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कभी बंद हुआ, अब हो रही वापसी, कितने काम आएगा मिट्टी का तेल?

कभी बंद हुआ, अब हो रही वापसी, कितने काम आएगा मिट्टी का तेल?

गभग एक दशक पहले तक सरकारी राशन की दुकानों पर मिट्टी का तेल (केरोसिन) मिला करता था। सब्सिडी वाले रेट पर मिलने वाला यह तेल लालटेन या लैंप जलाने, मिट्टी के तेल वाले स्टोब जलाने और कई अन्य कामों में इस्तेमाल होते थे।

2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद उज्ज्वला योजना शुरू हुई तो गैस कनेक्शन बांटे गए, बिजली व्यवस्था बेहतर हुई और केरोसिन मिलना बंद हो गया। अब ईरान में जारी जंग के चलते दुनिया के सामने ऊर्जा संकट पैदा हो रहा है तो सरकार ने मिट्टी का तेल बेचने की अनुमति फिर से दे दी है। इस फैसले को कई नजरिए से देखा जा रहा है।

इसका एक पहलू यह भी है कि अब फिर से राशन की दुकानों से वही मिट्टी का तेल मिलेगा जिसे एक दशक पहले बंद कर दिया गया था। देखना यह होगा कि इसका इस्तेमाल किस तरह होता है। साथ ही यह भी देखना होगा कि क्या मिट्टी के तेल से जलने वाली लालटेन, लैंप और स्टोव लोगों के पास बचे भी हैं या नहीं। आइए इसी मिट्टी के तेल का इतिहास जानते हैं कि कैसे एक समय पर सबसे ज्यादा लोकप्रिय रहा यह तेल अचानक बंद कर दिया गया और अब फिर से इसकी वापसी क्यों हो रही है?

कैसे शुरू हुआ था इस्तेमाल?

साल 1840 में कनाडा के वैज्ञानिक अब्राहम गेसनर ने केरोसिन बनाने का फॉर्मूला खोज निकाला था। सबसे पहले इसका ईंधन के रूप में इस्तेमाल फैक्ट्रियों में हुआ। कारखानों को चलाने के लिए इस्तेमाल होने वाला केरोसिन धीरे-धीरे लोगों के घरों तक पहुंचा और लालटेन, दीपक और स्टोव में भी इस्तेमाल होने लगा। भारत में साल 1952 में मिट्टी का तेल आया और एक कंपनी 'स्टैंडर्ड वैक्यूम रिफाइनिंग कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड' के जरिए इसे लाया गया। कुछ ही समय में यह कार और बाइक चलाने के लिए केरोसिन का इस्तेमाल होने लगा। पंखे और प्रेस चलाने तक के लिए केरोसिन का इस्तेमाल होता था। समय के साथ बिजली ने इसकी जगह ली, फिर डीजल-पेट्रोल ने और आखिर में गैस ने इसे मार्केट से गायब ही कर दिया।

हालांकि, भारत में केरोसिन का इस्तेमाल एक झटके में नहीं बंद हुआ था। जैसे-जैसे और जहां-जहां गैस और बिजली की सप्लाई पर्याप्त होती गई, वैसे-वैसे देश में केरोसिन का इस्तेमाल कम कर दिया गया। इसका इस्तेमाल कम या बंद करने की एक वजह यह भी थी कि केरोसिन को जलाने से होने वाला धुआं पर्यावरण के लिए बेहद हानिकारक होता है। इसकी तुलना में एलपीजी या अन्य गैसों और बिजली के इस्तेमाल से पर्यावरण को बेहद कम नुकसान होता है। यही वजह थी कि समय के साथ भारत में बिजली और गैस से चलने वाले उपकरणों को बढ़ावा दिया गया है और केरोसिन का इस्तेमाल बंद कर दिया गया।

जब लोगों के घरों में बिजली पहुंची तो सबसे पहले रोशनी करने के लिए मिट्टी के तेल पर निर्भरता घटी। कुछ ही समय में गैस के कनेक्शन पर्याप्त हो गए और बिजली आने लगी तो लोग गैस चूल्हे और इंडक्शन पर शिफ्ट हो गए। इसी का नतीजा हुआ कि ज्यादातर राज्यों ने खुद को केरोसिन मुक्त घोषित कर दिया। समय के साथ राज्यों की सरकारी राशन वाली दुकानों पर मिट्टी का तेल बिकना बंद हो गया। अब ज्यादातर राज्यों में मिट्टी के तेल का डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क बंद हो चुका है लेकिन अब इसे फिर से शुरू किया जा रहा है।

कहां होगा इस्तेमाल?

भले ही केरोसिन की वापसी हो रही है लेकिन इसके इस्तेमाल को लेकर अभी भी संदेह है। बिजली और गैस से चलने वाले उपकरण खरीद चुके ज्यादातर घरों में अब न तो लालटेन मिलेगी और ना ही मिट्टी के तेल से चलने वाले स्टोव। बाजारों में भी अब लालटेन या स्टोव कम ही दिखते हैं। ऐसे में सरकार भले ही केरोसिन को मार्केट में उतार दे, यह मुश्किल है कि लोग ऐसे उपकरणों को फिर से खरीदें जो मिट्टी के तेल से चलते हों।

क्यों हो रही केरोसिन की वापसी?

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने और टकराव कम न होने के चलते भारत में गैस और कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है। खाना बनाने के लिए एलपीजी गैस की कमी हर तरफ देखी गई है। ऐसे में वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत के रूप में मिट्टी के तेल को फिर से उतारा जा रहा है। मौजूदा वक्त में इसकी कीमत 60 रुपये लीटर से भी ज्यादा है। हालांकि, तमिलनाडु में कई जगहों पर यह तेल 15 रुपये लीटर ही मिलता है।

इस बार सरकार ने पेट्रोल पंपों को अनुमति दी है कि वे अगले 60 दिनों तक केरोसिन बेच सकते हैं। 21 राज्यों में पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम यानी सरकारी राशन की दुकानों पर भी मिट्टी के तेल की बिक्री शुरू की जा रही है। सरकार ने यह भी कहा है कि इसका इस्तेमाल खाना बनाने और रोशनी के लिए ही किया जाएगा।

केरोसिन को लेकर नियम में ढील देने का मकसद यह है कि एक वैकल्पिक ईंधन लोगों के पास रहे। तेल कंपनियों के लिए केरोसिन की सप्लाई आसान है क्योंकि इसकी मांग बेहद कम हो चुकी है और उनके पास स्टॉक ठीक-ठाक है।

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