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंची।

बुधवार को मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने की। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल रहे। अदालत ने मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद अगली सुनवाई गुरुवार दोपहर दो बजे तय की है। इस दौरान उद्धव ठाकरे की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने विस्तार से अपना पक्ष रखा और चुनाव आयोग की प्रक्रिया तथा पार्टी संविधान को लेकर कई अहम सवाल उठाए।

सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि शिवसेना की स्थापना से लेकर वर्ष 2012 में अपने निधन तक बालासाहेब ठाकरे ही पार्टी के सर्वोच्च नेता रहे। उनके निधन के बाद पार्टी की कमान उद्धव ठाकरे ने संभाली और पार्टी संविधान के अनुसार उन्हें कई बार विधिवत अध्यक्ष चुना गया। सिब्बल ने कहा कि एकनाथ शिंदे लंबे समय तक उद्धव ठाकरे के सहयोगी रहे। वे पार्टी संगठन में भी उनके साथ काम करते रहे और जब उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने, तब भी शिंदे उनकी सरकार में मंत्री थे। उस समय तक उन्होंने कभी भी पार्टी नेतृत्व या संगठनात्मक व्यवस्था पर कोई आपत्ति नहीं जताई।

सिब्बल ने अदालत के सामने यह भी कहा कि वर्ष 1999 तक शिवसेना के संविधान में 'पक्ष प्रमुख' का पद मौजूद नहीं था, जिसे बाद में संशोधन कर जोड़ा गया। उन्होंने वर्ष 2014 से 2019 के बीच की राजनीतिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए बताया कि इस अवधि में शिवसेना सरकार का हिस्सा रही और एकनाथ शिंदे मंत्री के रूप में कार्यरत थे। सितंबर 2018 में उद्धव ठाकरे ने उन्हें विधानसभा में शिवसेना विधायक दल का नेता नियुक्त किया था, जबकि सुनील प्रभु को मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) बनाया गया था। यह नियुक्तियां पार्टी संविधान के अनुच्छेद 11ए के तहत की गई थीं और इसकी विधिवत सूचना विधानसभा अध्यक्ष तथा चुनाव आयोग दोनों को भेजी गई थी।

कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि बाद में विधान परिषद चुनाव के दौरान कुछ विधायकों द्वारा क्रॉस वोटिंग की गई, जिसके बाद अनुशासनात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू हुई। इसी दौरान बागी विधायकों ने पहले गुजरात के सूरत और बाद में असम के गुवाहाटी में डेरा डाला, जिससे राजनीतिक संकट पैदा हुआ। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग का यह कहना कि उसके रिकॉर्ड में वर्ष 2018 का पार्टी संविधान उपलब्ध नहीं था, पूरी तरह अनुचित है, क्योंकि उसी संविधान के आधार पर संगठनात्मक नियुक्तियां और चुनावी प्रक्रिया संचालित होती रही थी।

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सिब्बल से पूछा कि क्या जनवरी 2013 में अनुच्छेद 11ए वाला संशोधित संविधान चुनाव आयोग को भेजा गया था और क्या संबंधित दस्तावेजों पर हस्ताक्षर की पुष्टि की जा सकती है। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि संबंधित प्रस्तावों पर सदस्यों के हस्ताक्षर मौजूद थे या नहीं। इस पर सिब्बल ने कहा कि सभी दस्तावेजों को पक्ष प्रमुख की मंजूरी प्राप्त थी और संविधान पीठ पहले ही इन दस्तावेजों की वैधता स्वीकार कर चुकी है। उन्होंने कहा कि बैठकों के उपस्थिति रजिस्टर और अन्य अभिलेख भी यह साबित करते हैं कि सभी प्रक्रियाएं नियमों के अनुरूप पूरी की गई थीं।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ के फैसले का भी हवाला देते हुए कहा कि विधायक दल को पार्टी संगठन के निर्णयों को बदलने का अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि बागी विधायकों द्वारा सुनील प्रभु की जगह भरत गोगावले को मुख्य सचेतक नियुक्त करने का प्रस्ताव सुप्रीम कोर्ट पहले ही अवैध ठहरा चुका है। अदालत ने स्पष्ट किया था कि किसी राजनीतिक दल का विधायक दल स्वतंत्र रूप से मुख्य सचेतक नहीं बदल सकता और ऐसा अधिकार केवल राजनीतिक दल के अधिकृत नेतृत्व के पास होता है।

सिब्बल ने यह भी कहा कि गुजरात में मौजूद 39 विधायकों के समूह द्वारा पारित प्रस्ताव को वैध नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह राजनीतिक दल का निर्णय नहीं बल्कि केवल विधायक दल के एक हिस्से की कार्रवाई थी। उनके अनुसार, इसी प्रस्ताव के आधार पर राज्यपाल को जानकारी भेजी गई और बाद में महाराष्ट्र की तत्कालीन सरकार गिर गई, जबकि पूरी प्रक्रिया में गंभीर कानूनी विसंगतियां थीं।

मामले की सुनवाई अभी जारी है और सुप्रीम कोर्ट गुरुवार को भी दोनों पक्षों की दलीलें सुनेगा। इस मामले का फैसला न केवल शिवसेना के संगठनात्मक अधिकारों और चुनाव चिह्न के विवाद के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, बल्कि भविष्य में राजनीतिक दलों के भीतर होने वाले विभाजन और विधायक दल बनाम राजनीतिक दल के अधिकारों को लेकर भी यह एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल साबित हो सकता है।

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