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4 अफसर चलाते थे तो ज्यादा बेहतर था चंडीगढ़? अब 15 लाख की आबादी पर 21 IAS/IPS

4 अफसर चलाते थे तो ज्यादा बेहतर था चंडीगढ़? अब 15 लाख की आबादी पर 21 IAS/IPS

रियाणा कैडर के रिटायर्ड IAS अधिकारी अशोक खेमका ने चंडीगढ़ में आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की संख्या को लेकर सवाल उठाया है। उन्होंने सोशल मीडिया अकाउंट पर एक पोस्ट करते हुए कहा कि 15 लाख से कम आबादी वाले चंडीगढ़ में 21 आईएएस और आईपीएस अधिकारी तैनात हैं।

उनके मुताबिक, इसका मतलब है कि करीब हर 70 हजार लोगों पर एक आईएएस या आईपीएस अधिकारी है।

अशोक खेमका ने अपनी पोस्ट में चंडीगढ़ जैसे कम आबादी वाले शहर में इतनी संख्या में आईएएस और आईपीएस अधिकारियों को तैनात करने पर सवाल उठाए। उन्होंने लिखा कि यदि अधिकारियों के इस कैडर को घटाकर 10 से कम किया जाए तो प्रशासनिक कार्यों में होने वाले ओवरलैप यानी दोहराव को कम किया जा सकता है। उनके अनुसार, इससे जवाबदेही बढ़ेगी और शहर के लोगों को तेज और अधिक उत्तरदायी प्रशासन मिल सकेगा।

कम अधिकारी चलाते थे शहर

अशोक खेमका ने बताया कि एक समय था जब चंडीगढ़ शहर में सिर्फ 4 अधिकारी ही थे और उस समय की व्यवस्थाओं और आज की व्यवस्थाओं में कुछ खास अंतर नहीं है। अशोक खेमका ने इस ओर इशारा किया कि ज्यादा अधिकारी होने से काम बेहतर तरीके से होने के बजाय जवाबदेही कम होती है। उन्होंने बताया कि चंडीगढ़ शहर के कई हिस्से आज भी ऐसे हैं, जहां व्यवस्थाएं लचर हैं। उन्होंने सेक्टर 26 की अनाज मंडी का उदाहरण भी दिया, जहां व्यवस्थाएं खराब हैं और गंदगी के कारण लोग परेशान रहते हैं।

कैसी है शहर की व्यवस्था?

आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की तैनाती से उम्मीद की जाती है कि व्यवस्थाओं में सुधार आएगा। जिस शहर मे 15 लाख की आबादी के लिए 21 आईएएस और आईपीएस अधिकारी तैनात हैं, उस शहर में व्यवस्थाएं तो बेहतरीन होनी चाहिए। हालांकि, ऐसा नहीं है और चंडीगढ़ आज भी अव्यवस्थाओं से जकड़ा हुआ है। चंडीगढ़ में पब्लिक ट्रांसपोर्ट की हालत काफी खराब है। सीटीयू की बसें पूरे शहर में चलती जरूर हैं लेकिन आबादी के हिसाब से और शहर में आने वाले लोगों के हिसाब से बसें पर्याप्त नहीं है। बसों की टाइमिंग को लेकर भी विवाद लगातार होते रहते हैं और बसों में लोगों को बैठने के लिए सीटें नहीं मिलती।

इसके अलावा शिक्षण संस्थानों में भी चंडीगढ़ में स्थिति संतोषजनक नहीं है। शहर में कई स्कूल हैं और स्कूलों में एडमिशन के लिए ही बच्चों में होड़ रहती है। इसके अलावा हेल्थ सेक्टर पर भी बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं। शहर के बड़े अस्पतालों में भारी संख्या में भीड़ है। लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ता है ताकि वह डॉक्टर से इलाज करवा सकें। इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर छोटे क्लीनिक बहुत कम मौजूद हैं, जिसके चलते लोग आम बीमारी के लिए भी बड़े अस्पतालों पर निर्भर हैं।

सफाई में पिछड़ रहा शहर

चंडीगढ़ को भले ही एक साफ और स्वच्छ शहर के रूप में जाना जाता हो लेकिन पिछले कुछ सालों में शहर में जगह-जगह पर कूड़ा देखने को मिल रहा है। शहर के बाहरी इलाकों में तो स्थिति और भी ज्यादा खराब है। स्वच्छता अभियान से शहर के लोगों को जिस तरह की उम्मीदें थी वह पूरी नहीं हो सकी।

इसके साथ ही ट्रैफिक व्यवस्था और कानून व्यवस्था को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। पिछले कुछ समय में चंडीगढ़ में कानून व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सेक्टर 11 की मेडिकल दुकान पर दिनदहाड़े गोली चलाना हो या पीयू या सेक्टर 8 में गोलीबारी की घटना। इन तमाम घटनाओं ने चंडीगढ़ प्रशासन को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है।

क्या ज्यादा अधिकारियों की जरूरत

15 लाख से कम आबादी वाले इस शहर में 21 अधिकारी हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि शहर में व्यवस्थाएं ठीक क्यों नहीं हैं? इतने अधिकारी माइक्रो लेवल पर जाकर भी व्यवस्थाओं पर नजर रख सकते है, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। अशोक खेमका ने अपनी पोस्ट में इसी ओर इशारा किया है। मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस के मॉडल को लागू करके भी सुधार किया जा सकता है। ऐसे में सरकार को इस विषय पर गंभीरता से विचार करना होगा कि चंडीगढ़ जैसे शहर में कितने अधिकारियों की जरूरत है जिससे व्यवस्थाएं सुचारू रूप से चल सकें।

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