Hospice. धर्मशाला। एक तरफ सरकारें और प्रशासन देश को डिजिटल और हाइटेक बनाने के दावे कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ जमीनी लोकतंत्र यानी पंचायत चुनावों में आज भी दशकों पुरानी बैलेट पेपर व्यवस्था हावी है।
हिमाचल प्रदेश में दो चरणों में हुए मतदान के दौरान इस धीमी मतदान प्रक्रिया की पोल खुलकर सामने आ गई। बैलेट पेपर पर मुहर लगाने के पारंपरिक तरीके के कारण मतदान प्रक्रिया इतनी धीमी रही कि वोटरों को कडक़ड़ाती धूप में घंटों लाइनों में खड़े रहने को मजबूर होना पड़ा। इस अव्यवस्था का सबसे ज्यादा खामियाजा बुजुर्गों, दिव्यांगों और महिला मतदाताओं को भुगतना पड़ा। हैरानी की बात यह है कि आज के आधुनिक युग में भी पंचायती राज चुनावों के बैलेट पेपर पर प्रत्याशियों के नाम हाथ से लिखे जा रहे हैं, जिनकी लिखावट ठीक थी, वहां तो सब सही था, लेकिन कई अधिकारियों ने ऐसे टेढ़े-मेढ़े नाम लिखे थे कि आम आदमी को पढऩा भी मुश्किल हो रहे थे।
इतना ही नहीं, हल्की क्वालिटी के कागज पर छपे ब्लैक एंड व्हाइट चुनाव चिह्नों के कारण बुजुर्ग और कम पढ़े-लिखे मतदाताओं को अपने पसंदीदा प्रत्याशी को ढूंढने में ही अच्छा-खासा समय गंवाना पड़ा। स्थिति तब और बदतर हो गई जहां एक-एक पद के लिए 10 से 12 प्रत्याशी मैदान में थे। इतनी लंबी लिस्ट और धुंधले निशानों को देखकर मतदाताओं का सिर चकरा गया। इतना ही नहीं, कई जगह स्याही सूखी होने से स्टैंप भी धुंधली ही दिख रही थी। मतदान के लिए घंटों लाइन में जूझने के बाद नाराज मतदाताओं ने साफ शब्दों में कहा कि अब पंचायत चुनाव भी ईवीएम मशीनों से ही करवाए जाने चाहिए। लोगों का कहना है कि आज के दौर में कोई भी घंटों लाइन में खड़ा रहना पसंद नहीं करता। अगर सरकार ने जल्द ही इस व्यवस्था को नहीं बदला, तो आने वाले समय में पंचायती राज चुनावों में मतदान के प्रतिशत में भारी गिरावट देखने को मिल सकती है।

