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लेखपाल ने 49 साल पहले ली थी 400 रुपये की रिश्वत, हाई कोर्ट ने अब सुनाई सजा

लेखपाल ने 49 साल पहले ली थी 400 रुपये की रिश्वत, हाई कोर्ट ने अब सुनाई सजा

भ्रष्टाचार के मामलों में समय बीत जाने से सजा खत्म नहीं होती। इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक अहम फैसले ने यही संदेश दिया है। वर्ष 1977 में 300 रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़े गए कंसोलिडेशन विभाग के तत्कालीन लेखपाल महेश चंद की 41 वर्ष पुरानी आपराधिक अपील खारिज करते हुए अदालत ने 1985 में सुनाई गई एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखा है।

हाई कोर्ट ने दोषी को चार सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण कर शेष सजा काटने का निर्देश दिया है। साथ ही कहा है कि अगर वह तय समय में सरेंडर नहीं करता है तो ट्रायल कोर्ट उसकी गिरफ्तारी सुनिश्चित करने के लिए कानूनी कार्रवाई करे।

मामला साल 1977 का है। कानपुर में कंसोलिडेशन की कार्यवाही के दौरान एक ग्रामीण वीरेंद्र सिंह और गांव की एक महिला के बीच भूमि विवाद लंबित था। आरोप है कि तत्कालीन लेखपाल महेश चंद और कानूनगो चंद्र सेन ने दूसरी पक्ष की अपील खारिज कराने के नाम पर 400 रुपये रिश्वत की मांग की। शिकायतकर्ता ने पहले 100 रुपये दिए और बाद में विजिलेंस विभाग में शिकायत दर्ज कराई।

शिकायत के बाद विजिलेंस टीम ने ट्रैप बिछाया। 100-100 रुपये के तीन नोटों पर फेनोल्फथलीन पाउडर लगाया गया। तय योजना के तहत जैसे ही महेश चंद ने होटल में 300 रुपये लेकर अपनी जेब में रखे, विजिलेंस टीम ने उन्हें रंगे हाथ गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के बाद आरोपी के हाथ और जेब को सोडियम कार्बोनेट के घोल से धोया गया, जो लाल हो गया। इससे साबित हुआ कि उसने वही चिह्नित नोट हाथ

में लिए थे। तलाशी में वही नोट भी बरामद हुए। अदालत ने इसे रिश्वत लेने का महत्वपूर्ण वैज्ञानिक साक्ष्य माना।

1985 में सजा, 41 साल तक हाई कोर्ट में लंबित रही अपील

ट्रायल कोर्ट ने अक्टूबर 1985 में महेश चंद को तत्कालीन भारतीय दंड संहिता की धारा 161 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1947 की धारा 5(2) के तहत दोषी करार देते हुए एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इसके बाद उन्हें जमानत मिल गई और उन्होंने हाई कोर्ट में अपील दायर कर दी, जो चार दशक से अधिक समय तक लंबित रही। अपील में महेश चंद की ओर से दलील दी गई कि शिकायतकर्ता वीरेंद्र सिंह अदालत में गवाही देने नहीं आए, इसलिए अभियोजन का मामला कमजोर है। यह भी कहा गया कि सार्वजनिक स्थान पर कोई रिश्वत नहीं लेता। हाई कोर्ट ने दोनों दलीलों को खारिज कर दिया।

अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता की मानसिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण वह गवाही देने में सक्षम नहीं थे, जिसका मेडिकल रिकॉर्ड प्रस्तुत किया गया था लेकिन विजिलेंस अधिकारियों, स्वतंत्र गवाहों और शिकायतकर्ता के बेटे की गवाही ने ट्रैप की पूरी कार्रवाई को संदेह से परे साबित कर दिया।

हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी

अदालत ने कहा कि यदि ट्रैप की कार्रवाई, बरामदगी और स्वतंत्र गवाहों के बयान विश्वसनीय हैं तो केवल शिकायतकर्ता की गवाही न होने से भ्रष्टाचार का मामला कमजोर नहीं हो जाता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रैप ऑपरेशन पूरी गोपनीयता से किए जाते हैं, इसलिए सार्वजनिक स्थान पर रिश्वत लेने की दलील स्वीकार नहीं की जा सकती।

चार सप्ताह में सरेंडर का आदेश

हाई कोर्ट ने महेश चंद की अपील खारिज करते हुए उनके निजी मुचलके और जमानत बांड रद्द कर दिए हैं। अदालत ने चार सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में सरेंडर कर शेष सजा काटने का आदेश दिया है। यदि वह ऐसा नहीं करते हैं तो ट्रायल कोर्ट उनकी गिरफ्तारी सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कानूनी कार्रवाई करेगा।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले को भ्रष्टाचार के मामलों में एक महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अपराध चाहे कितना भी पुराना क्यों न हो, यदि साक्ष्य मजबूत हैं तो दोषी को कानून के सामने जवाबदेह होना ही पड़ेगा।

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